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विधिपूर्वक पितरों की तृप्ति कर दें विदाई
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स्वामी कालेंद्रानंद महाराज
- फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। पितृ पक्ष की अमावस्या आज है। इस दिन श्रद्धाभाव और विधिपूर्वक ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद मिलता है। श्राद्ध करने का उत्तम समय सुबह छह से दोपहर एक बजे तक है।
पितृपक्ष की अमावस्या के संबंध में मां शाकंभरी देवी मंदिर परिसर स्थित शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी ब्रह्मचारी महंत सहजानंद ने बताया कि पितृपक्ष में हम अपने पितृगण का श्राद्धकर्म, तर्पण और पिंडदान करते हैं। पित्रों की आत्मा को मुक्ति और शांति प्रदान करने के लिए श्रद्धा भाव से किए कर्मकांड श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित हैं। क्योंकि, हमारी संस्कृति में श्राद्ध का संबंध पूर्वजों की मृत्यु की तिथि से है। इसलिए नए कार्यों के प्रारंभ करना अशुभ माना गया है। इन दिनों पितृलोक से चलकर पितृगण भू-लोक पर आते हैं। इन सोलह दिन की अवधि में पितृलोक पर जल का अभाव हो जाता है। इसलिए पितृ अपने वंशजों से तर्पण करवाकर तृप्त होते हैं।
राधा विहार कॉलोनी श्री वैष्णवी महाकाली मंदिर के अधिष्ठाता स्वामी कालेंद्रानंद महाराज ने बताया पितृ पक्ष में अलग-अलग दिनों में लोगों ने अपने दिवंगत बड़े बुजुर्गों का श्राद्ध किया, लेकिन अमावस्या पर उन पित्रों की तृप्ति हो जाती है, जिन पित्रों के बारे में पीढ़ी को जानकारी नहीं होती है। इसके लिए विधि पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। ब्रह्मपुरी कॉलोनी स्थित सिद्धपीठ शिव बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता रोहित वशिष्ठ बताते हैं कि देशकाल में पात्र में विधिपूर्वक श्रद्धा से पितरों के लिए किए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। देश का अर्थ स्थान है, काल का अर्थ समय है। पात्र का अर्थ वह ब्राह्मण है, जिसे हम श्राद्ध की सामग्री दे रहे हैं। इन तीनों को भली-भांति समझकर ही श्राद्ध करना चाहिए। श्री बालाजी धाम के संस्थापक अतुल जोशी महाराज का कहना है कि विधि पूर्वक किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्ति देता है। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को आयु, पुत्र धन-धान्य और यश मिलता है।
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इन बातों का रखें ध्यान
- भोजन पत्ते पर रखकर गाय और कुत्ते को खिलाएं।
- भोजन भूमि या छत पर डालकर कौवे को खिलाना चाहिए।
- पत्ते पर रखकर देवताओं के लिए अन्न निकाले और गाय को खिलाएं।
- चींटी आदि के लिए भी भोजन निकालें।
- अग्नि के लिए भोजन निकालकर थोड़ा अन्न अग्नि में डालकर शेष अन्न गाय को खिलाएं।
- इन सबके बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं।
ऐसे करें श्राद्ध
तिल और कुशा हाथ में लेकर लेकर संकल्प लें। चांदी का दान, भगवान के नाम का जप करें। दूध, गंगाजल, शहद, फल, दही, धान, तिल गेहूं, मूंग और सरसों का तेल शुभ माने गए हैं। तुलसी पत्र का प्रयोग भी श्राद्ध में अवश्य करना चाहिए। तुलसी की गंध से पितृगण प्रसन्न होते हैं। फलों में आम, बेल, अनार, आंवला, नारियल, खजूर, अंगूर और केले का इस्तेमाल करें।
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पितृपक्ष की अमावस्या के संबंध में मां शाकंभरी देवी मंदिर परिसर स्थित शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी ब्रह्मचारी महंत सहजानंद ने बताया कि पितृपक्ष में हम अपने पितृगण का श्राद्धकर्म, तर्पण और पिंडदान करते हैं। पित्रों की आत्मा को मुक्ति और शांति प्रदान करने के लिए श्रद्धा भाव से किए कर्मकांड श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित हैं। क्योंकि, हमारी संस्कृति में श्राद्ध का संबंध पूर्वजों की मृत्यु की तिथि से है। इसलिए नए कार्यों के प्रारंभ करना अशुभ माना गया है। इन दिनों पितृलोक से चलकर पितृगण भू-लोक पर आते हैं। इन सोलह दिन की अवधि में पितृलोक पर जल का अभाव हो जाता है। इसलिए पितृ अपने वंशजों से तर्पण करवाकर तृप्त होते हैं।
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राधा विहार कॉलोनी श्री वैष्णवी महाकाली मंदिर के अधिष्ठाता स्वामी कालेंद्रानंद महाराज ने बताया पितृ पक्ष में अलग-अलग दिनों में लोगों ने अपने दिवंगत बड़े बुजुर्गों का श्राद्ध किया, लेकिन अमावस्या पर उन पित्रों की तृप्ति हो जाती है, जिन पित्रों के बारे में पीढ़ी को जानकारी नहीं होती है। इसके लिए विधि पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। ब्रह्मपुरी कॉलोनी स्थित सिद्धपीठ शिव बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता रोहित वशिष्ठ बताते हैं कि देशकाल में पात्र में विधिपूर्वक श्रद्धा से पितरों के लिए किए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। देश का अर्थ स्थान है, काल का अर्थ समय है। पात्र का अर्थ वह ब्राह्मण है, जिसे हम श्राद्ध की सामग्री दे रहे हैं। इन तीनों को भली-भांति समझकर ही श्राद्ध करना चाहिए। श्री बालाजी धाम के संस्थापक अतुल जोशी महाराज का कहना है कि विधि पूर्वक किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्ति देता है। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को आयु, पुत्र धन-धान्य और यश मिलता है।
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इन बातों का रखें ध्यान
- भोजन पत्ते पर रखकर गाय और कुत्ते को खिलाएं।
- भोजन भूमि या छत पर डालकर कौवे को खिलाना चाहिए।
- पत्ते पर रखकर देवताओं के लिए अन्न निकाले और गाय को खिलाएं।
- चींटी आदि के लिए भी भोजन निकालें।
- अग्नि के लिए भोजन निकालकर थोड़ा अन्न अग्नि में डालकर शेष अन्न गाय को खिलाएं।
- इन सबके बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं।
ऐसे करें श्राद्ध
तिल और कुशा हाथ में लेकर लेकर संकल्प लें। चांदी का दान, भगवान के नाम का जप करें। दूध, गंगाजल, शहद, फल, दही, धान, तिल गेहूं, मूंग और सरसों का तेल शुभ माने गए हैं। तुलसी पत्र का प्रयोग भी श्राद्ध में अवश्य करना चाहिए। तुलसी की गंध से पितृगण प्रसन्न होते हैं। फलों में आम, बेल, अनार, आंवला, नारियल, खजूर, अंगूर और केले का इस्तेमाल करें।

स्वामी सहजानंद महाराज- फोटो : SAHARANPUR

अतुल जोशी महाराज- फोटो : SAHARANPUR

आचार्य रोहित वशिष्ठ- फोटो : SAHARANPUR