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रैली के बाद जमीयत के रुख पर नजर
Saharanpur
Updated Thu, 13 Feb 2014 05:44 AM IST
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सहारनपुर। सपा के जलसा-ए-आम में मंच से की गई तकरीर का असर जानने के इळए हर कोई बेताब है। जलसे के बाद देशभर के उलेमा के साथ ही राजनीतिक पार्टियों की भी नजर जमीयत के रुख पर टिकी हुई है। उधर, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा कर कांग्रेस के माथे पर शिकन ला दी है। जलसे के बाद अब राजनीतिक पार्टियां सपा को सीधी टक्कर देने के लिए महमूद मदनी गुट को रिझाने की कवायद कर सकती है।
जमीयत ने मेडिकल कॉलेज का नाम शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन करवाकर न केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को सम्मान दिलाया है, साथ ही कौम को भी नया संदेश दिया। इससे जमीयत की पैठ देवबंदियों में मजबूत होगी। उधर, अरशद मदनी के मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा करने के बाद न केवल राजनीतिक दल बल्कि खुद जमीयत भी मुसलमानों में इसका असर को भांपने में जुटी है। दरअसल, मौलाना मरहूम असद मदनी का रुख हमेशा ही कांग्रेस की ओर थोड़ा नरम रहा। वर्ष 1980 में दारुल उलूम के 100 साला जलसे में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी शरीक हुए थे। बता दें कि भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त अमन कायम करने में जमीयत का अहम रोल रहा। इसके बाद से ही कांग्रेस ने मौखिक तौर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष को राज्यसभा में भेजने का वायदा भी किया था।
असद मदनी करीब 15 साल तक कांग्र्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य रहे। छह फरवरी 2006 को उनके इंतकाल के बाद जमीयत में टकराव और अलगाव भी हुआ। जमीयत उलेमा-ए-हिंद दो फाड़ हुई। एक गुट के मौलाना अरशद मदनी राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए और दूसरे गुट में उन्हीं के भतीजे मौलाना महमूद मदनी ने राष्ट्रीय महासचिव बनकर कमान संभाली। भतीजे मौलाना महमूद मदनी को बसपा और राष्ट्रीय लोकदल ने राज्यसभा भेजकर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की, मगर हालात बदलने के साथ ही मौलाना महमूद मदनी ने इन दोनों राजनीतिक दलों से दूरी बना ली। अब शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन मेडिकल कालेज के उद्घाटन समारोह के बाद सपा की रैली को सियासी चातुर्य से नाम बदलकर जलसा-ए-आम नाम देकर वजीर-ए-ममलकत आशु मलिक ने मौलाना अरशद मदनी से रैली की सदारत करवाने में कामयाबी पा ली।
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मुलायम सिंह यादव ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए मंच का खुलकर इस्तेमाल किया। अब सपा और जमीयत के अलावा भी सियासी दल इस जलसे का मुसलमानों पर संभावित असर को भांपने में जुटी है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मौलाना महमूद मदनी गुट के जरिए कुछ सियासी दल सपा को चुनौती दे सकते हैं।
मंच पर उलेमा के भारी पड़ने का था डरः जलसा-ए-आम में समाजवादी पार्टी के नेताओं को उलेमा के भारी पड़ने का डर था। दरअसल, मुजफ्फरनगर दंगे के बाद सपा ने पहली बार वेस्ट यूपी में कोई जलसा किया। इससे पहले सपा की रैली को लेकर जमीयत के तल्ख तेवर के चलते तमाम कयास लगाए जा रहे थे, मगर दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री आशु मलिक ने सियासी चातुर्य से न केवल उलेमा को मंच पर बैठाया। बल्कि अरशद मदनी से खुले दिल से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की तारीफ करवाने में कामयाबी हासिल की। इससे आलाकमान की नजरों में और सहारनपुर में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ी है।
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जमीयत ने मेडिकल कॉलेज का नाम शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन करवाकर न केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को सम्मान दिलाया है, साथ ही कौम को भी नया संदेश दिया। इससे जमीयत की पैठ देवबंदियों में मजबूत होगी। उधर, अरशद मदनी के मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा करने के बाद न केवल राजनीतिक दल बल्कि खुद जमीयत भी मुसलमानों में इसका असर को भांपने में जुटी है। दरअसल, मौलाना मरहूम असद मदनी का रुख हमेशा ही कांग्रेस की ओर थोड़ा नरम रहा। वर्ष 1980 में दारुल उलूम के 100 साला जलसे में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी शरीक हुए थे। बता दें कि भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त अमन कायम करने में जमीयत का अहम रोल रहा। इसके बाद से ही कांग्रेस ने मौखिक तौर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष को राज्यसभा में भेजने का वायदा भी किया था।
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असद मदनी करीब 15 साल तक कांग्र्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य रहे। छह फरवरी 2006 को उनके इंतकाल के बाद जमीयत में टकराव और अलगाव भी हुआ। जमीयत उलेमा-ए-हिंद दो फाड़ हुई। एक गुट के मौलाना अरशद मदनी राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए और दूसरे गुट में उन्हीं के भतीजे मौलाना महमूद मदनी ने राष्ट्रीय महासचिव बनकर कमान संभाली। भतीजे मौलाना महमूद मदनी को बसपा और राष्ट्रीय लोकदल ने राज्यसभा भेजकर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की, मगर हालात बदलने के साथ ही मौलाना महमूद मदनी ने इन दोनों राजनीतिक दलों से दूरी बना ली। अब शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन मेडिकल कालेज के उद्घाटन समारोह के बाद सपा की रैली को सियासी चातुर्य से नाम बदलकर जलसा-ए-आम नाम देकर वजीर-ए-ममलकत आशु मलिक ने मौलाना अरशद मदनी से रैली की सदारत करवाने में कामयाबी पा ली।
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मुलायम सिंह यादव ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए मंच का खुलकर इस्तेमाल किया। अब सपा और जमीयत के अलावा भी सियासी दल इस जलसे का मुसलमानों पर संभावित असर को भांपने में जुटी है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मौलाना महमूद मदनी गुट के जरिए कुछ सियासी दल सपा को चुनौती दे सकते हैं।
मंच पर उलेमा के भारी पड़ने का था डरः जलसा-ए-आम में समाजवादी पार्टी के नेताओं को उलेमा के भारी पड़ने का डर था। दरअसल, मुजफ्फरनगर दंगे के बाद सपा ने पहली बार वेस्ट यूपी में कोई जलसा किया। इससे पहले सपा की रैली को लेकर जमीयत के तल्ख तेवर के चलते तमाम कयास लगाए जा रहे थे, मगर दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री आशु मलिक ने सियासी चातुर्य से न केवल उलेमा को मंच पर बैठाया। बल्कि अरशद मदनी से खुले दिल से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की तारीफ करवाने में कामयाबी हासिल की। इससे आलाकमान की नजरों में और सहारनपुर में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ी है।