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हिंदी का अनादर देख मुखर हो जाते हैं विष्णुकांत
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- हिंदी हैं हम -- पंडित विष्णुकांत शुक्ल
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। हिंदी का अनादर उन्हें बर्दाश्त नहीं है। जब कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे तब भी और सेवानिवृत्त होने के बाद भी, जहां कहीं हिंदी का अनादर देखते हैं तो विचलित हो जाते हैं, मुखर होकर उसका विरोध करते हैं। ऐसे हैं विद्या वाचस्पति पंडित विष्णुकांत शुक्ल। अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत उनसे वार्ता की गई, तो हिंदी की मौजूदा हालत के लिए उन्होंने बेबाक राय रखी और कहा कि इसके लिए अभिभावक, स्कूल शिक्षक और समाज के वह लोग जिम्मेदार हैं, जो अपनी मातृभाषा हिंदी के प्रति गंभीर नहीं हैं।
पंडित विष्णुकांत शुक्ल करीब 25 साल तक सहारनपुर के जेवी जैन कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे। वहीं, चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी की शोध समिति और पाठ्यक्रम समिति के भी संयोजक रहे हैं। वह बताते हैं कि 1975 से 1985 के बीच जेवी जैन कॉलेज में दो प्राचार्य ऐसे आए थे, जिन्होंने पत्राचार अंग्रेजी में करा दिया था। उनके पास भी अंग्रेजी में ही पत्र भेजे गए, लेकिन उन्होंने जवाब देने से स्पष्ट इंकार कर कह दिया कि हिंदी में पत्राचार करेंगे, तो जवाब दूंगा, अन्यथा नहीं। इसके बाद हिंदी में ही पत्राचार किया जाने लगा। उन्होंने बताया कि कई वर्ष पूर्व नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लगे बोर्डों पर गलत हिंदी लिखी थी, तभी वहां रेलवे के अफसर से मिलकर शिकायत दर्ज कराई और शुद्ध हिंदी लिखवाने का आग्रह किया, जो फिर ठीक करा दिया गया था।
मूलरूप से खुर्जा (बुलंदशहर) के हैं निवासी
29 अक्तूबर 1942 को खुर्जा में पिता ब्रह्मानंद शुक्ल एवं माता प्रियंवदा देवी शुक्ल के यहां उनका जन्म हुआ। वर्ष 1963 में आगरा विवि से एमए हिंदी की पढ़ाई की। 1965 में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य रत्न, संपूर्णानंद संस्कृत विवि वाराणसी से 1963 में साहित्य शास्त्री और 1968 में साहित्याचार्य, 1987 में सीसीएसयू से पीएचडी, 1992 में हिंदी साहित्य सम्मेलन से आयुर्वेदरत्न, वर्ष 2000 में अपभ्रंश साहित्य अकादमी जयपुर से अपभ्रंश डिप्लोमा किया।
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लेखन
कादंबिनी, मुक्ता, संस्कृति, विज्ञान ज्योति, मनोरमा, कनक प्रभा आदि हिंदी पत्रिकाओं तथा संस्कृत प्रतिभा, विश्व संस्कृतम, स्वर मंगला, गैर्वाणी, संवित, गांडीवम, दूर्वा, अर्वाचीन संस्कृतम, संस्कृत रत्नाकर आदि संस्कृत पत्रिकाओं में 40 वर्ष से लेखन किया।
पुस्तक
हिंदी अनुवाद - श्रीगांधिचरितम (संस्कृत काव्यम) 1965, मूल लेखक आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल
मौलिक - संस्कृत शिक्षा 1966
हिंदी संस्कृत व्याख्या - नीतिशतकम, भर्तहरि, 1970
संपादन/भाष्य - कवितावली (गोस्वामी तुलसीदास) 1971
पद्मावत (जायसी) (नखशिख एवं मानसरोदक खंड) 1971
पद्मावती समय चंदरबरदायी 1971
श्रीमदभागवतगीता (2,6,12 अध्याय) 1974
संस्कृत हिंदी टीका - कादंबरी (कथामुखम) बाणभट्ट 1975
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर काव्यपाठ, आलेख एवं वार्ता, पुस्तक समीक्षा (हिंदी एवं संस्कृत)
यह मिले सम्मान
- पीडी गुप्ता सिल्वर जुबली गोल्ड मेडल एनआरईसी कॉलेज खुर्जा 1963 में मिला
- श्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार मोक्षायतन संस्थान सहारनपुर 1982 में मिला
