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सहारनपुर की आबो-हवा में प्रदूषण का जहरीला साया
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Mon, 05 Jun 2017 02:04 AM IST
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प्रदूषित हो चुकी हिंडन नदी।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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आज पूरी दुनिया पर्यावरण दिवस मना रही है। यहां भी सरकारी और गैर सरकारी संगठन पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए विचार संगोष्ठियां कर रहे हैं, मगर जहरीली हो चुकी सहारनपुर की आबोहवा से लोगों को बचाने के लिए व्यापक स्तर पर कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
पर्यावरण को बचाने का दम भरने वालों के साथ ही शासन और प्रशासन भी इसे लेकर लापरवाह बना हुआ है। आलम यह है कि लोग लगातार दूषित पानी और हवा में सांस लेकर मौत का शिकार बन रहे हैं। फैक्ट्रियों और कारखानों से निकलने वाले केमिकलयुक्त पानी की वजह से हिन्डन नदी पूरी तरह जहरीली हो चुकी है, जिससे हर कोई वाकिफ है। यह नदी सहारनपुर में करीब 35 किलोमीटर लंबा सफर तय करती है। इसके तटों पर बसे लगभग सभी गांवों का भूजल करीब 15 साल से दूषित हो चुका है।
हैंडपंप लगातार जीवनदायिनी पानी की जगह जहर उगल रहे हैं, जिसे पीकर लोग कैंसर समेत अनेक जानलेवा बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हिंडन के पानी को पुन: अविरल बनाने के लिए क्षेत्रवासी अनेक बार आंदोलन और भूख हड़ताल तक कर चुके हैं। आंदोलनों की भनक लगने के बाद एनजीटी ने हिन्डन की जांच कराई, जिसमें इसका पानी जहरीला पाया गया।
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एनजीटी के आदेश पर प्रदेश सरकार ने एक कमेटी गठित की है, जो इसका सर्वे भी कर चुकी है। जलपुरुष राजेंद्र सिंह भी उस कमेटी का हिस्सा है। करीब छह महीने से हिन्डन को साफ करने की तैयारी शुरू होने की बात कही जा रही है, मगर अभी तक कोई काम शुरू होता नजर नहीं आया है।
इसके अलावा शहर के बीच से होकर गुजर रही ढमोला नदी भी लगातार प्रदूषित हो रही है। साथ ही सहारनपुर की गंगा कही जाने वाली पांवधोई नदी का अस्तित्व भी खतरे में है। बता दें कि कचरा निस्तारण की व्यवस्था करने के लिए नगर निगम जमीन तलाश रहा है।
सफाई व्यवस्था से जुड़े तमाम अधिकारियों को साफ-सफाई करते समय सावधानी बरतें।
इसके अलावा पांवधोई नदी को दूषित होने के बचाने के लिए प्रत्येक वर्ष इसकी सफाई कराई जाती है। इसके लिए पांवधोई बचाओ समिति भी बनी हुई है।
अब तक भी शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं
एनजीटी हिंडन किनारे बसे गांवों के लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के आदेश जारी कर चुकी है, मगर शासन और प्रशासन की ओर से अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। आलम यह है कि आज भी लोग जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं और बीमारियों से जूझ रहे हैं।
भनेड़ा खेमचंद से उखाड़े गए 15 हैंडपंप
एनजीटी ने वर्ष 2015 में नानौता क्षेत्र के गांव भनेड़ा खेमचंद के हैंडपंपों का पानी दूषित पाया था। जल निगम को उक्त हैंडपंप उखड़वाने के आदेश दिए गए थे। इसके बाद जल निगम ने 15 हैंडपंपों को उखड़वा दिया था। डीएम ने डिस्टलरी और चीनी मिल से कहकर गांव में पेयजल के लिए समर्सिबल लगवाए थे।
मगर वह पर्याप्त नहीं हैं। जल निगम ने गांव में टंकी के लिए शासन को एक करोड़ 26 लाख रुपये का प्रस्ताव भेजा था। पैसा सेंक्शन भी हो गया था, मगर आज तक पैसा रिलीज न होने की वजह से पेयजल की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
ध्वनि प्रदूषण भी 100 डेसीबल तक पहुंचा
