कहानी दारुल उलूम की शुरूआत से अब तक: देश-दुनिया में है बड़ा नाम, कभी 40 साल तक शहरवासियों ने खिलाया था खाना
Deoband News : 1866 में दारुल उलूम को शुरू किया गया था लेकिन उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह इस्लामी तालीम का मुख्य केंद्र बन जाएगा। एक समय वो भी था शहर के लोगों ने 40 साल तक दारुल उलूम के छात्रों को भोजन खिलाया था। शुरू से अब तक की पूरी कहानी पढ़िए।
विस्तार
इस्लामी तालीम के प्रमुख केंद्र दारुल उलूम की स्थापना 30 मई 1866 को हुई थी। उस समय संस्था का कोई बजट नहीं था। इसलिए 40 सालों तक शहर के लोगों ने छात्रों को अपने घरों से भोजन कराया था।
जिस सरल और सामान्य तरीके से दारुल उलूम को शुरू किया गया था। उसे देखकर यह कल्पना करना और निर्णय लेना मुश्किल था कि संसाधनों की कमी के साथ शुरू होने वाला मदरसा कुछ ही वर्षों में एशिया में इस्लामी तालीम का प्रमुख केंद्र बन जाएगा।
दारुल उलूम के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी बताते हैं कि जब वर्ष 1866 में दारुल उलूम की स्थापना हुई, उस समय तक कोई नहीं जानता था कि यह इदारा एशिया में इस्लामी तालीम का प्रमुख केंद्र बनेगा। संस्था पर शुरुआती दौर में किसी प्रकार का कोई बजट नहीं होता था। धीरे-धीरे यहां तालीम हासिल करने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। जिसके चलते शहर के लोगों ने छात्रों को भोजन कराने की जिम्मेदारी ली और यह सिलसिला 40 वर्षों तक चला।
इसके बाद दारुल उलूम के लिए चंदा इकट्ठा करने का काम शुरू किया गया। वर्तमान में दारुल उलूम का वार्षिक बजट 48 करोड़ रुपये है। यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या साढ़े चार हजार है।
यह भी पढ़ें: कौन है कुख्यात सुनील राठी: जिसे कोर्ट ने सुनाई 10 साल की सजा, घोषित है अंतरराज्यीय माफिया, 41 केस हैं दर्ज
कभी नहीं ली सरकारी मदद
दारुल उलूम स्थापना के समय से ही अपने उसूलों पर चल रहा है। उस समय इसके संस्थापकों ने निर्णय लिया था कि संस्था को चलाने के लिए किसी भी प्रकार की सरकारी मदद नहीं ली जाएगी। बल्कि यह कौम के चंदे से चलेगा। तब से लेकर आज तक दारुल उलूम का पूरा निजाम (व्यवस्था) चंदे पर ही निर्भर है। देश में चलने वाली कई सरकारों ने दारुल उलूम को सरकारी मदद देने का प्रयास किया, लेकिन संस्था ने कभी भी इसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं रखा।
यह भी पढ़ें: Exit Polls: वेस्ट यूपी की इन सीटों पर फेल हो गया था 2019 का एग्जिट पोल, पढ़िए आखिर कहां-कहां पलट गई थी बाजी