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हिम्मत और मेहनत की छेनी से बच्चों को दिया आकार
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संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। मां एक शब्द भर नहीं है बच्चे के लिए वह पूरी दुनिया होती है। खासतौर पर तब जब पिता का साया बच्चों के सिर से उठ गया हो। जिले में बहुत सी ऐसी माताएं हैं जिन्होंने पति का साथ छूटने के बाद विषम हालातों में संघर्ष करते हुए अपने बच्चों की न केवल परवरिश की बल्कि उन्हें समाज में सम्मान जनक मुकाम तक पहुंचाया। मातृ दिवस पर ऐसी मांओं को दिल से सलाम। यह महिलाएं समाज में दूसरों के लिए भी प्रेरणा का श्रोत बनी हैं। पेश है ऐसी ही कुछ माताओं की दास्तान।
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दुखों के टूटे पहाड़, नहीं हारी हिम्मत
नकुड़। मोहल्ला महादेव की प्रेमलता के पति विनोद शर्मा की शादी के आठ साल बाद ही मौत हो गई थी। पान का खोखा चलाने वाले पति तीन छोटे बेटों संजीव, राजीव और अमित की जिम्मेदारी छोड़ गए थे। पति की मौत के छह माह बाद ससुर फूलचंद शर्मा का भी देहांत हो गया। पति व ससुर की मौत के बाद तीन बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी प्रेमलता के कंधों पर आ गई। आय का कोई साधन न होने के कारण प्रेमलता ने दो वर्ष तक ऊनी कपड़े बनाने की मशीन पर काम किया। घर खर्च के बाद जो थोड़े-बहुत पैसे बचे उनको जोड़ कर अपनी मशीन खरीदी। कई सालों तक उसी मशीन के सहारे घर का खर्च चलाया। बच्चे बड़े हुए तो खर्चा भी बढ़ा। इस पर प्रेमलता ने बैंक से पांच हजार रुपये का कर्ज लेकर घर में ही चूड़ी और बिसातखाने की दुकान खोली। इसी दौरान 1994 में दोस्तों के साथ यमुना नदी में नहाने गए मंझले बेटे राजीव की नदी में डूबने से मौत हो गई। लगातार दुखों के पहाड़ टूटने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी मेहनत के बूते बड़े बेटे संजीव को ग्रेजुएट करा कपड़े की दुकान तथा छोटे बेटे अमित को इंटर के बाद साउंड, लाइट्स की दुकान कराई। दोनों बेटों की शादियां की। अमित ने साउंड के साथ ही ज्वेलरी की दुकान भी खोल ली है।
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कांता ने सिलाई करके छह बच्चों को किया पालन पोषण
गंगोह। गांव खालिदपुर की कांतादेवी के पति समय सिंह विवाह के कुछ वर्षों बाद ही किसी को बिना बताए घर छोड़ कर कहीं चले गए थे। इस बात को करीब 30 वर्ष बीत चुके हैं। तब कांता 30 की साल थी। अचानक से उनके ऊपर चार बेटियों और दो बेटों के लालन पालन की जिम्मेदारी आ पड़ी। उनके पास रोजगार का कोई कोई साधन भी नहीं था। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने किसी के आगे हाथ ना फैलाकर अपने सिलाई के हुनर को अपना रोजगार बनाया और गांव में ही सिलाई का कार्य आरंभ किया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और कांता ने बच्चों को शिक्षित किया। उन्होंने दिन रात मेहनत कर चारों बेटियों सारिका, बरखा, लाजवंती और हेमलता का विवाह किया। बड़ा बेटा तरुण घर में ही उनके साथ रहता है, जबकि छोटा बेटा योवन उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है।
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खेतों में मेहनत कर इकलौते बेटे को बनाया लेखपाल
साढ़ौली कदीम। कम्बोह मजरा की बाला देवी के पति चौ. धर्मवीर सिंह का वर्ष 1984 में जब निधन हुआ तो इकलौता बेटा चंद माह का था। बाला देवी ने इससे उबरने की कोशिश की तो ससुर की भी मौत हो गई। एक बारगी वह पूरी तरह टूट गई, लेकिन मासूम बेटे की परवरिश की जिम्मेदारी देख उन्होंने संघर्ष की ठानी। खेती किसानी खुद संभाली और पशुपालन का काम भी किया। बेटे सुमित कुमार को एमटेक तक की उच्च शिक्षा दिलाई। वर्ष 2016 में सुमित ने लेखपाल परीक्षा उच्च अंकों से पास की तो मां की तपस्या पूरी हो गई। गांव की दूसरी महिलाओं के लिए बाला देवी प्रेरणा श्रोत बनी हैं।
