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ये न कहिये थकान बाकी है, हौसलों में उड़ान बाकी है...
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-- गीतकार एवं गजलकार सुरेश सपन
- फोटो : SAHARANPUR
ये न कहिये थकान बाकी है, हौसलों में उड़ान बाकी है...
सहारनपुर। हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी जान है, हमें इस पर गुमान है। हर हिंदुस्तानी की पहचान हिंदी से है, हमें इसके प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए। मैं आज जिस भी हाल में हूं, मगर सौभाग्यशाली हूं कि आज भी हिंदी गीत लिखता हूं। क्योंकि हालातों से हारा नहीं हूं, बल्कि हर दम तक हिंदी से जुड़ा रहना चाहता हूं। यह कहना है प्रख्यात गीतकार एवं गजलकार सुरेश सपन का।
अमर उजाला के अभियान हिंदी हैं हम के तहत सुरेश सपन से बात की गई तो उन्होंने बेबाकी से हिंदी की मौजूदा स्थिति के बारे में राय रखी और सुझाव दिया कि हर भारतवासी को हिंदी पर गर्व करना चाहिए। प्रारंभिक शिक्षा से ही बच्चों को हिंदी के प्रति प्रेरित करें। अपना एक शेर सुनाते हुए कहते हैं कि ये न कहिए थकान बाकी है, हौसलों में उड़ान बाकी है...। इसलिए हिंदी को बचाए रखने के लिए हर नागरिक को आगे आना होगा, आने वाली पीढ़ी को जागृत करना होगा।
हिंदी साहित्यिक सफर
7 मार्च 1947 को रूपचंद वर्मा और चंपा देवी के घर में सुरेश सपन का जन्म हुआ। इन दिनों वह सहारनपुर के मल्हीपुर रोड पर पवन विहार में रहते हैं। 1970 में एमए हिंदी विषय में उत्तीर्ण करने के पश्चात विद्युत निगम में नौकरी की। 2005 में सेवानिवृत्त हुए। 1980 से हिंदी गीत, बाल रचनाएं और गजल लिखना शुरू किया। साहित्यिक संस्था समन्वय के 25 वर्ष तक सचिव रहे। विभावरी, मानसी, नवयुग साहित्यकार संघ मकसद आदि संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। तल में हलचल जारी है शीर्षक से गजल संग्रह का प्रकाशन किया। परिवार में पुत्र पवन वर्मा और पुत्रवधू राखी वर्मा के अलावा पौत्री अनन्या और पौत्र अभिनव के साथ रहते हैं।
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हिंदी में लिखी दोहामयी रामकथा
सुरेश सपन ने वर्ष 2010 में दोहामयी रामकथा लिखी, जिसमें बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुंदर कांड, लंका कांड और उत्तर कांड का उल्लेख हिंदी दोहा के रूप में किया।
मात्रा लगाने की गलती, सजा और सबक
सुरेश सपन बताते हैं कि 1970 में जब वह जैन कॉलेज सहारनपुर से हिंदी विषय में एमए कर रहे थे, तब एक दिन प्रवक्ता ने उनकी कॉपी में हिंदी की एक मात्रा में गलती मिलने पर कक्षा में बेंच पर खड़ा कर सजा दी। वह सजा मेरे जीवन में सबक बनी और फिर हिंदी लेखन में रूचि और ज्यादा बढ़ती गई तथा त्रुटियां भी दूर कर लीं।
कट गईं दोनों टांगे, पर लेखन है जारी
गीतकार सुरेश सपन ने बताया कि पैर की अंगुली में गैंगरीन होने के कारण पहले तो तीन अंगुलियां कटीं और फिर एक टांग कटवानी पड़ी। इसके बाद दूसरी टांग भी इसी बीमारी के कारण कटवानी पड़ गई। आज वह ट्राई साइकिल पर ही रहते हैं, उसी से कमरे में इधर उधर घूमते हैं, बावजूद हिंदी लेखन और मंचों पर गीतों का प्रस्तुतिकरण नहीं छोड़ा। सुरेश सपन कहते हैं कि वह रोजाना डायरी में गीत अथवा गजल लिखते हैं और फिर उसी सूचीबद्ध करते हैं।
गजल संग्रह के प्रमुख शेर
मौजूदा हालात की हमने यह तस्वीर उतारी है,
ऊपर ऊपर मौन समंदर तल में हलचल जारी है।
वो शख्स जिसपे मेरे कत्ल की सुपारी है
उसी पे मेरी हिफाजत की जिम्मेदारी है
ये न कहिए थकान बाकी है
