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हिन्दी हैं हम : हिंदी भाषा के लिए हिंदी में लिखी भूगोल की किताबें
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सहारनपुर। हिंदी माध्यम से पढ़ाई की और प्रोफेसर बने। साथ ही भूगोल विषय की किताबें लिखीं, जो अधिकांश हिंदी विषय में हैं। हिंदी के प्रति डॉ. एससी बंसल का लगाव ऐसा रहा। उनका मानना है कि हिंदी माध्यम के बच्चों की सहूलियत के लिए ही भूगोल विषय की हिंदी में किताबें लिखीं, जो देश के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं।
डीएसओ कंपाउंड में रहने वाले डॉ. बंसल जेवी जैन कॉलेज सहारनपुर में एसोसिएट प्रोफेसर रहे हैं। देशभर के कई विश्वविद्यालयों में उनकी लिखी किताबें पढ़ाई जाती हैं, जो हिंदी में ही हैं। डॉ. बंसल ने बताया कि वह भी हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़े हैं। महाविद्यालयों में जाकर अंग्रेजी भाषा में किताबों को पढ़ना हिंदी माध्यम के विद्यार्थी के लिए कितना मुश्किल होता है, इसको वह बखूबी समझते और जानते हैं। हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की इसी समस्या को समझते हुए उन्होंने अपनी तमाम किताबों को हिंदी में ही लिखने की सोची। उन्होंने अब तक 20 से ज्यादा किताबें लिखीं, जिनमें अधिकांश हिंदी भाषा में हैं।
डॉ. बंसल का कहना है कि भूगोल को हिंदी में पढ़ने वाला व्यक्ति भी इतना ही जाता है, जितना अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में पढ़ने वाला व्यक्ति। ऐसे में अंग्रेजी भाषा में बोलने वाला व्यक्ति अधिक समझदार होगा, यह सोचना गलत है। उनकी अपील है कि जहां तक संभव हो हिंदी में ही बातचीत, कार्य और लेखन करना चाहिए।
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डीएसओ कंपाउंड में रहने वाले डॉ. बंसल जेवी जैन कॉलेज सहारनपुर में एसोसिएट प्रोफेसर रहे हैं। देशभर के कई विश्वविद्यालयों में उनकी लिखी किताबें पढ़ाई जाती हैं, जो हिंदी में ही हैं। डॉ. बंसल ने बताया कि वह भी हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़े हैं। महाविद्यालयों में जाकर अंग्रेजी भाषा में किताबों को पढ़ना हिंदी माध्यम के विद्यार्थी के लिए कितना मुश्किल होता है, इसको वह बखूबी समझते और जानते हैं। हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की इसी समस्या को समझते हुए उन्होंने अपनी तमाम किताबों को हिंदी में ही लिखने की सोची। उन्होंने अब तक 20 से ज्यादा किताबें लिखीं, जिनमें अधिकांश हिंदी भाषा में हैं।
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डॉ. बंसल का कहना है कि भूगोल को हिंदी में पढ़ने वाला व्यक्ति भी इतना ही जाता है, जितना अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में पढ़ने वाला व्यक्ति। ऐसे में अंग्रेजी भाषा में बोलने वाला व्यक्ति अधिक समझदार होगा, यह सोचना गलत है। उनकी अपील है कि जहां तक संभव हो हिंदी में ही बातचीत, कार्य और लेखन करना चाहिए।
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