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जीने के लिए अब तो जाग जाओ
Saharanpur
Updated Thu, 05 Jun 2014 05:31 AM IST
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सहारनपुर। पंच तत्व का सिद्धांत याद है? जीवन आग, पानी, हवा, धरती और आकाश के संतुलन से चलता है। इनके असंतुलन का मतलब है मौत। इंसान के अस्तित्व के लिए खतरे की बात है कि शहर जिंदगी से दूर होते जा रहे हैं। इस बात को सहारनपुर से बेहतर शायद ही कोई समझ सके। प्रदूषण की वजह से कैंसर जैसी बीमारियां फैल रही हैं और हर साल जाने कितनी जानें जा रही हैं। शिवालिक पर्वतमाला और यमुना की गोद में बसा सहारनपुर स्वच्छ हवा और पानी के लिए तड़प रहा है। अतीत ऐसा नहीं था। कुदरत से हरियाली का तोहफा मिला था, मगर विस्तार और विकास का लालच सब कुछ खत्म करता जा रहा है। न पेड़ बचे, न झील और न तालाब। नतीजा सामने है। आदमी क्या, पशु-पक्षी भी तड़प रहे हैं। अब समय आ गया है पिछली गलतियों से चेतने का और भविष्य की चिंता करने का।
मुद्दा पर्यावरण को सहेजने का है तो सच से कैसे मुुंह फेरा जा सकता है। सहारनपुर की बात करें तो बीस साल पहले यहां की आबादी महज 15 लाख भी नहीं थी। 2001 आते-आते जनसंख्या 28 लाख पहुंच गई और अब ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह 34 करोड़ हो चुकी है। इतनी भीड़ कि एक किलोमीटर के दायरे में करीब एक हजार लोग भरे हैं। वाहनों से हो रहे प्रदूषण से संकट और भी भयानक है।
पर्यावरण के जानकार बताते हैं, 67 फीसदी वायु प्रदूषण की वजह वाहन हैं। अकेले सहारनपुर में पांच लाख से ज्यादा वाहन दौड़ रहे हैं। आसपास के बाकी शहर भी जोड़ें तो गाड़ियों की तादाद कहीं ज्यादा है। इतनी बड़ी तादाद में वाहन, कारखाने, प्लांटों का जहरीला धुएं ने यहां की आबोहवा इतनी दूषित कर दी है कि सांस लेना दूभर हो रहा है। पानी की हालत तो इससे भी बुरी है। रोज हजारों एमएलडी सीवर, सॉलिड बेस्ड, कमेलों के अवशेष भूजल में समाने से अधिकांश इलाकों का पानी पीने लायक ही नहीं रहा है। खराब पानी और हवा का ही नतीजा है कि इंसानी जिंदगी का औसत लगातार नीचे आ रहा है। जहां देखो वहां कैंसर, अस्थमा, टीबी आदि के मरीज बढ़ रहे हैं। वैज्ञानिक सच डराने वाला है। यहां ढाई फीसदी मौतें अब प्रदूषण के कारण ही हो रही हैं।
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पर्यावरणविद् डा. एसके उपाध्याय कहते हैं कि पेड़, नदी, तालाब, झीलों को जिंदा रखा जाता तो ऐसे हालात पैदा नहीं होते। यह सब जिंदगी की संजीवन थे, जिनको कंकरीट के जंगल बनाते-बनाते इंसान ने मिटा डाला। सिर्फ नारों से बात नहीं बनेगी। चैन से जीना है तो कुदरत के कानून मानने ही पड़ेंगे।
सहारनपुर की 34 लाख आबादी को सांस लेने के लिए 2.5 करोड़ पौधों की जरूरत है, मगर सामाजिक वानिकी के कागजी खेल में शहर में केवल 1.26 फीसदी जमीन ही वन क्षेत्र है। विकास की अंधी दौड़ में पेड़ लगाने की बजाय काटे जा रहे हैं और कंाक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। पिछले 10 सालों में प्रशासन की ओर से पौधरोपण पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन इन पौधों में केवल 10 फीसदी ही बच पाए हैं। पेड़ कम होने से पक्षियों की संख्या भी तेजी से घट रही है। नगरायुक्त नीरज शुक्ला कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण में बदलाव और दूसरी समस्याओं का हल केवल पेड़-पौधे ही हैं। हर व्यक्ति यदि साल में एक पेड़ लगाए तो साल में लाखों पेड़ लग सकते हैं। स्वस्थ्य जीवन के लिए हर आदमी को चेतना होगा और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में योगदान देना होगा।
