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प्रभावी रणनीति बने तो सुधरे पर्यावरण
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- प्रदूषण मुक्त नहीं हो पाई सहारनपुर शहर के बीच से बहने वाली ढमोला नदी
- फोटो : SAHARANPUR
प्रभावी रणनीति बने तो सुधरे पर्यावरण
सहारनपुर। पर्यावरण की शुद्धता के लिए तमाम दावे होते हैं, लेकिन योजनाएं कागजों तक सिमटी रहती हैं। प्रभावी रणनीति ना होने से योजनाएं धड़ाम हो जाती हैं, यही वजह है कि प्रदूषण कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है। हालांकि सहारनपुर जिले में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी प्रयास भी हुए हैं, जिसमें और बेहतर करने की आवश्यकता है। तभी जिले का पर्यावरण शुद्ध हो पाएगा। पेश है जिले में पर्यावरण की स्थिति को लेकर रिपोर्ट...
हर साल पौधे लगाते हैं पर नहीं होती देखभाल
पर्यावरण को बचाने के लिए हर साल बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया जाता है। जिले में बीते वर्ष 36,55,990 पौधे रोपे गए थे। पौधरोपण के इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वन विभाग के अलावा हर विभाग की जिम्मेदारी थी। नदी किनारे, स्कूल परिसर और अन्य सरकारी भवनों के परिसरों में पौधरोपण किया गया था। नागल, बेहट, शाकंभरी और गागलहेडी क्षेत्र में कई जगह पर लगाए गए पौधे सूख गए। अब इस साल के लिए 41 लाख पौधो के रोपण का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 12.86 लाख पौधे वन विभाग को लगाने हैं ,जबकि 28 लाख पौधे रोपने का लक्ष्य अन्य विभागों का रहेगा।
नदियां नहीं हो सकी प्रदूषण मुक्त
सहारनपुर शहर के बीच से बहने वाली ढमोला नदी और पांवधोई नदी के अलावा गागलहेडी की तरफ से मुजफ्फरनगर जनपद की तरफ जाने वाली हिंडन नदी भी प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकी। पांवधोई नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए निगम की तरफ से भी प्रयास किए गए, उसका कुछ असर पांवधोई के उद्गम स्थल के पास हुआ, लेकिन उसके बाद शहर में आकर नदी प्रदूषण से घिर जाती है। इसी तरह ढमोला नदी में भी कचरा अटा रहता है। इसे भी साफ बनाने के तमाम दावे कागजों तक ही सीमित रहे।
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गनीमत है कर्फ्यू ने घटा दिया एक्यूआई
वायु प्रदूषण कम करने की दिशा में भी ठोस कार्रवाई नहीं होती। शहरी क्षेत्र से सटे इलाकों में ईंट भट्ठों को शिफ्ट करने के लिए नोटिस तक दिए गए, लेकिन इन भट्ठों का संचालन बदस्तूर है। यह बात अलग है कि कोरोना कर्फ्यू में वाहनों का संचालन कम है, कारखाने भी उतने नहीं चल रहे हैं, जिससे एक्यूआई 100 या 110 के आसपास आ गया है। जबकि पूर्व में एक्यूआई 200 के आसपास रहता है।
निगम ने यह किए प्रयास
कचरा प्रबंधन को लेकर नगर निगम का फोकस कचरा डलावघर कम करने और उसी इलाके में कचरे का प्रबंधन करने पर रहा। शहर के 142 कूड़ा घरों में से 100 बंद कर दिए हैं और अब सिर्फ 42 रह गए है। इसके अलावा 10 एमआरएफ सेंटर हैं, जहां कचरे को विभक्त करके बेचा तक जा रहा है। हालांकि बाकी 42 डलावघरों से कचरे को उठवाकर कुम्हारहेड़ा में बनाए गए डंपिंग ग्राउंड पहुंचाया जाता है।
पर्यावरणविद की राय
60 प्रतिशत प्रदूषण वाहनों से निकलने वाले धुएं से होता है। वाहनों का संचालन कम होने से एक्यूआई घटने से यह साबित भी होता है। प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में अच्छे प्रयास हुए हैं, और भी बेहतर प्रयास होने की जरूरत है। - एसके उपाध्याय, पर्यावरणविद
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सहारनपुर। पर्यावरण की शुद्धता के लिए तमाम दावे होते हैं, लेकिन योजनाएं कागजों तक सिमटी रहती हैं। प्रभावी रणनीति ना होने से योजनाएं धड़ाम हो जाती हैं, यही वजह है कि प्रदूषण कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है। हालांकि सहारनपुर जिले में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी प्रयास भी हुए हैं, जिसमें और बेहतर करने की आवश्यकता है। तभी जिले का पर्यावरण शुद्ध हो पाएगा। पेश है जिले में पर्यावरण की स्थिति को लेकर रिपोर्ट...
