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राज्य सरकार की रिपोर्ट के बाद बढ़ा सियासी ताप
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Mon, 12 Jun 2017 12:35 AM IST
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जातीय हिंसा से झुलस रहे सहारनपुर को लेकर राज्य सरकार की ओर से गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के बाद सियासी तूफान मच गया है। अब इस रिपोर्ट के बाद प्रशासन और पुलिस पर भी कार्रवाई की चुनौती होगी।
हिंसा की प्रमुख दोषी भीम आर्मी और उसके संस्थापक पर शिकंजा कसने के बाद अब मुस्लिम नेताओं को चिह्नित कर उसका खुलासा करना बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा सांसद सहित सड़क दूधली पर होने वाली कार्रवाई पर भी सबकी निगाहें होंगी।
उधर, सांसद ने इस पूरी रिपोर्ट में खुद पर लगे आरोप से पल्ला झाड़ा है और पूर्व एसएसपी पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हाेकर काम करने का आरोप लगाया।सहारनपुर हिंसा को लेकर गृह मंत्रालय को भेजी गई पांच पेज की रिपोर्ट ने सहारनपुर के सियासी तापमान को चढ़ा दिया है। दरअसल, सहारनपुर में दलित और मुस्लिम बेहद निर्णायक भूमिका में रहे हैं।
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यही कारण है कि सियासी दलों के लिए यह गठजोड़ मुफीद साबित होता रहा है। मगर, कुछ समय से बदले हुए समीकरण में यह गठजोड़ आसानी से नहीं बन पा रहा है। विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद बसपा ने जिले के बड़े मुस्लिम चेहरों को पार्टी में शामिल किया।
इसमें पूर्व सांसद रशीद मसूद, पूर्व सांसद मंसूर अली सहित कई अन्य नाम हैं। उधर, कांग्रेस और सपा गठबंधन को भी चार सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।
विधानसभा चुनाव से एक बात साफ हो गई थी कि भाजपा ने दलितों में जबरदस्त सेंधमारी कर ली थी। यही कारण है कि दलितों में अपनी पैठ मजबूत करने के उद्देश्य से ही सांसद राघव लखनपाल शर्मा सात साल से बंद पड़ी शोभायात्रा निकालने पर अड़े और सांप्रदायिक टकराव हो गया।
इसके बाद एसएसपी आवास पहुंचे तो उनका दांव ही उलटा पड़ गया। हालांकि इस टकराव के बाद मुस्लिम नेताओं को हिंदू लामबंदी का खतरा बढ़ा और फिर नतीजा सामने है।
हालांकि राज्य सरकार की रिपोर्ट भले ही सांसद को कटघरे में खड़े कर रही हो, मगर मुस्लिम नेताओं पर निशाना सधने से दलितों को जरूर हिंसा के पीछे के सियासी मायने समझ में आएंगे।
कुल मिलाकर इस रिपोर्ट से ना केवल राज्य सरकार विरोधियों को मौका नहीं देना चाहती। वही इस रिपोर्ट के बाद सहारनपुर हिंसा को लेकर राजनीति गर्मानी तय हैं।
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हिंसा की प्रमुख दोषी भीम आर्मी और उसके संस्थापक पर शिकंजा कसने के बाद अब मुस्लिम नेताओं को चिह्नित कर उसका खुलासा करना बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा सांसद सहित सड़क दूधली पर होने वाली कार्रवाई पर भी सबकी निगाहें होंगी।
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उधर, सांसद ने इस पूरी रिपोर्ट में खुद पर लगे आरोप से पल्ला झाड़ा है और पूर्व एसएसपी पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हाेकर काम करने का आरोप लगाया।सहारनपुर हिंसा को लेकर गृह मंत्रालय को भेजी गई पांच पेज की रिपोर्ट ने सहारनपुर के सियासी तापमान को चढ़ा दिया है। दरअसल, सहारनपुर में दलित और मुस्लिम बेहद निर्णायक भूमिका में रहे हैं।
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यही कारण है कि सियासी दलों के लिए यह गठजोड़ मुफीद साबित होता रहा है। मगर, कुछ समय से बदले हुए समीकरण में यह गठजोड़ आसानी से नहीं बन पा रहा है। विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद बसपा ने जिले के बड़े मुस्लिम चेहरों को पार्टी में शामिल किया।
इसमें पूर्व सांसद रशीद मसूद, पूर्व सांसद मंसूर अली सहित कई अन्य नाम हैं। उधर, कांग्रेस और सपा गठबंधन को भी चार सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।
विधानसभा चुनाव से एक बात साफ हो गई थी कि भाजपा ने दलितों में जबरदस्त सेंधमारी कर ली थी। यही कारण है कि दलितों में अपनी पैठ मजबूत करने के उद्देश्य से ही सांसद राघव लखनपाल शर्मा सात साल से बंद पड़ी शोभायात्रा निकालने पर अड़े और सांप्रदायिक टकराव हो गया।
इसके बाद एसएसपी आवास पहुंचे तो उनका दांव ही उलटा पड़ गया। हालांकि इस टकराव के बाद मुस्लिम नेताओं को हिंदू लामबंदी का खतरा बढ़ा और फिर नतीजा सामने है।
हालांकि राज्य सरकार की रिपोर्ट भले ही सांसद को कटघरे में खड़े कर रही हो, मगर मुस्लिम नेताओं पर निशाना सधने से दलितों को जरूर हिंसा के पीछे के सियासी मायने समझ में आएंगे।
कुल मिलाकर इस रिपोर्ट से ना केवल राज्य सरकार विरोधियों को मौका नहीं देना चाहती। वही इस रिपोर्ट के बाद सहारनपुर हिंसा को लेकर राजनीति गर्मानी तय हैं।