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‘हमने खुद ही दूसरे दर्जे की बना दी मातृभाषा’

Fri, 21 Feb 2020 12:12 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 21 Feb 2020 12:12 AM IST
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'We ourselves made mother tongue second class'
सहारनपुर। ‘मातृ भाषा का जिक्र आते ही याद आने लगती हैं दादी-नानी की वो कहानियां जो बेहद रोचक थीं और उनसे ऐसा जुड़ाव था जैसे किसी प्रसंग का सजीव चित्रण हो रहा हो। यह दादी-नानी के साथ ही उनके मुंह से निकलने वाली मीठी और मातृ भाषा का ही आकर्षण था, लेकिन अब तक बच्चों के पास दादी-नानी तक नहीं मिल पाती हैं। दरअसल, हमने खुद ही मातृ भाषा हिंदी को दूसरे दर्जे का बना दिया है। अब हमारी ही जिम्मेदारी है कि इसे आगे बढ़ाएं और इसके लिए निरंतर प्रयास करें।’
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ये शब्द हैं हिंदू और उर्दू भाषा पर मजबूत पकड़ रखने वाले मशहूर शायर नवाज देवबंदी के। विश्व मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में बातचीत में वह आगे कहते हैं कि मातृ भाषा का मतलब मां से जुड़ी भाषा। पहले घर में मां बाप से लेकर दादी-नानी के किस्सों में यह भाषा झलकती थी। अब तो मॉम डैड के संबोधन का युग है। कुछ प्रयासों से सोशल मीडिया पर हिंदी का प्रयोग बढ़ा जरूर है, लेकिन वह भाषा इतनी मिश्रित हो चुकी है कि उसने नया रूप ले लिया है। मुझे लगता है कि इस भाषा को आगे बढ़ाने के लिए फिर घर से ही इसका प्रयोग बढ़ाने की शुरूआत करनी होगी। फिर से घर से लेकर चौपाल तक गीत, गायन, बातचीत के माध्यम से इसे आगे बढ़ाना होगा।
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जड़ से जुड़ेंगे तो मातृ भाषा से भी जुड़ेंगे
- हिंदी भाषा में कई गीत संग्रह लिख चुके गीतकार डॉ. राजेंद्र राजन कहते हैं कि मातृ भाषा हिंदी हमारी जड़ और संस्कृति से जुड़ी भाषा है। आधुनिकता की आड़ में और नए दौर की जरूरत के नाम पर इससे दूर नहीं रहा जा सकता। मौजूदा दौर के बच्चों और युवाओं को समझाना होगा कि मातृ भाषा से जुड़कर ही वे अपनी संस्कृति के करीब रह पाएंगे। उनका मानना है कि गीत, गायन, संगीत, साहित्य, निबंध लेखन से लेकर कवि सम्मेलन जैसे आयोजनों के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
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अपनी भाषा पर गर्व करें, शरमाएं नहीं
- जेवी जैन कालेज में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. राकेश चंद्रा कहते हैं कि इस दौर में बच्चे और युवा फर्राटेदार अंग्रेजी तो बोलते हैं। मगर हिंदी बोलने और लिखने में उन्हें शर्म आने लगती है। यह गलत है। हमें हिंदी पर गर्व करना चाहिए, उससे शरमाना नहीं चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के साथ इस भाषा का प्रयोग करें। इसका महत्व समझाएं। शिक्षकों को भी इसमें सहयोग करना होगा।

डाक्टर राकेश चंद्रा

डाक्टर राकेश चंद्रा- फोटो : SAHARANPUR

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