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Ground Report: सहारनपुर के पांच हजार परिवारों का दर्द, दो वक्त की रोटी के लिए हर छह माह में छूटती है दहलीज

Tue, 05 Dec 2023 01:08 PM IST
Dimple Sirohi विनीत तोमर, अमर उजाला, सहारनपुर
विनीत तोमर, अमर उजाला, सहारनपुर Published by: Dimple Sirohi Updated Tue, 05 Dec 2023 01:08 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ी क्षेत्र में बसे वन गुर्जर वर्षों पुराने दर्द के साथ जिंदगी जीने को मजबूर हैं। इन्हें दो वक्त की रोटी के लिए हर छह माह के लिए अपनी दहलीज छोड़नी पड़ती है। पढ़ें ये ग्राउंड रिपोर्ट।

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UP: pain of five thousand families of Saharanpur, they cross the threshold every six months
वन गुर्जर - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

नाम बसीर, उम्र 55 साल, जगह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र की पहाड़ियों के बीच बसावट, यहा रह रहे वनगुर्जरों का आज भी वही सालों पुराना दर्द, जब हर छह माह में दो वक्त की रोटी के लिए इन्हें दहलीज छोड़कर दूर जाना पड़ता है। इस दर्द में कई पीढि़यां गुजर गईं। इसकी न कोई दवा न कोई जड़ी-बूटी, बस आश्वासनों की टेबलेट जरूर है, जो हर चुनाव के दौरान इन्हें दी जाती है, लेकिन इसका असर कभी नहीं हुआ।

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यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि यमुनानगर के हथिनीकुंड से सहारनपुर के मोहंड क्षेत्र में पहाड़ियों के बीच बसे वन गुर्जरों के करीब पांच हजार परिवारों का दर्द है, जिसे कोई नहीं समझ पा रहा। अमर उजाला संवाददाता ने ग्राउंड जीरो पर इसकी पड़ताल की तो इन परिवारों का दर्द उनके चेहरों पर साफ दिखा।

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UP: pain of five thousand families of Saharanpur, they cross the threshold every six months
वन गुर्जर बसीर - फोटो : Amar Ujala

शाकंभरी माता सिद्धपीठ से करीब एक किलोमीटर पहले संवाददाता जंगल और सूखी पड़ी सहंस्रा नदी से होते हुए वन गुर्जरों के परिवार के बीच पहुंचा। वहीं पर बसीर मिले। बकौल बसीर, मुझे याद नहीं कि हम कहां के रहने वाले हैं। पहाड़ियों की तलहटी में बनी इसी झोपड़ी में दादा-परदादा गुजर गए।

आमदनी के नाम पर सिर्फ पशुओं को दूध है, जिससे हम पति-पत्नी और पांच बच्चों को दो वक्त की रोटी मिलती है। सबसे अधिक दुख तब होता है, जब गर्मी शुरू होते ही अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक दहलीज छोड़कर ठंडे एरिया में जाना पड़ता है। उस वक्त यहां न पीने का पानी होता और न ही पशुओं के लिए चारा। 

उमर(46) भी अपने परिवार के साथ रहते हैं। बकौल उमर, हम तो सिर्फ वोट बैंक के लिए इस्तेमाल होते हैं। करीब तीन किमी दूर कोठरी बहलोलपुर गांव में इस उम्मीद में वोट डालते हैं कि शायद हमें भी स्थायी ठिकाना मिल सके। अब फिर सुन रहे कि चुनाव आने वाले हैं, फिर से यहां पर नेता आ जाएंगे वोट मांगने। पीढ़ी दर पीढ़ी बस आश्वासन मिलता है।

UP: pain of five thousand families of Saharanpur, they cross the threshold every six months
वन गुर्जर उमर - फोटो : Amar Ujala

यह होते हैं वन गुर्जर 
दरअसल, अंग्रेजों के शासनकाल में वनों को विकसित करने के लिए बाहर से बुलाकर वन गुर्जर रखे गए थे। यह लोग पूरी तरह से जंगल पर निर्भर होते हैं। वर्ष 1991 में वन गुर्जरों के विकास के लिए योजना भी बनी, लेकिन कुछ साल में ही दम तोड़ गई।

वन गुर्जरों की स्थिति दयनीय है। उनके विकास को लेकर विधानसभा में भी मुद्दा उठाया जा चुका है। पिछले माह विधानसभा की एससी-एसटी कमेटी के सदस्यों ने भी यहां पर दौरा किया था। बड़कलां और कालूवाला में कुछ स्थायी परिवार बसे हैं, जहां पर फ्री बिजली कनेक्शन कराए जाएंगे। - उमर अली, विधायक बेहट

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डॉ. उमर सैफ, पर्यावरणविद् - फोटो : Amar Ujala

वन गुर्जरों के उत्थान को लेकर कई बार प्रयास हुए, लेकिन सफल नहीं हुए। जैसे ही गर्मी शुरू होती है यह परिवार अपने पशुओं को लेकर हिमाचल या उत्तराखंड के ठंडे इलाकों में चले जाते हैं। इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना बेहद जरूरी है। - डॉ. उमर सैफ, पर्यावरणविद्

प्रशासन की तरफ से आधारभूत सुविधा देने का प्रयास किया जा रहा है। वह गुर्जर एक जगह पर स्थायी नहीं रहते, इसलिए कुछ दिक्कत आ रही है। प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें पूरी तरह से विकसित किया जाए। - डॉ. दिनेश चंद्र, जिलाधिकारी

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