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भूल से खा लेने पर खत्म नहीं हो जाता रोजा
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Sat, 25 Jun 2016 12:15 AM IST
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रमजान
- फोटो : अमर उजाला
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सहारनपुर में इमाम सहारनपुर कारी सैय्यद इसहाक गोरा की सरपरस्ती में चल रही रोजेदारों के लिए हेल्पलाइन में लोग सहारनपुर के साथ दूसरे जनपदों से भी अपनी जिज्ञासाओं का समाधान शरीयत की रोशनी में दूर कर रहे हैं। कारी इसहाक गोरा द्वारा दिए गये कुछ ख़ास सवालों के जवाब।
सवाल : सकीना गोहर ने बिजनौर से पूछा है कि उन्हें बीमारी में कमजोरी की वजह से भूलने की आदत है। उन्होंने रोजे की हालत में भूले से पानी पी लिया उसके बाद एक बाइट पकोड़ी चख ली फिर याद आया कि मैं रोजे से हूं, ऐसी सूरत में क्या मेरा रोजा रहा?
जवाब : अगर किसी व्यक्ति ने रोजे की हालत में भूल से पानी पी लिया या कुछ खा लिया तो रोजा खत्म नहीं होगा, क्योंकि भूल पर कोई मवाखजा नहीं है। शरीयत में आया है कि अगर भूल से कई बार खाया-पीया तब भी रोजा सलामत रहेगा, थोड़ा खाने ओर ज्यादा खाने में कोई अंतर नहीं है।
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सवाल : शादान हुसैन ने कैलाशपुर से मालूम करना चाहा कि उनका बड़ा भाई सरकार को पूरा इनकम टैक्स अदा करता है पर जकात नहीं देता, कहता है कि इसी में जकात अदा हो जाती है, अब आप बताएं क्या ये सही है?
जवाब : अगर कोई व्यक्ति सरकार को अपना पूरा इनकम टैक्स अदा करता है और फिर ये समझता है कि इनकम टैक्स के साथ साथ जकात भी अदा हो गई, तो उनकी ये सोच बिलकुल गलत है, क्योंकि इनकम टैक्स देश की जरूरियात के लिए सरकार को दिया जा रहा है।
जबकि जकात एक मुसलमान के लिए फर्ज ए खुदाबंदी और इबादत है। इनकम टैक्स अदा करने से जकात अदा नहीं होती, बल्कि जकात का अलग अदा करना फर्ज है।
सवाल : रईस अहमद ने बरेली से जानना चाहा कि किया मैं अपनी पत्नी को जकात दे सकता हूं?
जवाब : पत्नी को अगर पति जकात दे तो ये जायज नहीं।
सवाल : महताब आलम ने मोहल्ला मछयारान से पूछा कि जहां हम तरावीह पढ़ रहे हैं और हाफिज इतनी जल्दी कुरान पढ़ते हैं कि कुछ शब्द तो समझ ही नहीं आते, इस पर शरीयत का क्या हुकुम है?
जवाब : कुरान को इस कदर जल्दी पढ़ना कि शब्द कटते हों तो ये बड़ा गुनाह है, शरीयत की किताबों में आया है कि इस सूरत में न सुनाने वालों को सवाब होगा न पीछे सुनने वालों को।
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सवाल : सकीना गोहर ने बिजनौर से पूछा है कि उन्हें बीमारी में कमजोरी की वजह से भूलने की आदत है। उन्होंने रोजे की हालत में भूले से पानी पी लिया उसके बाद एक बाइट पकोड़ी चख ली फिर याद आया कि मैं रोजे से हूं, ऐसी सूरत में क्या मेरा रोजा रहा?
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जवाब : अगर किसी व्यक्ति ने रोजे की हालत में भूल से पानी पी लिया या कुछ खा लिया तो रोजा खत्म नहीं होगा, क्योंकि भूल पर कोई मवाखजा नहीं है। शरीयत में आया है कि अगर भूल से कई बार खाया-पीया तब भी रोजा सलामत रहेगा, थोड़ा खाने ओर ज्यादा खाने में कोई अंतर नहीं है।
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सवाल : शादान हुसैन ने कैलाशपुर से मालूम करना चाहा कि उनका बड़ा भाई सरकार को पूरा इनकम टैक्स अदा करता है पर जकात नहीं देता, कहता है कि इसी में जकात अदा हो जाती है, अब आप बताएं क्या ये सही है?
जवाब : अगर कोई व्यक्ति सरकार को अपना पूरा इनकम टैक्स अदा करता है और फिर ये समझता है कि इनकम टैक्स के साथ साथ जकात भी अदा हो गई, तो उनकी ये सोच बिलकुल गलत है, क्योंकि इनकम टैक्स देश की जरूरियात के लिए सरकार को दिया जा रहा है।
जबकि जकात एक मुसलमान के लिए फर्ज ए खुदाबंदी और इबादत है। इनकम टैक्स अदा करने से जकात अदा नहीं होती, बल्कि जकात का अलग अदा करना फर्ज है।
सवाल : रईस अहमद ने बरेली से जानना चाहा कि किया मैं अपनी पत्नी को जकात दे सकता हूं?
जवाब : पत्नी को अगर पति जकात दे तो ये जायज नहीं।
सवाल : महताब आलम ने मोहल्ला मछयारान से पूछा कि जहां हम तरावीह पढ़ रहे हैं और हाफिज इतनी जल्दी कुरान पढ़ते हैं कि कुछ शब्द तो समझ ही नहीं आते, इस पर शरीयत का क्या हुकुम है?
जवाब : कुरान को इस कदर जल्दी पढ़ना कि शब्द कटते हों तो ये बड़ा गुनाह है, शरीयत की किताबों में आया है कि इस सूरत में न सुनाने वालों को सवाब होगा न पीछे सुनने वालों को।