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सहारनपुर के पापुलर से मालामाल हो रहा है हरियाणा
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Tue, 02 May 2017 12:28 AM IST
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ट्राली में लादा जाता पापुलर।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बेहद कमाऊ फसल के जरिए हरियाणा दिन-ब-दिन मालामाल हो रहा है। मगर, कभी यहां के किसानों की संपन्नता का प्रतीक पापुलर की लकड़ी अब मुसीबत का सामान बनकर रह गयी है।
जिसे खेतों में खड़े रखना भी मुश्किल तथा काटना भी मुश्किल हो गया है। बाजार में मंदी और चाइनीज माल की भरमार के चलते सहारनपुर सहित पश्चिमी यूपी के किसानों को उनकी पापुलर की फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा है।
आलम यह है कि करीब पांच साल पहले तक 12 सौ रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाले पापुलर को अब यमुना नगर की फैक्ट्रियों में 500 रुपये प्रति क्विंटल का रेट भी बड़ी मुश्किल से मिल रहा है।
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दरअसल सहारनपुर के पड़ोसी तथा हरियाणा राज्य में स्थित यमुनानगर की तरक्की का रास्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेषकर सहारनपुर से होकर जाता है। शासन की नीतियों के कारण प्रदेश का कोई भी वर्ग इस तरक्की का लाभ नहीं ले पा रहा है।
आपको बता दें कि सहारनपुर में बड़े पैमाने पर पापुलर की खेती होती है। मगर, प्लाई फैक्ट्रियां यहां नहीं होने से यहां के किसानों को मजबूरन यमुना नगर की फैक्ट्रियों का रुख करना पड़ता है।
आपको बता दें कि पापुलर पेड़ की लकड़ी कागज, प्लाई बोर्ड, चम्मच, अन्य सामान, ईंधन के काम आती है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मौसम इस पेड़ की फसल के बड़ा ही मुफीद है।
इसी कारण किसान अपनी मेहनत के बल पर फसल के साथ खेत की मेड़ पर पापुलर के पेड़ लगाकर अतिरिक्त कमाई करते थे। मगर, आसपास केवल यमुना नगर में ही प्लाई फैक्ट्री होने के कारण उद्यमियों का एकाधिकार भी सहारनपुर के किसानों की आय में कमी का एक बड़ा कारण है। हालात में सुधार जरूरी है।
जिले से प्रतिदिन 800 से एक हजार ट्राली पापुलर यमुना नगर और हरियाणा के अन्य जिलों में जा रहा है। एक ट्राली में करीब 20 से 25 टन तक पापुलर फैक्ट्री तक पहुंच रहा है।
पहले मिलने वाले करीब 12 सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से एक ट्राली की कीमत ढाई लाख रुपये तक होती थी। मगर, अब रेट महज 500 रुपये प्रति क्विंटल होने के कारण किसानों की एक ट्राली की कीमत एक लाख रुपए तक सिमट गई है।
पापुलर के पौधों को फैक्ट्री लायक करने में किसानों को पांच से छह साल लगते हैं। एक बीघे में औसतन 20 पौधे लगाए जाते हैं और पांच साल में 60 क्विंटल पापुलर तैयार होता है।
इस लिहाज से एक बीघे में छह टन पापुलर होता है और इसकी वर्तमान कीमत तीस हजार रुपये होगी। जबकि पांच साल पहले तक किसान एक बीघे से करीब इसी फसल से 75 हजार रुपये तक कमाता था।
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जिसे खेतों में खड़े रखना भी मुश्किल तथा काटना भी मुश्किल हो गया है। बाजार में मंदी और चाइनीज माल की भरमार के चलते सहारनपुर सहित पश्चिमी यूपी के किसानों को उनकी पापुलर की फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा है।
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आलम यह है कि करीब पांच साल पहले तक 12 सौ रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाले पापुलर को अब यमुना नगर की फैक्ट्रियों में 500 रुपये प्रति क्विंटल का रेट भी बड़ी मुश्किल से मिल रहा है।
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दरअसल सहारनपुर के पड़ोसी तथा हरियाणा राज्य में स्थित यमुनानगर की तरक्की का रास्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेषकर सहारनपुर से होकर जाता है। शासन की नीतियों के कारण प्रदेश का कोई भी वर्ग इस तरक्की का लाभ नहीं ले पा रहा है।
आपको बता दें कि सहारनपुर में बड़े पैमाने पर पापुलर की खेती होती है। मगर, प्लाई फैक्ट्रियां यहां नहीं होने से यहां के किसानों को मजबूरन यमुना नगर की फैक्ट्रियों का रुख करना पड़ता है।
आपको बता दें कि पापुलर पेड़ की लकड़ी कागज, प्लाई बोर्ड, चम्मच, अन्य सामान, ईंधन के काम आती है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मौसम इस पेड़ की फसल के बड़ा ही मुफीद है।
इसी कारण किसान अपनी मेहनत के बल पर फसल के साथ खेत की मेड़ पर पापुलर के पेड़ लगाकर अतिरिक्त कमाई करते थे। मगर, आसपास केवल यमुना नगर में ही प्लाई फैक्ट्री होने के कारण उद्यमियों का एकाधिकार भी सहारनपुर के किसानों की आय में कमी का एक बड़ा कारण है। हालात में सुधार जरूरी है।
जिले से प्रतिदिन 800 से एक हजार ट्राली पापुलर यमुना नगर और हरियाणा के अन्य जिलों में जा रहा है। एक ट्राली में करीब 20 से 25 टन तक पापुलर फैक्ट्री तक पहुंच रहा है।
पहले मिलने वाले करीब 12 सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से एक ट्राली की कीमत ढाई लाख रुपये तक होती थी। मगर, अब रेट महज 500 रुपये प्रति क्विंटल होने के कारण किसानों की एक ट्राली की कीमत एक लाख रुपए तक सिमट गई है।
पापुलर के पौधों को फैक्ट्री लायक करने में किसानों को पांच से छह साल लगते हैं। एक बीघे में औसतन 20 पौधे लगाए जाते हैं और पांच साल में 60 क्विंटल पापुलर तैयार होता है।
इस लिहाज से एक बीघे में छह टन पापुलर होता है और इसकी वर्तमान कीमत तीस हजार रुपये होगी। जबकि पांच साल पहले तक किसान एक बीघे से करीब इसी फसल से 75 हजार रुपये तक कमाता था।