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मशरूम निर्यात की तैयारी, ऑनलाइन ले रहे प्रशिक्षण
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सहारनपुर। मशरूम की खेती की ओर किसानों के बढ़ते रुझान को देखते हुए इसकी मार्केटिंग के साथ ही निर्यात पर भी फोकस किया जा रहा है। मशरूम उत्पादकों को 11 से 18 मार्च तक ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जनपद के एक दर्जन से अधिक मशरूम उत्पादक प्रशिक्षण ले रहे हैं, जिससे उम्मीद है कि अब सहारनपुर जिले से मशरूम का भी निर्यात होगा। मशरूम का निर्यात शुरू होता है तो न सिर्फ उत्पादकों को बढ़िया आय मिलेगी बल्कि देश को विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होगी।
जिले में 56 गांवों में लगभग 225 किसान मशरूम की खेती कर रहे हैं। जो प्रतिवर्ष 3500 क्विंटल से अधिक मशरूम का उत्पादन करते हैं। मशरूम उत्पादक नजदीकी बाजारों में कम मांग होने और अधिक प्रतिस्पर्धा होने के कारण अधिक मुनाफा नहीं कमा पा रहे हैं।
इसके चलते कृषि विपणन एवं कृषि विदेश व्यापार निदेशालय मशरूम के निर्यात पर फोकस करते हुए इसके उत्पादकों को ऑनलाइन प्रशिक्षण दिला रहा है। इस प्रशिक्षण में निर्यात योग्य मशरूम के उत्पादन के बारे में गुर सिखाए जा रहे हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि कैसे उच्च गुणवत्तायुक्त मशरूम पैदा की जाती है। विदेशों में मशरूम का आयात के क्या मानक हैं और निर्यात करने की क्या प्रक्रिया है। इस प्रशिक्षण से विदेशी आयातक भी जुडे़ हुए हैं।
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वर्ष भर होती है मशरूम की खेती
जनपद में वर्ष भर मशरूम की खेती होती है। इसमें मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर तक, सफेद बटन मशरूम का उत्पादन अक्तूबर से फरवरी तक होता है। ढिंगरी मशरूम की खेती मार्च से लेकर मई तक होती है।
निर्यात के लिए मिल रहे हैं टिप्स
प्रशिक्षण ले रहे गांव भायला निवासी मशरूम उत्पादक रविकांत शर्मा कहते हैं कि निर्यात के लिए किस तरह से पैकिंग होती है, क्या मानक हैं और क्या गुणवत्ता होनी चाहिए, यह जानकारी मिली है। इससे मशरूम का निर्यात करने में आसानी रहेगी।
अहाड़ी अब्दुल्लापुर के रविन्द्र तोगडिया का कहना है कि बाजार में बढ़िया दाम नहीं मिलने से उन्होंने इस बार मशरूम नहीं लगाई है, लेकिन प्रशिक्षण से जुड़कर निर्यात की जानकारी प्राप्त होने पर फिर से मशरूम की खेती की जाएगी। निर्यात के लिए मशरूम के मानकों का ज्ञान हुआ और विदेशी बाजार का भी पता चला है।
वर्जन
जनपद में वर्ष 2008-09 में मात्र 20 से 30 क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता था। जो अब बढ़कर 3500 क्विंटल से अधिक हो गया है। इससे न सिर्फ युवाओं को रोजगार मिला है बल्कि अच्छी आय भी प्राप्त हो रही है। ऑनलाइन प्रशिक्षण से एक दर्जन से अधिक मशरूम उत्पादक जुडे़ हुए हैं। उम्मीद है कि जनपद से मशरूम का निर्यात भी शुरू हो जाएगा। -- डॉ. आईके कुशवाहा, प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र।
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जिले में 56 गांवों में लगभग 225 किसान मशरूम की खेती कर रहे हैं। जो प्रतिवर्ष 3500 क्विंटल से अधिक मशरूम का उत्पादन करते हैं। मशरूम उत्पादक नजदीकी बाजारों में कम मांग होने और अधिक प्रतिस्पर्धा होने के कारण अधिक मुनाफा नहीं कमा पा रहे हैं।
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इसके चलते कृषि विपणन एवं कृषि विदेश व्यापार निदेशालय मशरूम के निर्यात पर फोकस करते हुए इसके उत्पादकों को ऑनलाइन प्रशिक्षण दिला रहा है। इस प्रशिक्षण में निर्यात योग्य मशरूम के उत्पादन के बारे में गुर सिखाए जा रहे हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि कैसे उच्च गुणवत्तायुक्त मशरूम पैदा की जाती है। विदेशों में मशरूम का आयात के क्या मानक हैं और निर्यात करने की क्या प्रक्रिया है। इस प्रशिक्षण से विदेशी आयातक भी जुडे़ हुए हैं।
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वर्ष भर होती है मशरूम की खेती
जनपद में वर्ष भर मशरूम की खेती होती है। इसमें मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर तक, सफेद बटन मशरूम का उत्पादन अक्तूबर से फरवरी तक होता है। ढिंगरी मशरूम की खेती मार्च से लेकर मई तक होती है।
निर्यात के लिए मिल रहे हैं टिप्स
प्रशिक्षण ले रहे गांव भायला निवासी मशरूम उत्पादक रविकांत शर्मा कहते हैं कि निर्यात के लिए किस तरह से पैकिंग होती है, क्या मानक हैं और क्या गुणवत्ता होनी चाहिए, यह जानकारी मिली है। इससे मशरूम का निर्यात करने में आसानी रहेगी।
अहाड़ी अब्दुल्लापुर के रविन्द्र तोगडिया का कहना है कि बाजार में बढ़िया दाम नहीं मिलने से उन्होंने इस बार मशरूम नहीं लगाई है, लेकिन प्रशिक्षण से जुड़कर निर्यात की जानकारी प्राप्त होने पर फिर से मशरूम की खेती की जाएगी। निर्यात के लिए मशरूम के मानकों का ज्ञान हुआ और विदेशी बाजार का भी पता चला है।
वर्जन
जनपद में वर्ष 2008-09 में मात्र 20 से 30 क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता था। जो अब बढ़कर 3500 क्विंटल से अधिक हो गया है। इससे न सिर्फ युवाओं को रोजगार मिला है बल्कि अच्छी आय भी प्राप्त हो रही है। ऑनलाइन प्रशिक्षण से एक दर्जन से अधिक मशरूम उत्पादक जुडे़ हुए हैं। उम्मीद है कि जनपद से मशरूम का निर्यात भी शुरू हो जाएगा। -- डॉ. आईके कुशवाहा, प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र।