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निगम के यूनिपोल के ठेकों में भाई-भतीजावाद
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Wed, 01 Nov 2017 12:12 AM IST
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मार्ग पर लगे यूनिपोल।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर में ई-टेंडरिंग शुरू होने के बावजूद नगर निगम में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है। ताजा मामला शहर भर में लगे सैकड़ों यूनिपोल और बाईपोल के ठेकों से जुड़ा है, जिनमें चहेते ठेकेदारों को मालामाल करने के लिए नियमों की अनदेखी की गई है।
चर्चा है कि ठेकेदारों में नगर निगम के ही कई कर्मचारियों के भाई-भतीजे भी शामिल हैं। विज्ञापनों के लिए शहर भर में यूनिपोल और बाईपोल लगाए गए है। इसके लिए नगर निगम ने 268 स्थान चिह्नित किए थे।
इन यूनिपोल और बाईपोल को 17 जोन में बांटा गया था। ई-टेंडरिंग के माध्यम से यूनिपोल और बाईपोल के ठेके की प्रक्रिया शुरू की गई थी। सूत्रों ने बताया कि दस जोन के लिए ठेकेदारों ने आवेदन किया था, जबकि सात जोन में कोई आवेदन नहीं होने या कम बोली लगने की वजह से उनके ठेके निरस्त कर दिए गए।
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इसके बाद नगर निगम ने 10 जोन के ठेके जारी कर दिए गए। नियमानुसार ठेका दो साल के लिए दिया जा सकता है। यानी हर दो साल में नए सिरे से ठेके की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। मगर नगर निगम ने दो साल के ठेकों को सीधा 10 साल के लिए कर दिया। ठेकेदारों के सामने शर्त रखी कि वह प्रत्येक दो वर्ष में रिन्यूवल यानी नवीनीकरण कराएंगे।
नगर निगम की दो साल से सीधे दस साल के लिए ठेका देने के निर्णय को लेकर कुछ लोगों ने साल भी उठाए, मगर उनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया।
ठेका प्रक्रिया में शामिल रहे अधिकारियों ने सफाई देते हुए बताया कि प्रदेश के अन्य शहरों में भी दस-दस साल के लिए ठेके दिए जाते रहे हैं। इसी वजह से यहां भी ऐसा किया गया है।
हालांकि वह भी मानते हैं कि नियम दो साल के लिए ही ठेके देने का है। उधर, सूत्रों ने बताया कि यूनिपोल और बाईपोल का ठेका जिन ठेकेदारों के नाम छोड़ा गया है।
उन ठेकेदारों के साथ नगर निगम के कर्मचारियों के भाई-भतीजों का भी हिस्सा है। यानी साफ नजर आ रहा है कि नगर निगम के अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों के परिजनों को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी कर सीधे दस साल के लिए ठेके थमा दिए हैं।
मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। यदि ऐसा है तो इसकी जांच कराई जाएगी। जो भी लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं उनके विरुद्घ कार्रवाई भी होगी।
- गौरव वर्मा, नगरायुक्त।
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चर्चा है कि ठेकेदारों में नगर निगम के ही कई कर्मचारियों के भाई-भतीजे भी शामिल हैं। विज्ञापनों के लिए शहर भर में यूनिपोल और बाईपोल लगाए गए है। इसके लिए नगर निगम ने 268 स्थान चिह्नित किए थे।
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इन यूनिपोल और बाईपोल को 17 जोन में बांटा गया था। ई-टेंडरिंग के माध्यम से यूनिपोल और बाईपोल के ठेके की प्रक्रिया शुरू की गई थी। सूत्रों ने बताया कि दस जोन के लिए ठेकेदारों ने आवेदन किया था, जबकि सात जोन में कोई आवेदन नहीं होने या कम बोली लगने की वजह से उनके ठेके निरस्त कर दिए गए।
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इसके बाद नगर निगम ने 10 जोन के ठेके जारी कर दिए गए। नियमानुसार ठेका दो साल के लिए दिया जा सकता है। यानी हर दो साल में नए सिरे से ठेके की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। मगर नगर निगम ने दो साल के ठेकों को सीधा 10 साल के लिए कर दिया। ठेकेदारों के सामने शर्त रखी कि वह प्रत्येक दो वर्ष में रिन्यूवल यानी नवीनीकरण कराएंगे।
नगर निगम की दो साल से सीधे दस साल के लिए ठेका देने के निर्णय को लेकर कुछ लोगों ने साल भी उठाए, मगर उनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया।
ठेका प्रक्रिया में शामिल रहे अधिकारियों ने सफाई देते हुए बताया कि प्रदेश के अन्य शहरों में भी दस-दस साल के लिए ठेके दिए जाते रहे हैं। इसी वजह से यहां भी ऐसा किया गया है।
हालांकि वह भी मानते हैं कि नियम दो साल के लिए ही ठेके देने का है। उधर, सूत्रों ने बताया कि यूनिपोल और बाईपोल का ठेका जिन ठेकेदारों के नाम छोड़ा गया है।
उन ठेकेदारों के साथ नगर निगम के कर्मचारियों के भाई-भतीजों का भी हिस्सा है। यानी साफ नजर आ रहा है कि नगर निगम के अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों के परिजनों को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी कर सीधे दस साल के लिए ठेके थमा दिए हैं।
मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। यदि ऐसा है तो इसकी जांच कराई जाएगी। जो भी लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं उनके विरुद्घ कार्रवाई भी होगी।
- गौरव वर्मा, नगरायुक्त।