हौंसलो में उड़ान बाकी है
घर तो रिश्तों के साथ टूट गया
अब तो खाली मकान बाकी है
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सहारनपुर। हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी जान है, हमें इस पर गुमान है। हर हिंदुस्तानी की पहचान हिंदी से है, हमें इसके प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए। मैं आज जिस भी हाल में हूं, मगर सौभाग्यशाली हूं कि आज भी हिंदी गीत लिखता हूं। क्योंकि हालातों से हारा नहीं हूं, बल्कि हर दम तक हिंदी से जुड़ा रहना चाहता हूं। यह कहना है प्रख्यात गीतकार एवं गजलकार सुरेश सपन का।
अमर उजाला के अभियान हिंदी हैं हम के तहत सुरेश सपन से बात की गई तो उन्होंने बेबाकी से हिंदी की मौजूदा स्थिति के बारे में राय रखी और सुझाव दिया कि हर भारतवासी को हिंदी पर गर्व करना चाहिए। प्रारंभिक शिक्षा से ही बच्चों को हिंदी के प्रति प्रेरित करें। अपना एक शेर सुनाते हुए कहते हैं कि ये न कहिए थकान बाकी है, हौसलों में उड़ान बाकी है...। इसलिए हिंदी को बचाए रखने के लिए हर नागरिक को आगे आना होगा, आने वाली पीढ़ी को जागृत करना होगा।
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हिंदी साहित्यिक सफर
7 मार्च 1947 को रूपचंद वर्मा और चंपा देवी के घर में सुरेश सपन का जन्म हुआ। इन दिनों वह सहारनपुर के मल्हीपुर रोड पर पवन विहार में रहते हैं। 1970 में एमए हिंदी विषय में उत्तीर्ण करने के पश्चात विद्युत निगम में नौकरी की। 2005 में सेवानिवृत्त हुए। 1980 से हिंदी गीत, बाल रचनाएं और गजल लिखना शुरू किया। साहित्यिक संस्था समन्वय के 25 वर्ष तक सचिव रहे। विभावरी, मानसी, नवयुग साहित्यकार संघ मकसद आदि संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। तल में हलचल जारी है शीर्षक से गजल संग्रह का प्रकाशन किया। परिवार में पुत्र पवन वर्मा और पुत्रवधू राखी वर्मा के अलावा पौत्री अनन्या और पौत्र अभिनव के साथ रहते हैं।
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हिंदी में लिखी दोहामयी रामकथा
सुरेश सपन ने वर्ष 2010 में दोहामयी रामकथा लिखी, जिसमें बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुंदर कांड, लंका कांड और उत्तर कांड का उल्लेख हिंदी दोहा के रूप में किया।
मात्रा लगाने की गलती, सजा और सबक
सुरेश सपन बताते हैं कि 1970 में जब वह जैन कॉलेज सहारनपुर से हिंदी विषय में एमए कर रहे थे, तब एक दिन प्रवक्ता ने उनकी कॉपी में हिंदी की एक मात्रा में गलती मिलने पर कक्षा में बेंच पर खड़ा कर सजा दी। वह सजा मेरे जीवन में सबक बनी और फिर हिंदी लेखन में रूचि और ज्यादा बढ़ती गई तथा त्रुटियां भी दूर कर लीं।
कट गईं दोनों टांगे, पर लेखन है जारी
गीतकार सुरेश सपन ने बताया कि पैर की अंगुली में गैंगरीन होने के कारण पहले तो तीन अंगुलियां कटीं और फिर एक टांग कटवानी पड़ी। इसके बाद दूसरी टांग भी इसी बीमारी के कारण कटवानी पड़ गई। आज वह ट्राई साइकिल पर ही रहते हैं, उसी से कमरे में इधर उधर घूमते हैं, बावजूद हिंदी लेखन और मंचों पर गीतों का प्रस्तुतिकरण नहीं छोड़ा। सुरेश सपन कहते हैं कि वह रोजाना डायरी में गीत अथवा गजल लिखते हैं और फिर उसी सूचीबद्ध करते हैं।
गजल संग्रह के प्रमुख शेर
मौजूदा हालात की हमने यह तस्वीर उतारी है,
ऊपर ऊपर मौन समंदर तल में हलचल जारी है।
वो शख्स जिसपे मेरे कत्ल की सुपारी है
उसी पे मेरी हिफाजत की जिम्मेदारी है
ये न कहिए थकान बाकी है
हौंसलो में उड़ान बाकी है
घर तो रिश्तों के साथ टूट गया
अब तो खाली मकान बाकी है