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पूरा नहीं हो सका एक भी कलस्टर
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सहारनपुर। किसानों की आय को दुगना करने के उद्देश्य से शुरू की गई उत्तर प्रदेश कृषि निर्यात नीति के लागू होने के तीन महीने बाद भी जिले में एक भी कलस्टर पूरा नहीं हो सका। बासमती के तीन कलस्टर अभी भी बनने की प्रक्रिया में हैं। कलस्टर में उत्पादित उत्पादों का न्यूनतम 30 प्रतिशत निर्यात होना है। जिस पर कलस्टर में शामिल किसानों को अनुदान भी दिया जाएगा। कलस्टर बनने में देरी का मुख्य कारण कोरोना संक्रमण को बताया जा रहा है।
कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश कृषि निर्यात नीति लागू की है। जिससे किसानों की आय को दुगना किया जा सके। इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए जिलाधिकारी अखिलेश सिंह ने मार्च 2021 में संबंधित विभागों के अधिकारियों की बैठक की थी। इन कलस्टरों में पैदा किए गए उत्पादों का न्यूनतम 30 प्रतिशत निर्यात करने का प्रावधान रखा गया है। इसके लिए बॉयर- सेलर मीट भी आयोजित की जा चुकी है। इसके अलावा इन्हें न सिर्फ कृषि की नवीनतम तकनीक से लैस किया जाना है बल्कि समय-समय पर कृषि वैज्ञानिकों से भी टिप्स दिलाना भी है। खाद्य प्रसंस्करण इकाई लगाने और उत्पादों के परिवहन पर भी अनुदान देने की योजना है।
जनपद में बनने हैं इनके कलस्टर
जनपद में विभिन्न फसलों के कलस्टर बनाए जाने हैं। इनमें बासमती धान, आम, अमरूद, लीची, खीरा, शहद, मशरूम, मत्स्य, मुर्गी पालन आदि शामिल हैं। कलस्टर का न्यूनतम क्षेत्रफल 50 हेक्टेयर होना चाहिए। इनमें 50 से 100 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले कलस्टर को 10 लाख रुपये, 100 से 150 हेक्टेयर वाले कलस्टर को 16 लाख रुपये और 150 से 200 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले कलस्टर को 22 लाख रुपये का अनुदान दिए जाने का प्रावधान है।
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बासमती के तीन कलस्टर बनने की प्रक्रिया में
बासमती धान के तीन कलस्टर बनने की प्रक्रिया में हैं। शेष विभाग भी कलस्टर बनाने की कार्रवाई में जुटे हुए हैं। कोरोना संक्रमण के चलते इसमें देरी हुई है। उम्मीद है कि जल्द ही संबंधित विभाग कलस्टर बना लेंगे। ---- सुनील कुमार, नोडल अधिकारी एवं ज्येष्ठ कृषि विपणन निरीक्षक।
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कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश कृषि निर्यात नीति लागू की है। जिससे किसानों की आय को दुगना किया जा सके। इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए जिलाधिकारी अखिलेश सिंह ने मार्च 2021 में संबंधित विभागों के अधिकारियों की बैठक की थी। इन कलस्टरों में पैदा किए गए उत्पादों का न्यूनतम 30 प्रतिशत निर्यात करने का प्रावधान रखा गया है। इसके लिए बॉयर- सेलर मीट भी आयोजित की जा चुकी है। इसके अलावा इन्हें न सिर्फ कृषि की नवीनतम तकनीक से लैस किया जाना है बल्कि समय-समय पर कृषि वैज्ञानिकों से भी टिप्स दिलाना भी है। खाद्य प्रसंस्करण इकाई लगाने और उत्पादों के परिवहन पर भी अनुदान देने की योजना है।
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जनपद में बनने हैं इनके कलस्टर
जनपद में विभिन्न फसलों के कलस्टर बनाए जाने हैं। इनमें बासमती धान, आम, अमरूद, लीची, खीरा, शहद, मशरूम, मत्स्य, मुर्गी पालन आदि शामिल हैं। कलस्टर का न्यूनतम क्षेत्रफल 50 हेक्टेयर होना चाहिए। इनमें 50 से 100 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले कलस्टर को 10 लाख रुपये, 100 से 150 हेक्टेयर वाले कलस्टर को 16 लाख रुपये और 150 से 200 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले कलस्टर को 22 लाख रुपये का अनुदान दिए जाने का प्रावधान है।
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बासमती के तीन कलस्टर बनने की प्रक्रिया में
बासमती धान के तीन कलस्टर बनने की प्रक्रिया में हैं। शेष विभाग भी कलस्टर बनाने की कार्रवाई में जुटे हुए हैं। कोरोना संक्रमण के चलते इसमें देरी हुई है। उम्मीद है कि जल्द ही संबंधित विभाग कलस्टर बना लेंगे। ---- सुनील कुमार, नोडल अधिकारी एवं ज्येष्ठ कृषि विपणन निरीक्षक।