- साहित्य रत्नाकर (संस्कृत हिंदी परिषद देववृंद सहारनपुर) 1992 में पाया
- अपभ्रंश साहित्य अकादमी जयपुर से स्वर्णपदक सम्मान 2000 में मिला
- तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल से विशिष्ट सम्मान 2005 में मिला
- अक्षरश्लोकम में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति से विशेष सम्मान 1981 में मिला।
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पंडित विष्णुकांत शुक्ल करीब 25 साल तक सहारनपुर के जेवी जैन कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे। वहीं, चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी की शोध समिति और पाठ्यक्रम समिति के भी संयोजक रहे हैं। वह बताते हैं कि 1975 से 1985 के बीच जेवी जैन कॉलेज में दो प्राचार्य ऐसे आए थे, जिन्होंने पत्राचार अंग्रेजी में करा दिया था। उनके पास भी अंग्रेजी में ही पत्र भेजे गए, लेकिन उन्होंने जवाब देने से स्पष्ट इंकार कर कह दिया कि हिंदी में पत्राचार करेंगे, तो जवाब दूंगा, अन्यथा नहीं। इसके बाद हिंदी में ही पत्राचार किया जाने लगा। उन्होंने बताया कि कई वर्ष पूर्व नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लगे बोर्डों पर गलत हिंदी लिखी थी, तभी वहां रेलवे के अफसर से मिलकर शिकायत दर्ज कराई और शुद्ध हिंदी लिखवाने का आग्रह किया, जो फिर ठीक करा दिया गया था।
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मूलरूप से खुर्जा (बुलंदशहर) के हैं निवासी
29 अक्तूबर 1942 को खुर्जा में पिता ब्रह्मानंद शुक्ल एवं माता प्रियंवदा देवी शुक्ल के यहां उनका जन्म हुआ। वर्ष 1963 में आगरा विवि से एमए हिंदी की पढ़ाई की। 1965 में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य रत्न, संपूर्णानंद संस्कृत विवि वाराणसी से 1963 में साहित्य शास्त्री और 1968 में साहित्याचार्य, 1987 में सीसीएसयू से पीएचडी, 1992 में हिंदी साहित्य सम्मेलन से आयुर्वेदरत्न, वर्ष 2000 में अपभ्रंश साहित्य अकादमी जयपुर से अपभ्रंश डिप्लोमा किया।
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लेखन
कादंबिनी, मुक्ता, संस्कृति, विज्ञान ज्योति, मनोरमा, कनक प्रभा आदि हिंदी पत्रिकाओं तथा संस्कृत प्रतिभा, विश्व संस्कृतम, स्वर मंगला, गैर्वाणी, संवित, गांडीवम, दूर्वा, अर्वाचीन संस्कृतम, संस्कृत रत्नाकर आदि संस्कृत पत्रिकाओं में 40 वर्ष से लेखन किया।
पुस्तक
हिंदी अनुवाद - श्रीगांधिचरितम (संस्कृत काव्यम) 1965, मूल लेखक आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल
मौलिक - संस्कृत शिक्षा 1966
हिंदी संस्कृत व्याख्या - नीतिशतकम, भर्तहरि, 1970
संपादन/भाष्य - कवितावली (गोस्वामी तुलसीदास) 1971
पद्मावत (जायसी) (नखशिख एवं मानसरोदक खंड) 1971
पद्मावती समय चंदरबरदायी 1971
श्रीमदभागवतगीता (2,6,12 अध्याय) 1974
संस्कृत हिंदी टीका - कादंबरी (कथामुखम) बाणभट्ट 1975
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर काव्यपाठ, आलेख एवं वार्ता, पुस्तक समीक्षा (हिंदी एवं संस्कृत)
यह मिले सम्मान
- पीडी गुप्ता सिल्वर जुबली गोल्ड मेडल एनआरईसी कॉलेज खुर्जा 1963 में मिला
- श्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार मोक्षायतन संस्थान सहारनपुर 1982 में मिला
- साहित्य रत्नाकर (संस्कृत हिंदी परिषद देववृंद सहारनपुर) 1992 में पाया
- अपभ्रंश साहित्य अकादमी जयपुर से स्वर्णपदक सम्मान 2000 में मिला
- तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल से विशिष्ट सम्मान 2005 में मिला
- अक्षरश्लोकम में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति से विशेष सम्मान 1981 में मिला।