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नीरू ने बेटी को डॉक्टर बनाया
देवबंद। डीएम कार्यालय में कार्यरत देवबंद की नीरू सिंह के पति की 15 साल पहले सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। पति की अचानक मौत के बाद वह गहरे सदमें में चली गई थी। दो छोटे बच्चों और घर की जिम्मेदारी उन पर ही आन पड़ी थी। उसने स्वयं को संभाला और दिव्यांग होने व पति को खोने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पति की जगह नौकरी मिलने के बाद नीरू ने बेटी यानिना को बीडीएस चिकित्सक बनाया तथा बेटे राजीव सिंह को होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कराकर एक मां होने के साथ-साथ पिता का भी फर्ज निभाया।
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बेटियों के सपनों को पूरा कर रही पूनम
देवबंद। शिक्षक नगर की पूनम त्यागी पर कोरोना की पहली लहर में पति की अचानक मौत होने से दुख का पहाड़ टूट पड़ा था। दो बेटियों प्रियदर्शी व लक्ष्यदर्शी की परवरिश और घर की जिम्मेदारी उन पर आ गई। घर में कोई कमाने वाला नहीं था। ऐसे में पूनम ने बेटियों की मां होने के साथ ही पिता का फर्ज भी निभाने का फैसला लिया। परिवार चलाने तथा बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का निर्णय लिया। पहले घर में रेडीमेड कपड़ों का कार्य किया, बाद में पब्लिक स्कूल शिक्षिका बनी। बड़ी बेटी स्नातक के बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, जबकि छोटी बेटी इंटर में पढ़ रही है। पूनम कहती है कि वह अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिला उनके सपनों को जरूर पूरा करेगी।
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सहारनपुर। मां एक शब्द भर नहीं है बच्चे के लिए वह पूरी दुनिया होती है। खासतौर पर तब जब पिता का साया बच्चों के सिर से उठ गया हो। जिले में बहुत सी ऐसी माताएं हैं जिन्होंने पति का साथ छूटने के बाद विषम हालातों में संघर्ष करते हुए अपने बच्चों की न केवल परवरिश की बल्कि उन्हें समाज में सम्मान जनक मुकाम तक पहुंचाया। मातृ दिवस पर ऐसी मांओं को दिल से सलाम। यह महिलाएं समाज में दूसरों के लिए भी प्रेरणा का श्रोत बनी हैं। पेश है ऐसी ही कुछ माताओं की दास्तान।
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दुखों के टूटे पहाड़, नहीं हारी हिम्मत
नकुड़। मोहल्ला महादेव की प्रेमलता के पति विनोद शर्मा की शादी के आठ साल बाद ही मौत हो गई थी। पान का खोखा चलाने वाले पति तीन छोटे बेटों संजीव, राजीव और अमित की जिम्मेदारी छोड़ गए थे। पति की मौत के छह माह बाद ससुर फूलचंद शर्मा का भी देहांत हो गया। पति व ससुर की मौत के बाद तीन बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी प्रेमलता के कंधों पर आ गई। आय का कोई साधन न होने के कारण प्रेमलता ने दो वर्ष तक ऊनी कपड़े बनाने की मशीन पर काम किया। घर खर्च के बाद जो थोड़े-बहुत पैसे बचे उनको जोड़ कर अपनी मशीन खरीदी। कई सालों तक उसी मशीन के सहारे घर का खर्च चलाया। बच्चे बड़े हुए तो खर्चा भी बढ़ा। इस पर प्रेमलता ने बैंक से पांच हजार रुपये का कर्ज लेकर घर में ही चूड़ी और बिसातखाने की दुकान खोली। इसी दौरान 1994 में दोस्तों के साथ यमुना नदी में नहाने गए मंझले बेटे राजीव की नदी में डूबने से मौत हो गई। लगातार दुखों के पहाड़ टूटने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी मेहनत के बूते बड़े बेटे संजीव को ग्रेजुएट करा कपड़े की दुकान तथा छोटे बेटे अमित को इंटर के बाद साउंड, लाइट्स की दुकान कराई। दोनों बेटों की शादियां की। अमित ने साउंड के साथ ही ज्वेलरी की दुकान भी खोल ली है।
