{"_id":"5edd350f8ebc3e906d3cf38c","slug":"refining-of-soil-will-be-better-by-natural-means-saharanpur-news-mrt485355115","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्राकृतिक तरीके से बेहतर होगा मिट्टी का शोधन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्राकृतिक तरीके से बेहतर होगा मिट्टी का शोधन
विज्ञापन
मृदा शोधन के लिए अपनाई गई सॉयल सोलेराइजेशन की विधि।
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। सॉयल सोलराइजेशन (मृदा सौर्यीकरण या सूरज की किरणों पर आधारित शोधन) विधि कारगर साबित हो रही है। इस विधि में भूमि शोधन के लिए किसी भी प्रकार के कीटनाशक या रसायन का प्रयोग नहीं होता। पर्यावरण के लिए अनुकूल इस विधि में पॉलिथीन की पारदर्शी शीट को भूमि पर फैलाकर उसे किनारों से दबाया जाता है। इससे इसके अंदर पैदा होने वाली गर्मी से भूमि में मौजूद कीट, विषाणु, फफूंदी आदि नष्ट हो जाते हैं। इससे फसलों का मृदा जनित रोगों से बचाव हो सकता है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को इसके लिए जागरूक कर रहे हैं।
दरअसल, उचित फसल चक्र नहीं अपनाने सहित कुछ अन्य कारणों से फसल में रोग बढ़ाने वाले कारक मृदा में स्थिर हो जाते हैं। इससे बुआई करते ही फसल मृदा जनित रोग से ग्रसित हो जाती है। इसके चलते फसल को काफी नुकसान पहुंचता है। रोगग्रस्त फसलों के उपचार के लिए किसान काफी मंहगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। इससे फसल की लागत में खासा इजाफा हो जाता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में यह विधि और भी उपयोगी है।
ऐसे अपनाई जाती है यह विधि
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि इस विधि से मृदा शोधन के लिए किसान को खेत की अच्छी तरह जुताई करके हल्की सिंचाई करनी होगी। उस खेत को पारदर्शी पन्नी से ढककर इसके किनारों को दबाना चाहिए। इससे हीट बढ़ने पर तापमान 60 डिग्री से अधिक हो जाता है। खेत के जुते होने के चलते इस गर्मी से भूमि में करीब एक फीट नीचे तक मृदा में मौजूद पिछली फसल के रोगकारक, खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही हानिकारक विषाणू, फफूंदी, कीट और निमेटोड आदि नष्ट हो जाते हैं। इस पारदर्शी पॉलिथीन शीट से खेत को तीन से चार सप्ताह तक ढककर रखा जाता है। धान की नर्सरी डालने वाले स्थान को इससे उपचारित किया जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
दरअसल, उचित फसल चक्र नहीं अपनाने सहित कुछ अन्य कारणों से फसल में रोग बढ़ाने वाले कारक मृदा में स्थिर हो जाते हैं। इससे बुआई करते ही फसल मृदा जनित रोग से ग्रसित हो जाती है। इसके चलते फसल को काफी नुकसान पहुंचता है। रोगग्रस्त फसलों के उपचार के लिए किसान काफी मंहगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। इससे फसल की लागत में खासा इजाफा हो जाता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में यह विधि और भी उपयोगी है।
विज्ञापन
ऐसे अपनाई जाती है यह विधि
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि इस विधि से मृदा शोधन के लिए किसान को खेत की अच्छी तरह जुताई करके हल्की सिंचाई करनी होगी। उस खेत को पारदर्शी पन्नी से ढककर इसके किनारों को दबाना चाहिए। इससे हीट बढ़ने पर तापमान 60 डिग्री से अधिक हो जाता है। खेत के जुते होने के चलते इस गर्मी से भूमि में करीब एक फीट नीचे तक मृदा में मौजूद पिछली फसल के रोगकारक, खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही हानिकारक विषाणू, फफूंदी, कीट और निमेटोड आदि नष्ट हो जाते हैं। इस पारदर्शी पॉलिथीन शीट से खेत को तीन से चार सप्ताह तक ढककर रखा जाता है। धान की नर्सरी डालने वाले स्थान को इससे उपचारित किया जा सकता है।
विज्ञापन