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जिले के 429 रोजगार सेवकों को 14 माह से नहीं मिला मानदेय
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संभल/बबराला। जिले में मनरेगा योजना के अंतर्गत कार्यरत रोजगार सेवकों के परिवार भुखमरी की कगार पर हैं। जिन्हें पिछले 16 माह से मानदेय नहीं मिला है। रोजगार सेवकों ने ग्राम्य विकास विभाग के अधिकारियों से मानदेय की गुहार लगाई तो सामने आया कि तकनीकी कारण से मानदेय का भुगतान नहीं हो सका है। लिहाजा ब्लॉक के अधिकतर कामकाजों को संभालने वाले रोजगार सेवकों के परिवार अर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
जनपद के आठ ब्लाकों की ग्राम पंचायतों में कार्यरत रोजगार सेवकों को मनरेगा योजना के सफल संचालन के लिए संविदा के तौर पर नियुक्त किया गया था। जिन्हें वर्तमान में छह हजार रुपये प्रति माह के हिसाब से मानदेय प्रदान किया जाता है।
जिले में 427 रोजगार सेवक हैं जिन्हें 14 माह से मानदेय नहीं मिला है। रोजगार सेवकों की मानें तो उनका काम सिर्फ मनरेगा के मस्टरोल भरना, उनकी फीडिंग कराकर काम पर निगरानी रखना और मजदूरों का भुगतान कराना है। लेकिन अधिकारी रोजगार सेवकों पर अधिक भरोसा जता कर ग्राम निधि के कामों की भी जिम्मेदारी सौंपते हैं।
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जिसमें सबसे प्रमुख कार्य जियो टैग है। इसे तीन चरणों में किया जाता है। सबसे कठिन इस काम के बाद भी उन्हें आवासों के निर्माण कार्य की भी जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में ब्लॉक के तकरीबन हर काम को करनेे वाले रोजगार सेवक सरकार की मनरेगा योजना के तकनीकी कारणों के चलते बदहाली के शिकार हैं। जिसमें प्रत्येक रोजगार सेवक का करीब 84 हजार रुपये फंसा हुआ है। समय से मानदेय नहीं मिलने सेे उनके परिवार के सामने आर्थिक संकट आ गया है।
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जिले में कुल 427 रोजगार सेवक मनरेगा के तहत काम कर रहे हैं। जिनका करीब 14 माह से मानदेय नहीं मिला है। कई बार अधिकारियों को अवगत कराया है। संगठन के माध्यम से प्रदर्शन और हड़ताल भी की लेकिन अधिकारी तकनीकी कारण बताकर मजबूरी बता रहे हैं। जिससे हमारा परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अगर समय से मानदेय नहीं मिलता है तो भविष्य में बड़ा आंदोलन करेंगे। - अवेधश कुमार यादव, जिलाध्यक्ष, रोजगार सेवक संघ, संभल।
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जनपद के आठ ब्लाकों की ग्राम पंचायतों में कार्यरत रोजगार सेवकों को मनरेगा योजना के सफल संचालन के लिए संविदा के तौर पर नियुक्त किया गया था। जिन्हें वर्तमान में छह हजार रुपये प्रति माह के हिसाब से मानदेय प्रदान किया जाता है।
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जिले में 427 रोजगार सेवक हैं जिन्हें 14 माह से मानदेय नहीं मिला है। रोजगार सेवकों की मानें तो उनका काम सिर्फ मनरेगा के मस्टरोल भरना, उनकी फीडिंग कराकर काम पर निगरानी रखना और मजदूरों का भुगतान कराना है। लेकिन अधिकारी रोजगार सेवकों पर अधिक भरोसा जता कर ग्राम निधि के कामों की भी जिम्मेदारी सौंपते हैं।
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जिसमें सबसे प्रमुख कार्य जियो टैग है। इसे तीन चरणों में किया जाता है। सबसे कठिन इस काम के बाद भी उन्हें आवासों के निर्माण कार्य की भी जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में ब्लॉक के तकरीबन हर काम को करनेे वाले रोजगार सेवक सरकार की मनरेगा योजना के तकनीकी कारणों के चलते बदहाली के शिकार हैं। जिसमें प्रत्येक रोजगार सेवक का करीब 84 हजार रुपये फंसा हुआ है। समय से मानदेय नहीं मिलने सेे उनके परिवार के सामने आर्थिक संकट आ गया है।
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जिले में कुल 427 रोजगार सेवक मनरेगा के तहत काम कर रहे हैं। जिनका करीब 14 माह से मानदेय नहीं मिला है। कई बार अधिकारियों को अवगत कराया है। संगठन के माध्यम से प्रदर्शन और हड़ताल भी की लेकिन अधिकारी तकनीकी कारण बताकर मजबूरी बता रहे हैं। जिससे हमारा परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अगर समय से मानदेय नहीं मिलता है तो भविष्य में बड़ा आंदोलन करेंगे। - अवेधश कुमार यादव, जिलाध्यक्ष, रोजगार सेवक संघ, संभल।