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गांव से लेकर कस्बों तक इलाज ‘बीमार’
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सहारनपुर जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बेहट में चिकित्सकों की कमी।
- फोटो : SAHARANPUR
गांव से लेकर कस्बों तक इलाज ‘बीमार’
सहारनपुर। जनपद में चिकित्सीय स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बेहद खराब है। सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। कई जगहों पर कागजों में डाक्टर तैनात हैं, जबकि वास्तविकता में वहां उनकी मौजूूदगी नहीं है। कहीं फार्मासिस्ट के भरोसे अस्पताल चल रहा है। शासन और प्रशासन के बेहतर चिकित्सा के लाख दावों के बावजूद कस्बे और गांवों में स्थिति चिंताजनक है। जिले के सीएचसी और पीएचसी में 240 के सापेक्ष महज 80 पर चिकित्सक ही तैनात हैं।
चिकित्सकों को तरस रहा देवबंद
चिकित्सा अधीक्षक डा. इंद्राज सिंह ने बताया कि देवबंद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में नवजात बच्चों के लिए अलग से स्टेबलाइजेशन यूनिट बनी हुई है, जिसमें दो बेड की सुविधा है। इसमें डिलीवरी के समय की सभी जरूरी दवाएं और जीवन रक्षक उपकरण उपलब्ध हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डा. मनीष गोयल हैं। लेकिन केंद्र में हड्डी रोग विशेषज्ञ, अल्ट्रासाउंड टेक्नीशियन, फिजिशियन, पैथोलोजिस्ट, डेंटिस्ट और सर्जन नहीं हैं। लंबे समय से इनके पद खाली हैं। हर हफ्ते रिपोर्ट बनाकर सीएमओ और प्रशासन को भेजी जाती है, लेकिन हालात नहीं सुध रहे हैं। इस कारण ये एक रेफरल केंद्र बनकर रह गया है।
न दवा न डॉक्टर, काहे का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
बड़गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद चिकित्सक नहीं हैं। जड़ौदापांडा और अंबेहटाचांद में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं, लेकिन यहां न तो पर्याप्त दवाइयां है, न चिकित्सक और न स्टाफ।
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स्पेशलिस्ट तैनात नहीं, रेफर होते हैं बच्चे
नानौता में अधिकतर निमोनिया से पीड़ित नवजात बच्चे भर्ती होते हैं। लेकिन बाल रोग विशेषज्ञ के अभाव में उन्हें रेफर करना पड़ता है। चिकित्सा अधीक्षक डा. अमित कुमार कहते हैं कि केंद्र पर यदि कोई बच्चा गंभीर होता है, तो उसे रेफर करना मजबूरी है।
फाइलों में तैनात हैं चिकित्सक
साढ़ौली कदीम के कम्बोहमजरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में चिकित्सक नियुक्ति के बाद भी नहीं बैठ रहे हैं। उनकी नियुक्ति केवल फाइलों में है। हालात ये है कि केंद्र मात्र एक फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। फार्मासिस्ट कहीं बाहर चला जाए, तो ताला लटक जाता है।
एफआरयू के बावजूद हाल बेहाल
फतेहपुर सीएचसी को एफआरयू (फस्ट रेफरल यूनिट) का दर्जा प्राप्त है। नवजात शिशु स्थिरीकरण यूनिट यहां होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। रेडिएंट वार्मर और फोटो थेरेपी यूनिट है। बाल रोग विशेषज्ञ का पद 2013 से रिक्त चल रहा है। चिकित्सा प्रभारी डॉ. नवनीत गुप्ता ने बताया कि एक माह में करीब 150 डिलीवरी होती हैं।
केवल नॉर्मल डिलीवरी, सिजेरियन रेफर
मुजफ्फराबाद ब्लॉक मुख्यालय पर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर सिजेरियन डिलीवरी की कोई व्यवस्था नहीं है। गर्भवती महिलाओं को रेफर किया जाता है। यहां पर चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मीनू गोयल तैनात हैं।
केवल जनरल सेवाएं, स्टाफ की कमी
बिहारीगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चार बेड का अस्पताल है। प्रभारी डॉक्टर देशराज ने बताया कि स्टाफ की कमी के कारण प्रसव सेवाएं नहीं हो पा रही हैं। जनरल सेवाएं ही मरीजों को दी जाती हैं।
सरसावा में स्थिति कुछ बेहतर
सहारनपुर शहर से लगते सरसावा कस्बे के सामुदायिक केन्द्र में सीएचसी की स्थिति कुछ बेहतर है। यहां ऑपरेशन थियेटर है, जहां माइनर सर्जरी भी होती है। 15 ऑक्सीजन सिलिंडर हैं। इमरजेंसी किट वाली दो एंबुलेंस की भी तैनाती है।
वर्जन
सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर कई जगह चिकित्सकों की वाकई कमी है। जैसे-तैसे करके चिकित्सीय प्रबंधन किया जा रहा है। 240 स्वीकृत पदों के सापेक्ष महज 80 चिकित्सकों की तैनाती है। ये कमी केवल सहारनपुर जनपद में ही नहीं, बल्कि शासन स्तर पर है। शासन को चिकित्सकों की तैनाती के लिए लिखा गया है।
