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उत्तम शौच धर्म से दूर होती है मन की अपवित्रता
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चन्द्र नगर जैन मन्दिर में दशलक्षण पर्व पर पूजा अर्चना करते जैन समाज के लोग
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। जैन बाग स्थित प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस पर उत्तम शौच धर्म की आराधना की गई। उत्तम शौच धर्म के विषय में बताया गया कि उत्तम शौच धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति के मन की अपवित्रता और मलिनता दूर होती है।
वृती सीए अनिल जैन ने बताया कि शौच से आशय शुचिता, पवित्रता से है। मानव देह की मलिनता को दूर करने के लिए पुरुषार्थ करते हैं, लेकिन देह स्वभाव से अपवित्र और मल से भरी है, उसे कितना भी पवित्र कर लो, वह मलिन ही रहती है। मनुष्य में लोभ ही समस्त पापों की जड़ है, जिसके वशीभूत होकर मानव पाप-अपराध करते हैं। लोभ सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ के कारण ही भाई, भाई का शत्रु और पुत्र, पिता का शत्रु बना है। समाज में व्याप्त हिंसा, अनाचार, भ्रष्टाचार, चोरी, अपहरण हत्या, अपराध सब लोभ के कारण ही होता है। जिसमें लोभ की प्रवृत्ति रहेगी, उसमें शुचिता-पवित्रता संभव ही नहीं। इन मलिन विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्मलता, समता भाव का होना अति आवश्यक है। जो संतोष रूपी जल से लोभ रूपी मल को धोता है, उसे निर्मल शौच धर्म होता है, शौच-धर्म को धारण करने के लिए मनुष्य को पंचेन्द्रिय विषयों में आसक्ति, धन संबंधी सामग्री को संचित करने की प्रवृत्ति का त्याग करना आवश्यक है।
इससे पूर्व प्रात:काल की बेला में विश्व कल्याण एवं शांति के लिए किए जा रहे अनुष्ठान में नवीन जैन, अनिल जैन, पंकज जैन, प्रवीण जैन, प्रदीप जैन, नितिन जैन, संचित जैन, अंकुर जैन, श्रेयांश जैन, अनुज जैन, नवनीत जैन, सिद्धार्थ जैन, गौरव जैन, दीपक जैन, अभिषेक जैन, संयम जैन सहित अनेक स्त्री-पुरुष शामिल रहे। मंत्रोच्चार के मध्य श्रीजी की पूजा-अर्चना और अभिषेक शांतिधारा का आयोजन हुआ।
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वृती सीए अनिल जैन ने बताया कि शौच से आशय शुचिता, पवित्रता से है। मानव देह की मलिनता को दूर करने के लिए पुरुषार्थ करते हैं, लेकिन देह स्वभाव से अपवित्र और मल से भरी है, उसे कितना भी पवित्र कर लो, वह मलिन ही रहती है। मनुष्य में लोभ ही समस्त पापों की जड़ है, जिसके वशीभूत होकर मानव पाप-अपराध करते हैं। लोभ सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ के कारण ही भाई, भाई का शत्रु और पुत्र, पिता का शत्रु बना है। समाज में व्याप्त हिंसा, अनाचार, भ्रष्टाचार, चोरी, अपहरण हत्या, अपराध सब लोभ के कारण ही होता है। जिसमें लोभ की प्रवृत्ति रहेगी, उसमें शुचिता-पवित्रता संभव ही नहीं। इन मलिन विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्मलता, समता भाव का होना अति आवश्यक है। जो संतोष रूपी जल से लोभ रूपी मल को धोता है, उसे निर्मल शौच धर्म होता है, शौच-धर्म को धारण करने के लिए मनुष्य को पंचेन्द्रिय विषयों में आसक्ति, धन संबंधी सामग्री को संचित करने की प्रवृत्ति का त्याग करना आवश्यक है।
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इससे पूर्व प्रात:काल की बेला में विश्व कल्याण एवं शांति के लिए किए जा रहे अनुष्ठान में नवीन जैन, अनिल जैन, पंकज जैन, प्रवीण जैन, प्रदीप जैन, नितिन जैन, संचित जैन, अंकुर जैन, श्रेयांश जैन, अनुज जैन, नवनीत जैन, सिद्धार्थ जैन, गौरव जैन, दीपक जैन, अभिषेक जैन, संयम जैन सहित अनेक स्त्री-पुरुष शामिल रहे। मंत्रोच्चार के मध्य श्रीजी की पूजा-अर्चना और अभिषेक शांतिधारा का आयोजन हुआ।

चन्द्र नगर जैन मन्दिर में दशलक्षण पर्व पर पूजा अर्चना करते जैन समाज के लोग- फोटो : SAHARANPUR
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