जिले में ध्वनि प्रदूषण भीकम नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार रिहायशी क्षेत्रों में ध्वनि की मात्रा 45 डेसीबल 75 डेसीबल तक होनी चाहिए, मगर सहारनपुर में यह प्रदूषण सौ डेसीबल तक पहुंच गया है। जिला अस्पताल और कोर्ट रोड से सटे क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण सबसे अधिक मापा गया है।
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पर्यावरण को बचाने का दम भरने वालों के साथ ही शासन और प्रशासन भी इसे लेकर लापरवाह बना हुआ है। आलम यह है कि लोग लगातार दूषित पानी और हवा में सांस लेकर मौत का शिकार बन रहे हैं। फैक्ट्रियों और कारखानों से निकलने वाले केमिकलयुक्त पानी की वजह से हिन्डन नदी पूरी तरह जहरीली हो चुकी है, जिससे हर कोई वाकिफ है। यह नदी सहारनपुर में करीब 35 किलोमीटर लंबा सफर तय करती है। इसके तटों पर बसे लगभग सभी गांवों का भूजल करीब 15 साल से दूषित हो चुका है।
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हैंडपंप लगातार जीवनदायिनी पानी की जगह जहर उगल रहे हैं, जिसे पीकर लोग कैंसर समेत अनेक जानलेवा बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हिंडन के पानी को पुन: अविरल बनाने के लिए क्षेत्रवासी अनेक बार आंदोलन और भूख हड़ताल तक कर चुके हैं। आंदोलनों की भनक लगने के बाद एनजीटी ने हिन्डन की जांच कराई, जिसमें इसका पानी जहरीला पाया गया।
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एनजीटी के आदेश पर प्रदेश सरकार ने एक कमेटी गठित की है, जो इसका सर्वे भी कर चुकी है। जलपुरुष राजेंद्र सिंह भी उस कमेटी का हिस्सा है। करीब छह महीने से हिन्डन को साफ करने की तैयारी शुरू होने की बात कही जा रही है, मगर अभी तक कोई काम शुरू होता नजर नहीं आया है।
इसके अलावा शहर के बीच से होकर गुजर रही ढमोला नदी भी लगातार प्रदूषित हो रही है। साथ ही सहारनपुर की गंगा कही जाने वाली पांवधोई नदी का अस्तित्व भी खतरे में है। बता दें कि कचरा निस्तारण की व्यवस्था करने के लिए नगर निगम जमीन तलाश रहा है।
सफाई व्यवस्था से जुड़े तमाम अधिकारियों को साफ-सफाई करते समय सावधानी बरतें।
इसके अलावा पांवधोई नदी को दूषित होने के बचाने के लिए प्रत्येक वर्ष इसकी सफाई कराई जाती है। इसके लिए पांवधोई बचाओ समिति भी बनी हुई है।
अब तक भी शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं
एनजीटी हिंडन किनारे बसे गांवों के लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के आदेश जारी कर चुकी है, मगर शासन और प्रशासन की ओर से अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। आलम यह है कि आज भी लोग जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं और बीमारियों से जूझ रहे हैं।
भनेड़ा खेमचंद से उखाड़े गए 15 हैंडपंप
एनजीटी ने वर्ष 2015 में नानौता क्षेत्र के गांव भनेड़ा खेमचंद के हैंडपंपों का पानी दूषित पाया था। जल निगम को उक्त हैंडपंप उखड़वाने के आदेश दिए गए थे। इसके बाद जल निगम ने 15 हैंडपंपों को उखड़वा दिया था। डीएम ने डिस्टलरी और चीनी मिल से कहकर गांव में पेयजल के लिए समर्सिबल लगवाए थे।
मगर वह पर्याप्त नहीं हैं। जल निगम ने गांव में टंकी के लिए शासन को एक करोड़ 26 लाख रुपये का प्रस्ताव भेजा था। पैसा सेंक्शन भी हो गया था, मगर आज तक पैसा रिलीज न होने की वजह से पेयजल की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
ध्वनि प्रदूषण भी 100 डेसीबल तक पहुंचा
जिले में ध्वनि प्रदूषण भीकम नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार रिहायशी क्षेत्रों में ध्वनि की मात्रा 45 डेसीबल 75 डेसीबल तक होनी चाहिए, मगर सहारनपुर में यह प्रदूषण सौ डेसीबल तक पहुंच गया है। जिला अस्पताल और कोर्ट रोड से सटे क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण सबसे अधिक मापा गया है।