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अंग्रेजी के प्रोफेसर और प्रेम हिंदी गीत लेखन का
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अंग्रेजी के प्रोफेसर और प्रेम हिंदी गीत लेखन का
सहारनपुर। प्रोफेसर योगेश छिब्बर। पढ़ाते थे अंग्रेजी, पर हिंदी लेखन में थी अभिरुचि। गीत, कविता और हिंदी में टप्पे लिखने की उनकी विधा अनूठी थी। मंच पर जब अपनी रचनाएं सुनाते तो, प्रेम और अध्यात्म का रस परोसते थे। ऐसे थे हिंदी प्रेेमी छिब्बर, जिन्हें आज भी लोग याद करते हैं। अमर उजाला फाउंडेशन के अभियान हिंदी हैं हम के तहत पेश है प्रोफेसर योगेश छिब्बर की यादें।
दरअसल, योगेश छिब्बर मूलरूप से देहरादून (उत्तराखंड) के के रहने वाले थे। उनका जन्म 24 अक्तूबर 1955 को पिता हरबंशलाप्रछब्बर और माता सुभाषदेवी छिब्बर के घर में हुआ था। उच्च शिक्षा हासिल करने के उपरांत उनका चयन सहारनपुर के महाराज सिंह डिग्री कॉलेज में बतौर अंग्रेजी प्रोफेसर हुआ। इसके बाद वह सहारनपुर के ही होकर रह गए। महाराज सिंह कॉलेज में लंबे समय तक वह अंग्रेजी विभागाध्यक्ष भी रहे। इसी दौरान हिंदी साहित्य के प्रति उनका प्रेम किताबों की शक्ल लेने लगा। एक के बाद एक कई किताबों का प्रकाशन किया, जिनमें गीत और कविताएं शामिल होती थीं, लेकिन उनकी खास रचनाएं जो लोगों को आज भी अविस्मरणीय हैं, वह हैं हिंदी के टप्पे। मूलत: टप्पे पंजाबी विधा है, जिसे योगेश छिब्बर हिंदी में प्रयोग करते थे। समसामयिक मुद्दों के साथ ही सामाजिक परिवेश, इंसानियत और प्रेम के वशीभूत उनकी रचनाएं खूब पसंद की जाती थीं। साहित्य यात्रा के इस हिंदी प्रेमी का 23 अक्तूबर 2010 को देहावसान हो गया।
-- आयाम के नाम से चलाई पाठशाला
सहारनपुर निवासी मनीष कच्छल बताते हैं कि प्रोफेसर योगेश छिब्बर हिंदी प्रेमी होने के साथ ही युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत और खूब मददगार थे। उन्होंने आयाम नाम से एक पाठशाला भी चलाई। कॉलेज में बच्चों को पढ़ाने के अलावा वह आयाम पाठशाला में भी बच्चों को विषयानुसार पढ़ाई कराने और व्यक्तित्व निखार के लिए भी तैयार करते थे। मनीष कच्छल ने बताया कि प्रोफेसर योगेश छिब्बर की एक अंग्रेजी किताब अभी प्रकाशित नहीं हो सकी है, जिसका पूरा मसौदा उन्होंने तैयार कर दिया था।
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--- योगेश छिब्बर की प्रमुख रचनाएं
- चिडिया बम नहीं बनाएंगी
- सांसों के वृंदावन में
- तुम अपनी प्यास जितने हो
- नैना गिरवी रख लिए
- हाथों में ताजमहल
- जिकर प्यारे का
बहुचर्चित रचना अम्मा
लेती नहीं दवाई अम्मा, जोड़े पाई पाई अम्मा ।
दुख थे पर्वत, राई अम्मा, हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।
इस दुनिया में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई अम्मा ।
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागरम रजाई अम्मा ।
जब भी कोई रिश्ता उधड़े करती है तुरपाई अम्मा।
बाबू जी तनखा लाए बस लेकिन बरकत लाई अम्मा।
नाम सभी हैं गुड से मीठे मां जी, मैया, माई, अम्मा।
सभी साड़ियां छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई अम्मा ।
घर में चूल्हे मत बांटो रे देरी रही दुहाई अम्मा ।
बाबूजी बीमार पड़े जब साथ साथ मुरझाई अम्मा।
बेटे की कुर्सी है ऊंची पर उसकी ऊंचाई अम्मा।
घर के शगुन सभी अम्मा से, है घर की शहनाई अम्मा।
