{"_id":"6984e24bc687c6b6490d9d69","slug":"innocents-are-caught-in-the-game-20-to-25-cases-are-coming-daily-saharanpur-news-c-30-1-sah1001-168762-2026-02-06","type":"story","status":"publish","title_hn":"Saharanpur News: गेम की गिरफ्त में मासूम, रोज आ रहे 20 से 25 मामले","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Saharanpur News: गेम की गिरफ्त में मासूम, रोज आ रहे 20 से 25 मामले
विज्ञापन
- गाजियाबाद में तीन बहनों के आत्महत्या किए जाने के बाद यहां भी मां-बाप चिंतित
- मनोचिकित्सक बोले-बच्चों के व्यवहार में आ रहा बदलाव, मानसिक बीमार न बनें
संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। खिलौनों से खेलने वाली उम्र अब स्मार्टफोन की स्क्रीन पर पबजी, फ्री फायर और बीजीएमई जैसे हिंसक खेलों में सिमट कर रह गई है। गाजियाबाद में तीन बहनों के आत्महत्या किए जाने के बाद यहां भी मां-बाप चिंतित हैं। जिले में 10 से अधिक मनोचिकित्सक हैं, जिनके पास आए दिन 20 से 25 किशोर इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
एसबीडी जिला अस्पताल में अर्श क्लीनिक है। यहां पर 11 से 19 साल के किशोरों का इलाज और काउंसिलिंग होती है। हाल ही में एक दंपती अर्श क्लीनिक पहुंची। उन्होंने बताया कि उनका बच्चा 11 साल का है, जिसे खाने के साथ-साथ गेम खेलने की लत गई है। दिनभर मोबाइल में गेम खेलता है। उसके गेम के बारे में हमें भी नहीं पता। बच्चे की काउंसिलिंग की गई। उसे कुछ दवाएं दीं। अर्श क्लीनिक में रोजाना 20 से 25 किशोर आते हैं। गेम की लत वाले भी आते हैं। बच्चे को आठ दिन बाद फालोअप के लिए बुलाया जाता है। देखा जाता है कि उसमें कितना सुधार हुआ है। जिले में निजी मनोचिकित्सकों के यहां गेम खेलने के ज्यादा मामले आ रहे हैं।
-- 12 से 17 साल की आयु वाले ज्यादा प्रभावित
विभिन्न जांचों से पता चलता है कि 12 से 17 साल के किशोर इस लत का सबसे आसान शिकार बन रहे हैं। पबजी, फ्री फायर गेम्स में मिलने वाली आभासी जीत उन्हें वास्तविक जीवन से दूर रही है। जब यह आभासी दुनिया टूटती है चाहे वह इंटरनेट रिचार्ज खत्म होना हो या माता-पिता द्वारा फोन छीनना तो वह हिंसक व्यवहार और अवसाद का शिकार हो जाते हैं।
विज्ञापन
-- कहीं न कहीं अभिभावक भी जिम्मेदार
एसबीडी जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. इंदू रानी ने बताया कि बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं या खेल रहे। कहीं न कहीं इसके लिए अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। कुछ गेम ऐसे हैं, जो बच्चों व किशोरों का दिमाग अपने पर आश्रित करा लेते हैं। यह भी समझना चाहिए कि रील और रियल दुनिया अलग है। इसे जिंदगी का हिस्सा न बनाएं। बच्चों को गेम खेलने से रोकें।
विज्ञापन
- मनोचिकित्सक बोले-बच्चों के व्यवहार में आ रहा बदलाव, मानसिक बीमार न बनें
संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। खिलौनों से खेलने वाली उम्र अब स्मार्टफोन की स्क्रीन पर पबजी, फ्री फायर और बीजीएमई जैसे हिंसक खेलों में सिमट कर रह गई है। गाजियाबाद में तीन बहनों के आत्महत्या किए जाने के बाद यहां भी मां-बाप चिंतित हैं। जिले में 10 से अधिक मनोचिकित्सक हैं, जिनके पास आए दिन 20 से 25 किशोर इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
एसबीडी जिला अस्पताल में अर्श क्लीनिक है। यहां पर 11 से 19 साल के किशोरों का इलाज और काउंसिलिंग होती है। हाल ही में एक दंपती अर्श क्लीनिक पहुंची। उन्होंने बताया कि उनका बच्चा 11 साल का है, जिसे खाने के साथ-साथ गेम खेलने की लत गई है। दिनभर मोबाइल में गेम खेलता है। उसके गेम के बारे में हमें भी नहीं पता। बच्चे की काउंसिलिंग की गई। उसे कुछ दवाएं दीं। अर्श क्लीनिक में रोजाना 20 से 25 किशोर आते हैं। गेम की लत वाले भी आते हैं। बच्चे को आठ दिन बाद फालोअप के लिए बुलाया जाता है। देखा जाता है कि उसमें कितना सुधार हुआ है। जिले में निजी मनोचिकित्सकों के यहां गेम खेलने के ज्यादा मामले आ रहे हैं।
विज्ञापन
विभिन्न जांचों से पता चलता है कि 12 से 17 साल के किशोर इस लत का सबसे आसान शिकार बन रहे हैं। पबजी, फ्री फायर गेम्स में मिलने वाली आभासी जीत उन्हें वास्तविक जीवन से दूर रही है। जब यह आभासी दुनिया टूटती है चाहे वह इंटरनेट रिचार्ज खत्म होना हो या माता-पिता द्वारा फोन छीनना तो वह हिंसक व्यवहार और अवसाद का शिकार हो जाते हैं।
विज्ञापन
एसबीडी जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. इंदू रानी ने बताया कि बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं या खेल रहे। कहीं न कहीं इसके लिए अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। कुछ गेम ऐसे हैं, जो बच्चों व किशोरों का दिमाग अपने पर आश्रित करा लेते हैं। यह भी समझना चाहिए कि रील और रियल दुनिया अलग है। इसे जिंदगी का हिस्सा न बनाएं। बच्चों को गेम खेलने से रोकें।