- डा. बीएस सोढ़ी, सीएमओ सहारनपुर
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सहारनपुर। जनपद में चिकित्सीय स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बेहद खराब है। सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। कई जगहों पर कागजों में डाक्टर तैनात हैं, जबकि वास्तविकता में वहां उनकी मौजूूदगी नहीं है। कहीं फार्मासिस्ट के भरोसे अस्पताल चल रहा है। शासन और प्रशासन के बेहतर चिकित्सा के लाख दावों के बावजूद कस्बे और गांवों में स्थिति चिंताजनक है। जिले के सीएचसी और पीएचसी में 240 के सापेक्ष महज 80 पर चिकित्सक ही तैनात हैं।
चिकित्सकों को तरस रहा देवबंद
चिकित्सा अधीक्षक डा. इंद्राज सिंह ने बताया कि देवबंद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में नवजात बच्चों के लिए अलग से स्टेबलाइजेशन यूनिट बनी हुई है, जिसमें दो बेड की सुविधा है। इसमें डिलीवरी के समय की सभी जरूरी दवाएं और जीवन रक्षक उपकरण उपलब्ध हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डा. मनीष गोयल हैं। लेकिन केंद्र में हड्डी रोग विशेषज्ञ, अल्ट्रासाउंड टेक्नीशियन, फिजिशियन, पैथोलोजिस्ट, डेंटिस्ट और सर्जन नहीं हैं। लंबे समय से इनके पद खाली हैं। हर हफ्ते रिपोर्ट बनाकर सीएमओ और प्रशासन को भेजी जाती है, लेकिन हालात नहीं सुध रहे हैं। इस कारण ये एक रेफरल केंद्र बनकर रह गया है।
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न दवा न डॉक्टर, काहे का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
बड़गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद चिकित्सक नहीं हैं। जड़ौदापांडा और अंबेहटाचांद में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं, लेकिन यहां न तो पर्याप्त दवाइयां है, न चिकित्सक और न स्टाफ।
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स्पेशलिस्ट तैनात नहीं, रेफर होते हैं बच्चे
नानौता में अधिकतर निमोनिया से पीड़ित नवजात बच्चे भर्ती होते हैं। लेकिन बाल रोग विशेषज्ञ के अभाव में उन्हें रेफर करना पड़ता है। चिकित्सा अधीक्षक डा. अमित कुमार कहते हैं कि केंद्र पर यदि कोई बच्चा गंभीर होता है, तो उसे रेफर करना मजबूरी है।
फाइलों में तैनात हैं चिकित्सक
साढ़ौली कदीम के कम्बोहमजरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में चिकित्सक नियुक्ति के बाद भी नहीं बैठ रहे हैं। उनकी नियुक्ति केवल फाइलों में है। हालात ये है कि केंद्र मात्र एक फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। फार्मासिस्ट कहीं बाहर चला जाए, तो ताला लटक जाता है।
एफआरयू के बावजूद हाल बेहाल
फतेहपुर सीएचसी को एफआरयू (फस्ट रेफरल यूनिट) का दर्जा प्राप्त है। नवजात शिशु स्थिरीकरण यूनिट यहां होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। रेडिएंट वार्मर और फोटो थेरेपी यूनिट है। बाल रोग विशेषज्ञ का पद 2013 से रिक्त चल रहा है। चिकित्सा प्रभारी डॉ. नवनीत गुप्ता ने बताया कि एक माह में करीब 150 डिलीवरी होती हैं।
केवल नॉर्मल डिलीवरी, सिजेरियन रेफर
मुजफ्फराबाद ब्लॉक मुख्यालय पर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर सिजेरियन डिलीवरी की कोई व्यवस्था नहीं है। गर्भवती महिलाओं को रेफर किया जाता है। यहां पर चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मीनू गोयल तैनात हैं।
केवल जनरल सेवाएं, स्टाफ की कमी
बिहारीगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चार बेड का अस्पताल है। प्रभारी डॉक्टर देशराज ने बताया कि स्टाफ की कमी के कारण प्रसव सेवाएं नहीं हो पा रही हैं। जनरल सेवाएं ही मरीजों को दी जाती हैं।
सरसावा में स्थिति कुछ बेहतर
सहारनपुर शहर से लगते सरसावा कस्बे के सामुदायिक केन्द्र में सीएचसी की स्थिति कुछ बेहतर है। यहां ऑपरेशन थियेटर है, जहां माइनर सर्जरी भी होती है। 15 ऑक्सीजन सिलिंडर हैं। इमरजेंसी किट वाली दो एंबुलेंस की भी तैनाती है।
वर्जन
सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर कई जगह चिकित्सकों की वाकई कमी है। जैसे-तैसे करके चिकित्सीय प्रबंधन किया जा रहा है। 240 स्वीकृत पदों के सापेक्ष महज 80 चिकित्सकों की तैनाती है। ये कमी केवल सहारनपुर जनपद में ही नहीं, बल्कि शासन स्तर पर है। शासन को चिकित्सकों की तैनाती के लिए लिखा गया है।
- डा. बीएस सोढ़ी, सीएमओ सहारनपुर