हर साल पौधे लगाते हैं पर नहीं होती देखभाल
पर्यावरण को बचाने के लिए हर साल बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया जाता है। जिले में बीते वर्ष 36,55,990 पौधे रोपे गए थे। पौधरोपण के इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वन विभाग के अलावा हर विभाग की जिम्मेदारी थी। नदी किनारे, स्कूल परिसर और अन्य सरकारी भवनों के परिसरों में पौधरोपण किया गया था। नागल, बेहट, शाकंभरी और गागलहेडी क्षेत्र में कई जगह पर लगाए गए पौधे सूख गए। अब इस साल के लिए 41 लाख पौधो के रोपण का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 12.86 लाख पौधे वन विभाग को लगाने हैं ,जबकि 28 लाख पौधे रोपने का लक्ष्य अन्य विभागों का रहेगा।
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नदियां नहीं हो सकी प्रदूषण मुक्त
सहारनपुर शहर के बीच से बहने वाली ढमोला नदी और पांवधोई नदी के अलावा गागलहेडी की तरफ से मुजफ्फरनगर जनपद की तरफ जाने वाली हिंडन नदी भी प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकी। पांवधोई नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए निगम की तरफ से भी प्रयास किए गए, उसका कुछ असर पांवधोई के उद्गम स्थल के पास हुआ, लेकिन उसके बाद शहर में आकर नदी प्रदूषण से घिर जाती है। इसी तरह ढमोला नदी में भी कचरा अटा रहता है। इसे भी साफ बनाने के तमाम दावे कागजों तक ही सीमित रहे।
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गनीमत है कर्फ्यू ने घटा दिया एक्यूआई
वायु प्रदूषण कम करने की दिशा में भी ठोस कार्रवाई नहीं होती। शहरी क्षेत्र से सटे इलाकों में ईंट भट्ठों को शिफ्ट करने के लिए नोटिस तक दिए गए, लेकिन इन भट्ठों का संचालन बदस्तूर है। यह बात अलग है कि कोरोना कर्फ्यू में वाहनों का संचालन कम है, कारखाने भी उतने नहीं चल रहे हैं, जिससे एक्यूआई 100 या 110 के आसपास आ गया है। जबकि पूर्व में एक्यूआई 200 के आसपास रहता है।
निगम ने यह किए प्रयास
कचरा प्रबंधन को लेकर नगर निगम का फोकस कचरा डलावघर कम करने और उसी इलाके में कचरे का प्रबंधन करने पर रहा। शहर के 142 कूड़ा घरों में से 100 बंद कर दिए हैं और अब सिर्फ 42 रह गए है। इसके अलावा 10 एमआरएफ सेंटर हैं, जहां कचरे को विभक्त करके बेचा तक जा रहा है। हालांकि बाकी 42 डलावघरों से कचरे को उठवाकर कुम्हारहेड़ा में बनाए गए डंपिंग ग्राउंड पहुंचाया जाता है।
पर्यावरणविद की राय
60 प्रतिशत प्रदूषण वाहनों से निकलने वाले धुएं से होता है। वाहनों का संचालन कम होने से एक्यूआई घटने से यह साबित भी होता है। प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में अच्छे प्रयास हुए हैं, और भी बेहतर प्रयास होने की जरूरत है। - एसके उपाध्याय, पर्यावरणविद