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मल्चिंग विधि : लागत कम और पानी की बचत
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सहारनपुर। जनपद के कुछ किसान गोभी, बैंगन, मिर्च, स्ट्राबेरी, तरबूज, खरबूजा सहित अन्य खेती में आधुनिक मल्चिंग विधि का उपयोग कर रहे हैं। इसमें जहां फसल की लागत में कमी आती है वहीं पानी की भी बचत होती है। इसमें खरपतवार भी नहीं के बराबर होते हैं। इससे निराई गुड़ाई का खर्च में भी कमी आती है।
कई फसलों और बागवानी में मल्चिंग विधि कारगर साबित हो रही है। इस विधि में सबसे पहले क्यारी में बेड बनाए जाते हैं। उसके ऊपर मल्चिंग पॉलिथीन बिछाई जाती है। जिसमें पौधे के लिए छेद कर लिए जाते हैं। इन छेदों में पौधों की रोपाई की जाती है। अधिकांशतया मल्चिंग विधि का प्रयोग करने वाले सिंचाई की ड्रिप विधि का भी प्रयोग करते हैं। ड्रिप को मल्चिंग पॉलीथीन के नीचे लगाया जाता है। इसमें पौधों के जड़ों का न सिर्फ तेजी से विकास होता है, बल्कि उर्वरकों का भी पूरा सदुपयोग होता है। खरपतवार कम होने से निराई का खर्च भी बच जाता है, साथ ही उत्पादन भी बढ़िया होता है।
क्या है मल्चिंग विधि
मल्चिंग खेती की आधुनिक विधि है। इसमें पहले क्यारीनुमा बेड बनाए जाते हैं। जिसमें मल्चिंग पॉलीथीन बिछाई जाती है। इस पॉलीथीन के नीचे सिंचाई के लिए ड्रिप लगाई जाती है। इससे पानी की बर्बादी रुकती है। पानी सीधे पौधे की जड़ों तक जाता है। इससे करीब 40 से 50 प्रतिशत तक पानी और निराई गुड़ाई के खर्च की बचत होती है।
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क्या कहते हैं किसान
घटती है फसल की लागत
तरबूज एवं खरबूजा की खेती में मल्चिंग विधि का प्रयोग किया है। इसमें पौधों की जड़ों में नमी बनी रहती है। खरपतवार नहीं होने से निराई गुड़ाई का खर्च बचा है। अब अमरूद के बाग में भी मल्चिंग विधि का प्रयोग किया गया है। सब्जियों और बागवानी में यह विधि कारगर है। - सुशील कुमार, किसान गांव झींवरहेड़ी।
रुकती है पानी की बर्बादी
इस बार खरबूजा की खेती में मल्चिंग विधि अपनाई है। मल्चिंग से फसल की जड़ों में नमी अधिक समय तक बनी रहती है। तापमान भी नियंत्रित रहता है। जिससे पानी की बर्बादी रुकती है। इसके अलावा पौधों की जड़ों का विकास भी तेजी से होता है। इस विधि का प्रयोग सफल रहा है। - राजेश , किसान चमारीखेड़ा।
जनपद में कई किसान सब्जियों की खेती मल्चिंग विधि से कर रहे हैं। फसल की लागत कम होने के चलते किसानों का रुझान इस ओर बढ़ रहा है। कई बागवान भी अमरूद आदि में इस विधि का प्रयोग कर रहे हैं। फायदेमंद होने के कारण इसके लिए किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है। - अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।
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कई फसलों और बागवानी में मल्चिंग विधि कारगर साबित हो रही है। इस विधि में सबसे पहले क्यारी में बेड बनाए जाते हैं। उसके ऊपर मल्चिंग पॉलिथीन बिछाई जाती है। जिसमें पौधे के लिए छेद कर लिए जाते हैं। इन छेदों में पौधों की रोपाई की जाती है। अधिकांशतया मल्चिंग विधि का प्रयोग करने वाले सिंचाई की ड्रिप विधि का भी प्रयोग करते हैं। ड्रिप को मल्चिंग पॉलीथीन के नीचे लगाया जाता है। इसमें पौधों के जड़ों का न सिर्फ तेजी से विकास होता है, बल्कि उर्वरकों का भी पूरा सदुपयोग होता है। खरपतवार कम होने से निराई का खर्च भी बच जाता है, साथ ही उत्पादन भी बढ़िया होता है।
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क्या है मल्चिंग विधि
मल्चिंग खेती की आधुनिक विधि है। इसमें पहले क्यारीनुमा बेड बनाए जाते हैं। जिसमें मल्चिंग पॉलीथीन बिछाई जाती है। इस पॉलीथीन के नीचे सिंचाई के लिए ड्रिप लगाई जाती है। इससे पानी की बर्बादी रुकती है। पानी सीधे पौधे की जड़ों तक जाता है। इससे करीब 40 से 50 प्रतिशत तक पानी और निराई गुड़ाई के खर्च की बचत होती है।
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क्या कहते हैं किसान
घटती है फसल की लागत
तरबूज एवं खरबूजा की खेती में मल्चिंग विधि का प्रयोग किया है। इसमें पौधों की जड़ों में नमी बनी रहती है। खरपतवार नहीं होने से निराई गुड़ाई का खर्च बचा है। अब अमरूद के बाग में भी मल्चिंग विधि का प्रयोग किया गया है। सब्जियों और बागवानी में यह विधि कारगर है। - सुशील कुमार, किसान गांव झींवरहेड़ी।
रुकती है पानी की बर्बादी
इस बार खरबूजा की खेती में मल्चिंग विधि अपनाई है। मल्चिंग से फसल की जड़ों में नमी अधिक समय तक बनी रहती है। तापमान भी नियंत्रित रहता है। जिससे पानी की बर्बादी रुकती है। इसके अलावा पौधों की जड़ों का विकास भी तेजी से होता है। इस विधि का प्रयोग सफल रहा है। - राजेश , किसान चमारीखेड़ा।
जनपद में कई किसान सब्जियों की खेती मल्चिंग विधि से कर रहे हैं। फसल की लागत कम होने के चलते किसानों का रुझान इस ओर बढ़ रहा है। कई बागवान भी अमरूद आदि में इस विधि का प्रयोग कर रहे हैं। फायदेमंद होने के कारण इसके लिए किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है। - अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।