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Saharanpur News: 16 वीं शताब्दी में मराठा राजा रामचंद्र ने कराया था ठाकुरद्वारा मंदिर का निर्माण
Sat, 24 Aug 2024 02:43 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Sat, 24 Aug 2024 02:43 AM IST
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देवबंद का प्राचीन सिद्धपीठ श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर । -संवाद
सहारनपुर, देवबंद। प्राचीन सिद्धपीठ श्री पंचायती ठाकुरद्वारा मंदिर का इतिहास अति प्राचीन है। 16 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के बेटे मराठा राजा रामचंद्र ने मंदिर का निर्माण कराने के साथ राधा-कृष्ण की मूर्ति स्थापित कराई थी। 1917 से श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती हैं, जिसमें करीब 20 फिट ऊंचा स्वर्णिम रथ आकर्षण केंद्र होता है।
मंदिर में प्रत्येक वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर रथयात्रा महोत्सव का आयोजन होता है। कार्यक्रमों की शुरुआत रक्षाबंधन से हो जाती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दो दिन बाद शोभायात्रा के साथ कार्यक्रम संपन्न होते हैं। यह परंपरा 16वीं शताब्दी से चली आ रही है। स्वर्णिम रथ में राधा रानी और भगवान श्री कृष्ण मूर्ति विराजमान रहती है। दर्शन करने को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग जाती है। रथ का सारथी बनने के लिए श्रद्धालुओं में होड़ रहती है।
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चैतन्य महाप्रभु ने श्रद्धालुओं में जगाई थी भक्ति की भावना
मंदिर समिति के अध्यक्ष विनोद प्रकाश गुप्ता व कोषाध्यक्ष अशोक कुमार गुप्ता बताते हैं कि चैतन्य महाप्रभु ने मंदिर कीर्तन से लोगों में भक्ति भावना को जागृत किया। शोभायात्रा में श्री हित हरिवंश राधा नवरंगी लाल के मिलन की रस्म अदा कराई जाती है। 16 वीं शताब्दी में श्रद्धालु पैदल ही भजन कीर्तन के साथ नगर परिक्रमा करते थे। 18 वीं शताब्दी में घोड़ा बग्गी के रथ को फूलों से सजाकर यात्रा निकाली गई। 19 वीं शताब्दी में मथुरा से रथ किराए पर लाया गया। वर्ष 1917 से स्वर्णिम रथ पर शोभायात्रा निकाली जा रही है।
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कुएं की खुदाई में निकली मूर्ति भी मंदिर में विराजमान
श्री पंचायती ठाकुर द्वारा मंदिर में स्थापित ठाकुर जी प्राचीन एक मूर्ति 1400 वर्ष पूर्व खुदाई के दौरान कुुएं से निकली थी। तब, हिंदू सम्राट हर्षवर्धन ने भ्रमण दौरान चंदन के वृक्षों से घिरे देवीवन (देवबंद) के घने जंगल में सिद्धपीठ श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी निकट पड़ाव डाला था। मंदिर के निकट कुएं की खुदाई दौरान मजदूरों को अचानक एक काले पत्थर की मूर्ति प्रगट होते दिखाई दी। तब, हर्षवर्धन मौके पर पहुंचे और दो फिट ऊंची मूर्ति को गोद में उठा लिया। इसके बाद मूर्ति को नगर में ही एक टीले पर प्रतिष्ठित कराया है, यहां अब ठाकुरद्वारा मंदिर है।
संवाद
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मंदिर में प्रत्येक वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर रथयात्रा महोत्सव का आयोजन होता है। कार्यक्रमों की शुरुआत रक्षाबंधन से हो जाती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दो दिन बाद शोभायात्रा के साथ कार्यक्रम संपन्न होते हैं। यह परंपरा 16वीं शताब्दी से चली आ रही है। स्वर्णिम रथ में राधा रानी और भगवान श्री कृष्ण मूर्ति विराजमान रहती है। दर्शन करने को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग जाती है। रथ का सारथी बनने के लिए श्रद्धालुओं में होड़ रहती है।
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चैतन्य महाप्रभु ने श्रद्धालुओं में जगाई थी भक्ति की भावना
मंदिर समिति के अध्यक्ष विनोद प्रकाश गुप्ता व कोषाध्यक्ष अशोक कुमार गुप्ता बताते हैं कि चैतन्य महाप्रभु ने मंदिर कीर्तन से लोगों में भक्ति भावना को जागृत किया। शोभायात्रा में श्री हित हरिवंश राधा नवरंगी लाल के मिलन की रस्म अदा कराई जाती है। 16 वीं शताब्दी में श्रद्धालु पैदल ही भजन कीर्तन के साथ नगर परिक्रमा करते थे। 18 वीं शताब्दी में घोड़ा बग्गी के रथ को फूलों से सजाकर यात्रा निकाली गई। 19 वीं शताब्दी में मथुरा से रथ किराए पर लाया गया। वर्ष 1917 से स्वर्णिम रथ पर शोभायात्रा निकाली जा रही है।
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कुएं की खुदाई में निकली मूर्ति भी मंदिर में विराजमान
श्री पंचायती ठाकुर द्वारा मंदिर में स्थापित ठाकुर जी प्राचीन एक मूर्ति 1400 वर्ष पूर्व खुदाई के दौरान कुुएं से निकली थी। तब, हिंदू सम्राट हर्षवर्धन ने भ्रमण दौरान चंदन के वृक्षों से घिरे देवीवन (देवबंद) के घने जंगल में सिद्धपीठ श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी निकट पड़ाव डाला था। मंदिर के निकट कुएं की खुदाई दौरान मजदूरों को अचानक एक काले पत्थर की मूर्ति प्रगट होते दिखाई दी। तब, हर्षवर्धन मौके पर पहुंचे और दो फिट ऊंची मूर्ति को गोद में उठा लिया। इसके बाद मूर्ति को नगर में ही एक टीले पर प्रतिष्ठित कराया है, यहां अब ठाकुरद्वारा मंदिर है।
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