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कहीं वजीफे से हाथ न धो बैठें हजारों छात्र
Saharanpur
Updated Sun, 14 Oct 2012 12:00 PM IST
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सहारनपुर। अल्पसंख्यक समुदाय के करीब डेढ़ लाख छात्र-छात्राओं में से हजारों का वजीफा खतरे में पड़ गया है। बेसिक शिक्षा विभाग, माध्यमिक शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद अब तक केवल करीब 80 हजार छात्र-छात्राओं के ही बैंक खाते खुल पाए हैं, जबकि 50 हजार से अधिक छात्रों के खाते नहीं खुले हैं। ऐसे छात्र-छात्राओं के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। शासन की ओर से 15 अक्तूबर तक तिथि बढ़ाने के बावजूद वे इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
दरअसल, 14 अक्तूबर को रविवार होने के कारण बैंकों में कोई कार्य नहीं हो पाएगा। ऐसे में बाकी बचे एक दिन में 50 हजार से अधिक खाते खोल पाना आसान नहीं है। जिले के ज्यादातर राष्ट्रीय बैंक खातों के बोझ को लेकर पहले भी हाथ खड़े कर चुके हैं। एक सप्ताह पहले ही बैंकों के अफसरों के साथ हुई बैठक में कहा गया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्टाफ पहले ही बहुत कम हैं। उसके लिए खाते खुलवाने वालों की लंबी कतार और फिर उनकी मेंटेनिंग को संभाल पाना आसान काम नहीं है।
ज्यादातर देहाती इलाकों में बैंकों की हालत यह है कि एक ही अधिकारी मैनेजर का काम करता है, फिर वही अधिकारी कैशियर सहित अन्य कामकाज भी निपटाता है। बैंक के काउंसलर के रूप में भी उसे अलग से काम करना पड़ता है। बैंकों की इस बेबसी के बाद शिक्षा विभाग एवं अल्पसंख्यक विभाग के अफसरों के लिए भी खाते गले की हड्डी बन गए हैं। यदि खाते नहीं खुले तो हजारों छात्र छात्राओं का वजीफे से वंचित होना तय है।
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इस बारे में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी अंजना सिरोही का कहना है कि शासन की ओर से तिथि आगे बढ़ाई गई है। खातों को लेकर जिस तरह की परेशानियां सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए अभी कहना मुश्किल है कि लक्ष्य पूरा हो पाएगा या नहीं। कोशिश तो पूरी की जा रही हैं।
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दरअसल, 14 अक्तूबर को रविवार होने के कारण बैंकों में कोई कार्य नहीं हो पाएगा। ऐसे में बाकी बचे एक दिन में 50 हजार से अधिक खाते खोल पाना आसान नहीं है। जिले के ज्यादातर राष्ट्रीय बैंक खातों के बोझ को लेकर पहले भी हाथ खड़े कर चुके हैं। एक सप्ताह पहले ही बैंकों के अफसरों के साथ हुई बैठक में कहा गया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्टाफ पहले ही बहुत कम हैं। उसके लिए खाते खुलवाने वालों की लंबी कतार और फिर उनकी मेंटेनिंग को संभाल पाना आसान काम नहीं है।
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ज्यादातर देहाती इलाकों में बैंकों की हालत यह है कि एक ही अधिकारी मैनेजर का काम करता है, फिर वही अधिकारी कैशियर सहित अन्य कामकाज भी निपटाता है। बैंक के काउंसलर के रूप में भी उसे अलग से काम करना पड़ता है। बैंकों की इस बेबसी के बाद शिक्षा विभाग एवं अल्पसंख्यक विभाग के अफसरों के लिए भी खाते गले की हड्डी बन गए हैं। यदि खाते नहीं खुले तो हजारों छात्र छात्राओं का वजीफे से वंचित होना तय है।
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इस बारे में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी अंजना सिरोही का कहना है कि शासन की ओर से तिथि आगे बढ़ाई गई है। खातों को लेकर जिस तरह की परेशानियां सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए अभी कहना मुश्किल है कि लक्ष्य पूरा हो पाएगा या नहीं। कोशिश तो पूरी की जा रही हैं।