फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Saharanpur News ›   Promises were made, governments changed, but the conditions of artisans did not change.

Saharanpur News: वादे हुए, सरकारें बदलीं, नहीं बदले कारीगरों के हालात

Mon, 01 Apr 2024 05:50 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर Updated Mon, 01 Apr 2024 05:50 AM IST
विज्ञापन
Promises were made, governments changed, but the conditions of artisans did not change.
सहारनपुर। एक ऋतु आए, एक ऋतु जाए मौसम बदले ना बदले नसीब। सहारनपुर को देश और दुनिया में पहचान दिलाने वाली काष्ठ कला, जिन कारीगरों के हाथों गढ़ी जाती है, उनकी जिंदगी पर यह गीत फिट बैठता है। काष्ठ कला को उभारने के लिए राजनीतिक दलों ने चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे किए। सरकारें बदली, सांसद बदले, लेकिन जो नहीं बदला वह है कारीगरों के हालात। पहले करीगरों के बाप-दादा मजदूर थे। आज उनके बच्चे और पौते इसी रूप में काम कर रहे हैं। कारीगर कहलाने वाले यह मजदूर कभी मालिक नहीं बन सके हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में यह कारीगर कैसी सरकार चाहते है? और क्या उनकी पीड़ा हैं? यही जानने के लिए अमर उजाला की टीम रविवार को वुडन सिटी यानी खाताखेड़ी क्षेत्र में पहुंची, जहां घर-घर में लकड़ी पर नक्काशी का काम होता है। पेश हैं करीगरों से बातचीत के कुछ अंश...
विज्ञापन

25 सालों में महंगाई के अनुसार नहीं बढ़ी मजदूरी
लकड़ी के पहियों पर औजारों से कारीगरी करते मिले मसरूर ने बताया कि वह 25 साल से लकड़ी पर नक्काशी का काम का रहे हैं। अब से 25 साल पहले 300 से 400 रुपये दिन में कमाते थे, अब वह केवल 500 से 600 रुपये हैं। जबकि महंगाई इससे कई गुना तेजी से बढ़ी है। यह उद्योग करीगरों के दम पर जिंदा है। सरकार को करीगरों के उत्थान के लिए योजना चलानी चाहिए।
विज्ञापन

40 साल बाद भी नहीं बदले हालात
वुडन सिटी में मोहम्मद गुलबहार बीते 15 साल से नक्काशी का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि सभी दल और नेता उनके हालात बदलने के वादे करते रहे हैं, लेकिन वह और उनके बड़े 40 साल पहले भी इस उद्योग में निचले पायदान पर थे और आज भी वही पर है।
विज्ञापन
विज्ञापन

सरकार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चलाए
नक्काशी करते मिले फरमान का कहना है कि वह 15 साल से इस काम को कर रहे हैं। यदि सरकारें इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चलाए तो उद्यमियों के साथ ही कारीगरों के हालात भी बदल सकते हैं। उनका कहना है कि पहले उनके बड़े इस काम करते थे, अब वह कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि कभी मालिक बनेंगे।
परिवार का पेट पालना भी मुश्किल रहता है
दुकान में लकड़ी को गढ़ते मिले मोहम्मद इंतजार का कहना है कि वह 40 साल से इस काम को कर रहे हैं। 40 साल में तमाम दलों की सरकारें बनीं, लेकिन किसी ने लकड़ी पर नक्काशी करने वालों के हालात सुधारने की बात नहीं की। परिवार का पेट पालना मुश्किल रहता है।

सरकार की अनदेखी से मुफलिसी का जीवन
- नूर अहमद का कहना है कि वह दस साल से लकड़ी पर नक्काशी कर रहे हैं। दस घंटे मेहनत करने के बाद पांच सौ रुपये दिन भर में कमाते हैं। जिस काम ने सहारनपुर को दुनिया में पहचान दी, उसी काम के कारीगर आज सरकार की अनदेखी के कारण मुफलिसी में जीवन काट रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed