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अधिकारी दें ध्यान, तो धरोहरों को मिले पहचान

Sun, 14 Nov 2021 10:42 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 14 Nov 2021 10:42 PM IST
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If the officials pay attention, then the heritage should be recognized
सहारनपुर। प्रदेश सरकार ने ‘अपनी धरोहर अपनी पहचान’ नीति के तहत स्मारकों, पुराने स्थलों के संरक्षण और विकास की योजना तैयार की है। संरक्षित स्मारकों व स्थलों में फिल्मांकन भी कराने की तैयारी है। सहारनपुर जिले में भी ऐसी कई धरोहर हैं, जहां फिल्मांकन हो सकता है, मगर यह उपेक्षा के शिकार हैं। पर्यटन विभाग और पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की तरफ से इनकी अनदेखी की जा रही है। यदि विभागीय अधिकारी गंभीरता से लें तो, प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप इन्हें संवारा जा सकता है, जिससे जिले में पर्यटन के लिहाज से भी विकास होगा। पेश है जिले के ऐसे स्थलों पर रिपोर्ट...
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-कंपनी गार्डन
कंपनी बाग की स्थापना मुगल शासन काल में हुई। सन 1750 से पहले इंतिजामुद्दौला इसके संस्थापक माने जाते हैं। बाद में उद्यान की बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी ने संभाली और कंपनी गार्डन नाम देकर यहां औषधीय, शोभनीय और अन्य उपयोगी पौधे लगाए। डॉ. गोवान, डथी, रोयले, हार्टलैस और फ्यूचर जैसे महान वनस्पति शास्त्रियों ने वनस्पति विज्ञान में यहीं शोध कार्य किया। कंपनी गार्डन के सुंदरीकरण की योजना बनाई, सड़क आदि बनाने का कार्य कराया, लेकिन सुंदरीकरण जैसा कुछ नहीं हुआ।
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रोहिला वंशका किला
देहरादून रोड पर रोहिला वंश का किला है, जिसमें वर्तमान में जिला कारागार संचालित हो रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया हुआ है। मुख्य गेट के पास से ही किले की दीवारें दिखती हैं। जब तक कारागार का स्थानांतरण नहीं होता है, तब तक इस स्थल के संरक्षण के लिहाज से विकसित होने में अड़चन बनी है।
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फुलवारीआश्रम
बाबा लालदास का वाडा स्वतंत्रता संग्राम की यादें संजोए हुए हैं। क्योंकि सरदार भगत सिंह भी यहां आकर कई बार रुके थे। यहां फुलवारी आश्रम है, जहां से 1930 में नमक सत्याग्रह की शुरुआत की गई थी। अन्य भी बहुत सी यादें इससे जुड़ी हुई हैं, लेकिन यहां टूटी पड़ी बेंच और अन्य अव्यवस्थाएं मुंह चिढ़ाती हैं।
शाहजहां की शिकारगाह
-शिवालिक की तलहटी में स्थित बादशाही बाग में शाहजहां की शिकारगाह है, जो करीब 1627-1658 ई. के बीच बनवाई गई थी। उसकी इमारत बेहद पुरानी हो चुकी है, लेकिन आज भी दर्शनीय है। एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग) की सूची में भी यह शामिल है। शिकारगाह के झरोखों से शिवालिक की तलहटी का नजारा दिखता है, लेकिन इसे संवारने की दिशा में कोई कार्य नहीं हुआ।
सिंधु कालीन सभ्यता का हुलास स्थल
गंगोह- तीतरो मार्ग पर गांव मनोहरा के पास हुलास टीला है, जो सिंधु कालीन सभ्यता से जुड़ा बताया जाता है। यहां वर्ष 1978-79 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की टीम ने उत्खनन किया था। खोदाई में यहां पर सिल बट्टे, मिट्टी के मनके और अन्य अवशेष निकले थे। प्राचीन मकानों की नींव, मिट्टी के फर्श और खंभे गाड़ने को बनाए गड्ढे भी मिले थे। माना गया था कि 3500 साल पूर्व सिंधुकालीन सभ्यता के दौरान यहां लोग निवास करते होंगे।

सरसावा का सिंधु कालीन टीला
अंबाला हाईवे पर कस्बा सरसावा में ही प्राचीन टीला है, जो करीब 1500 साल पुराना और यहां मिल रहे अवशेषों के आधार पर सिंधु कालीन बताया जाता है। राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की बात कही और तारबाड़ भी लगवाई, मगर वर्तमान में यह भी अनदेखी का शिकार है और इसकी जमीन पर अवैध कब्जे तक हो रहे हैं।
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