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कांता ने सिलाई करके छह बच्चों को किया पालन पोषण
गंगोह। गांव खालिदपुर की कांतादेवी के पति समय सिंह विवाह के कुछ वर्षों बाद ही किसी को बिना बताए घर छोड़ कर कहीं चले गए थे। इस बात को करीब 30 वर्ष बीत चुके हैं। तब कांता 30 की साल थी। अचानक से उनके ऊपर चार बेटियों और दो बेटों के लालन पालन की जिम्मेदारी आ पड़ी। उनके पास रोजगार का कोई कोई साधन भी नहीं था। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने किसी के आगे हाथ ना फैलाकर अपने सिलाई के हुनर को अपना रोजगार बनाया और गांव में ही सिलाई का कार्य आरंभ किया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और कांता ने बच्चों को शिक्षित किया। उन्होंने दिन रात मेहनत कर चारों बेटियों सारिका, बरखा, लाजवंती और हेमलता का विवाह किया। बड़ा बेटा तरुण घर में ही उनके साथ रहता है, जबकि छोटा बेटा योवन उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है।
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खेतों में मेहनत कर इकलौते बेटे को बनाया लेखपाल
साढ़ौली कदीम। कम्बोह मजरा की बाला देवी के पति चौ. धर्मवीर सिंह का वर्ष 1984 में जब निधन हुआ तो इकलौता बेटा चंद माह का था। बाला देवी ने इससे उबरने की कोशिश की तो ससुर की भी मौत हो गई। एक बारगी वह पूरी तरह टूट गई, लेकिन मासूम बेटे की परवरिश की जिम्मेदारी देख उन्होंने संघर्ष की ठानी। खेती किसानी खुद संभाली और पशुपालन का काम भी किया। बेटे सुमित कुमार को एमटेक तक की उच्च शिक्षा दिलाई। वर्ष 2016 में सुमित ने लेखपाल परीक्षा उच्च अंकों से पास की तो मां की तपस्या पूरी हो गई। गांव की दूसरी महिलाओं के लिए बाला देवी प्रेरणा श्रोत बनी हैं।
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नीरू ने बेटी को डॉक्टर बनाया
देवबंद। डीएम कार्यालय में कार्यरत देवबंद की नीरू सिंह के पति की 15 साल पहले सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। पति की अचानक मौत के बाद वह गहरे सदमें में चली गई थी। दो छोटे बच्चों और घर की जिम्मेदारी उन पर ही आन पड़ी थी। उसने स्वयं को संभाला और दिव्यांग होने व पति को खोने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पति की जगह नौकरी मिलने के बाद नीरू ने बेटी यानिना को बीडीएस चिकित्सक बनाया तथा बेटे राजीव सिंह को होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कराकर एक मां होने के साथ-साथ पिता का भी फर्ज निभाया।
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बेटियों के सपनों को पूरा कर रही पूनम
देवबंद। शिक्षक नगर की पूनम त्यागी पर कोरोना की पहली लहर में पति की अचानक मौत होने से दुख का पहाड़ टूट पड़ा था। दो बेटियों प्रियदर्शी व लक्ष्यदर्शी की परवरिश और घर की जिम्मेदारी उन पर आ गई। घर में कोई कमाने वाला नहीं था। ऐसे में पूनम ने बेटियों की मां होने के साथ ही पिता का फर्ज भी निभाने का फैसला लिया। परिवार चलाने तथा बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का निर्णय लिया। पहले घर में रेडीमेड कपड़ों का कार्य किया, बाद में पब्लिक स्कूल शिक्षिका बनी। बड़ी बेटी स्नातक के बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, जबकि छोटी बेटी इंटर में पढ़ रही है। पूनम कहती है कि वह अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिला उनके सपनों को जरूर पूरा करेगी।