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कछुओं के अंडों से निकले 84 शावक
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कछुए के 84 बच्चों ने लिया जन्म, वन विभाग उत्साहित
सहारनपुर। कछुओं के संरक्षण और संवर्द्धन की दिशा में सहारनपुर वन परिक्षेत्र को कामयाबी हासिल हुई है। 108 अंडों में से 84 कछुओं के बच्चों ने हाल ही में जन्म लिया है। इन्हें जल्द ही गंगा में छोड़ा जाएगा।
सहारनपुर वन परिक्षेत्र की ओर से जनवरी 2019 में मुजफ्फरनगर जिले के हंसावला ग्राम में कछुआ संरक्षण कार्यक्रम के तहत गंगा नदी के किनारे कछुआ हैचरी का निर्माण किया गया था। वन संरक्षक वीके जैन के निर्देश पर मुजफ्फरनगर वन क्षेत्र के रेंज अधिकारी मनोज बलोदी और विश्व प्रकृति निधि के को-आर्डिनेटर संजीव यादव को साथ में जोड़ा गया। ग्रामीणों की मदद से रेत में 108 अंडों को संरक्षित किया गया। इनमें से 84 कछुओं के बच्चों ने कुछ दिन पहले जन्म लिया है। इनमें तीन प्रजातियों के कछुए हैं, जिसमें अतिसंकट ग्रस्त स्ट्रिप्ड रूफ्ड टर्टल भी शामिल है। शेष दो प्रजातियां ब्राउन रूफ्ड टर्टल और इंडियन टेंट टर्टल को भारतीय वन्यजीव अधिनियम में संरक्षण प्राप्त है।
गंगा नदी तट पर अंडों को नष्ट होने से बचाया
सहारनपुर वन परिक्षेत्र के वन संरक्षक वीके जैन ने बताया कि गंगा नदी के रेतीले तटों व टापुओं पर खेती (पलेज) की जाती है। इस कारण कछुओं के घोंसले व अंडे नष्ट हो जाते हैं। परियोजना में स्थानीय लोगों को कछुओं के संरक्षण के लिए प्रेरित किया गया। विश्व प्रकृति निधि ने वैज्ञानिक विधि से कछुओं के घोंसलों को पलेज से नदी में ही सुरक्षित व अनुकूल टापू पर स्थित हैचरी में स्थानांतरित किया गया। जन्म के पश्चात बच्चों को हैचरी से नर्सरी तालाब में लाया गया है। अब उन्हें जीवन के प्रारंभिक दिनों के खतरों से बचाने के बाद नदी में छोड़ा जाएगा।
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2947 बच्चों को संरक्षित कर छोड़ा गया
जनपद मेरठ के हस्तिनापुर वन्य- जीव विहार में कछुआ नर्सरी तालाब का निर्माण कराया गया है। बाढ़ के बाद नर्सरी तालाब से कछुए के बच्चों को नदी में उनके सुरक्षित वास स्थल पर छोड़ दिया जाता है। 2019 तक इस परियोजना के तहत संकटग्रस्त प्रजातियों के 2947 बच्चों को गंगा नदी में छोड़ा जा चुका है।
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सहारनपुर। कछुओं के संरक्षण और संवर्द्धन की दिशा में सहारनपुर वन परिक्षेत्र को कामयाबी हासिल हुई है। 108 अंडों में से 84 कछुओं के बच्चों ने हाल ही में जन्म लिया है। इन्हें जल्द ही गंगा में छोड़ा जाएगा।
सहारनपुर वन परिक्षेत्र की ओर से जनवरी 2019 में मुजफ्फरनगर जिले के हंसावला ग्राम में कछुआ संरक्षण कार्यक्रम के तहत गंगा नदी के किनारे कछुआ हैचरी का निर्माण किया गया था। वन संरक्षक वीके जैन के निर्देश पर मुजफ्फरनगर वन क्षेत्र के रेंज अधिकारी मनोज बलोदी और विश्व प्रकृति निधि के को-आर्डिनेटर संजीव यादव को साथ में जोड़ा गया। ग्रामीणों की मदद से रेत में 108 अंडों को संरक्षित किया गया। इनमें से 84 कछुओं के बच्चों ने कुछ दिन पहले जन्म लिया है। इनमें तीन प्रजातियों के कछुए हैं, जिसमें अतिसंकट ग्रस्त स्ट्रिप्ड रूफ्ड टर्टल भी शामिल है। शेष दो प्रजातियां ब्राउन रूफ्ड टर्टल और इंडियन टेंट टर्टल को भारतीय वन्यजीव अधिनियम में संरक्षण प्राप्त है।
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गंगा नदी तट पर अंडों को नष्ट होने से बचाया
सहारनपुर वन परिक्षेत्र के वन संरक्षक वीके जैन ने बताया कि गंगा नदी के रेतीले तटों व टापुओं पर खेती (पलेज) की जाती है। इस कारण कछुओं के घोंसले व अंडे नष्ट हो जाते हैं। परियोजना में स्थानीय लोगों को कछुओं के संरक्षण के लिए प्रेरित किया गया। विश्व प्रकृति निधि ने वैज्ञानिक विधि से कछुओं के घोंसलों को पलेज से नदी में ही सुरक्षित व अनुकूल टापू पर स्थित हैचरी में स्थानांतरित किया गया। जन्म के पश्चात बच्चों को हैचरी से नर्सरी तालाब में लाया गया है। अब उन्हें जीवन के प्रारंभिक दिनों के खतरों से बचाने के बाद नदी में छोड़ा जाएगा।
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2947 बच्चों को संरक्षित कर छोड़ा गया
जनपद मेरठ के हस्तिनापुर वन्य- जीव विहार में कछुआ नर्सरी तालाब का निर्माण कराया गया है। बाढ़ के बाद नर्सरी तालाब से कछुए के बच्चों को नदी में उनके सुरक्षित वास स्थल पर छोड़ दिया जाता है। 2019 तक इस परियोजना के तहत संकटग्रस्त प्रजातियों के 2947 बच्चों को गंगा नदी में छोड़ा जा चुका है।