सभी पराये हो जाते हैं, होती नहीं पराई अम्मा।
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सहारनपुर। प्रोफेसर योगेश छिब्बर। पढ़ाते थे अंग्रेजी, पर हिंदी लेखन में थी अभिरुचि। गीत, कविता और हिंदी में टप्पे लिखने की उनकी विधा अनूठी थी। मंच पर जब अपनी रचनाएं सुनाते तो, प्रेम और अध्यात्म का रस परोसते थे। ऐसे थे हिंदी प्रेेमी छिब्बर, जिन्हें आज भी लोग याद करते हैं। अमर उजाला फाउंडेशन के अभियान हिंदी हैं हम के तहत पेश है प्रोफेसर योगेश छिब्बर की यादें।
दरअसल, योगेश छिब्बर मूलरूप से देहरादून (उत्तराखंड) के के रहने वाले थे। उनका जन्म 24 अक्तूबर 1955 को पिता हरबंशलाप्रछब्बर और माता सुभाषदेवी छिब्बर के घर में हुआ था। उच्च शिक्षा हासिल करने के उपरांत उनका चयन सहारनपुर के महाराज सिंह डिग्री कॉलेज में बतौर अंग्रेजी प्रोफेसर हुआ। इसके बाद वह सहारनपुर के ही होकर रह गए। महाराज सिंह कॉलेज में लंबे समय तक वह अंग्रेजी विभागाध्यक्ष भी रहे। इसी दौरान हिंदी साहित्य के प्रति उनका प्रेम किताबों की शक्ल लेने लगा। एक के बाद एक कई किताबों का प्रकाशन किया, जिनमें गीत और कविताएं शामिल होती थीं, लेकिन उनकी खास रचनाएं जो लोगों को आज भी अविस्मरणीय हैं, वह हैं हिंदी के टप्पे। मूलत: टप्पे पंजाबी विधा है, जिसे योगेश छिब्बर हिंदी में प्रयोग करते थे। समसामयिक मुद्दों के साथ ही सामाजिक परिवेश, इंसानियत और प्रेम के वशीभूत उनकी रचनाएं खूब पसंद की जाती थीं। साहित्य यात्रा के इस हिंदी प्रेमी का 23 अक्तूबर 2010 को देहावसान हो गया।
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-- आयाम के नाम से चलाई पाठशाला
सहारनपुर निवासी मनीष कच्छल बताते हैं कि प्रोफेसर योगेश छिब्बर हिंदी प्रेमी होने के साथ ही युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत और खूब मददगार थे। उन्होंने आयाम नाम से एक पाठशाला भी चलाई। कॉलेज में बच्चों को पढ़ाने के अलावा वह आयाम पाठशाला में भी बच्चों को विषयानुसार पढ़ाई कराने और व्यक्तित्व निखार के लिए भी तैयार करते थे। मनीष कच्छल ने बताया कि प्रोफेसर योगेश छिब्बर की एक अंग्रेजी किताब अभी प्रकाशित नहीं हो सकी है, जिसका पूरा मसौदा उन्होंने तैयार कर दिया था।
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--- योगेश छिब्बर की प्रमुख रचनाएं
- चिडिया बम नहीं बनाएंगी
- सांसों के वृंदावन में
- तुम अपनी प्यास जितने हो
- नैना गिरवी रख लिए
- हाथों में ताजमहल
- जिकर प्यारे का
बहुचर्चित रचना अम्मा
लेती नहीं दवाई अम्मा, जोड़े पाई पाई अम्मा ।
दुख थे पर्वत, राई अम्मा, हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।
इस दुनिया में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई अम्मा ।
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागरम रजाई अम्मा ।
जब भी कोई रिश्ता उधड़े करती है तुरपाई अम्मा।
बाबू जी तनखा लाए बस लेकिन बरकत लाई अम्मा।
नाम सभी हैं गुड से मीठे मां जी, मैया, माई, अम्मा।
सभी साड़ियां छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई अम्मा ।
घर में चूल्हे मत बांटो रे देरी रही दुहाई अम्मा ।
बाबूजी बीमार पड़े जब साथ साथ मुरझाई अम्मा।
बेटे की कुर्सी है ऊंची पर उसकी ऊंचाई अम्मा।
घर के शगुन सभी अम्मा से, है घर की शहनाई अम्मा।
सभी पराये हो जाते हैं, होती नहीं पराई अम्मा।