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मुद्दा पर्यावरण को सहेजने का है तो सच से कैसे मुुंह फेरा जा सकता है। सहारनपुर की बात करें तो बीस साल पहले यहां की आबादी महज 15 लाख भी नहीं थी। 2001 आते-आते जनसंख्या 28 लाख पहुंच गई और अब ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह 34 करोड़ हो चुकी है। इतनी भीड़ कि एक किलोमीटर के दायरे में करीब एक हजार लोग भरे हैं। वाहनों से हो रहे प्रदूषण से संकट और भी भयानक है।
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पर्यावरण के जानकार बताते हैं, 67 फीसदी वायु प्रदूषण की वजह वाहन हैं। अकेले सहारनपुर में पांच लाख से ज्यादा वाहन दौड़ रहे हैं। आसपास के बाकी शहर भी जोड़ें तो गाड़ियों की तादाद कहीं ज्यादा है। इतनी बड़ी तादाद में वाहन, कारखाने, प्लांटों का जहरीला धुएं ने यहां की आबोहवा इतनी दूषित कर दी है कि सांस लेना दूभर हो रहा है। पानी की हालत तो इससे भी बुरी है। रोज हजारों एमएलडी सीवर, सॉलिड बेस्ड, कमेलों के अवशेष भूजल में समाने से अधिकांश इलाकों का पानी पीने लायक ही नहीं रहा है। खराब पानी और हवा का ही नतीजा है कि इंसानी जिंदगी का औसत लगातार नीचे आ रहा है। जहां देखो वहां कैंसर, अस्थमा, टीबी आदि के मरीज बढ़ रहे हैं। वैज्ञानिक सच डराने वाला है। यहां ढाई फीसदी मौतें अब प्रदूषण के कारण ही हो रही हैं।
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पर्यावरणविद् डा. एसके उपाध्याय कहते हैं कि पेड़, नदी, तालाब, झीलों को जिंदा रखा जाता तो ऐसे हालात पैदा नहीं होते। यह सब जिंदगी की संजीवन थे, जिनको कंकरीट के जंगल बनाते-बनाते इंसान ने मिटा डाला। सिर्फ नारों से बात नहीं बनेगी। चैन से जीना है तो कुदरत के कानून मानने ही पड़ेंगे।
सहारनपुर की 34 लाख आबादी को सांस लेने के लिए 2.5 करोड़ पौधों की जरूरत है, मगर सामाजिक वानिकी के कागजी खेल में शहर में केवल 1.26 फीसदी जमीन ही वन क्षेत्र है। विकास की अंधी दौड़ में पेड़ लगाने की बजाय काटे जा रहे हैं और कंाक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। पिछले 10 सालों में प्रशासन की ओर से पौधरोपण पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन इन पौधों में केवल 10 फीसदी ही बच पाए हैं। पेड़ कम होने से पक्षियों की संख्या भी तेजी से घट रही है। नगरायुक्त नीरज शुक्ला कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण में बदलाव और दूसरी समस्याओं का हल केवल पेड़-पौधे ही हैं। हर व्यक्ति यदि साल में एक पेड़ लगाए तो साल में लाखों पेड़ लग सकते हैं। स्वस्थ्य जीवन के लिए हर आदमी को चेतना होगा और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में योगदान देना होगा।