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Saharanpur News: न रंग, न हुड़दंग...दुल्हेंडी पर वेदों का संदेश देता है औरंगाबाद

Fri, 27 Feb 2026 01:10 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर Updated Fri, 27 Feb 2026 01:10 AM IST
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No colors, no chaos... Aurangabad gives the message of the Vedas on Dussehra
बिहारीगढ़। करीब 100 पहले हुई एक घटना ने औरंगाबाद गांव में एक अनूठी परंपरा को जन्म दिया था, जो आज भी बदस्तूर जारी है। दुल्हेंडी के दिन जहां अक्सर गांवों में रंग डालने को लेकर लड़ाई-झगड़े सामने आते हैं, वहीं औरंगाबाद एक ऐसा गांव है, जहां पर ग्रामीण रंगों से नहीं खेलते। बल्कि इस दिन आर्य समाज की तरफ से भक्तिरस कार्यक्रम होता है। ग्रामीण हुड़दंगबाजी से दूर रहकर प्रवचन और भजनों का आनंद लेते हैं।
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गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव में वर्ष 1927 से यह परंपरा चली आ रही है। होलिका दहन, दुल्हेंडी तथा इसके अगले दिन तक आर्य समाज के तत्वावधान में गांव का भ्रमण कर लोगों को उपदेश देकर वेदों का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया जाता है। महर्षि दयानंद सरस्वती के संदेशों को घर-घर तक पहुंचाया जाता है। तीनों दिन यज्ञ होता है। इस कार्यक्रम और यज्ञ में प्रत्येक घर से भागीदारी होती है। इस दौरान भजनोपदेशक अपने भजनों तथा उपदेशों से लोगों को समाज में फैली कुरीतियों से बचने के लिए प्रेरित करते हैं। ग्रामीणों ने बताया इस बार भी गांव में आर्य समाज का विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके लिए यज्ञ कुंड बनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
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-गांव के सबसे बुजुर्ग धर्मपाल कांबोज (108 ) बताते हैं कि 100 साल पहले दुल्हेंडी वाले दिन कुछ लोगों ने एक ग्रामीण के मुंह पर कालिख पोत दी थी। इस पर गांव के जिम्मेदार लोगों ने ऐतराज किया तथा पंचायत कर इस तरह की हरकतों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए इस धार्मिक आयोजन की पहल की थी ।
- मास्टर महिपाल सिंह (80 ) बताते हैं कि फाग के दिन युवा नशे और हुड़दंगबाजी से दूर रहकर भजनों का आनंद लेते हैं। यह तीन दिन ग्रामीणों के लिए आत्मशुद्धि करने का बेहतर अवसर लेकर आते हैं।
- नाथीराम कांबोज (81 ) बताते हैं कि उनके गांव में फाग पर कभी लड़ाई झगड़ा नहीं हुआ। यह बड़े बुजुर्गों की चलाई परंपरा का ही परिणाम है।
- डॉ. राजवीर बताते हैं कि एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद बुजुर्गों की चलाई यह परंपरा आज भी नई पीढ़ी का मार्गदर्शन कर रही है।
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