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सियासत से दूरी का दावा, मगर राजनीति में रहा है सक्रिय
Updated Fri, 09 Jun 2017 01:12 AM IST
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सियासत से दूरी का दावा, मगर राजनीति में रहा है सक्रिय
सहारनपुर। भीम आर्मी का संस्थापक चंद्रशेखर दावा करता रहा कि वह सियासी व्यक्ति नहीं है और सियायत से दूर है। भीम आर्मी गैर राजनीतिक संगठन है। लेकिन हमेशा ही चंद्रशेखर राजनीति मेें पूरी तरह से सक्रिय रहा। न सिर्फ सियासी लोगों के संपर्क में रहा, बल्कि संगठन की बैठक में सियासी दलों के प्रतिनिधियों को भी बुलाता रहा। लोकसभा से पूर्व भीम आर्मी ने बसपा को समर्थन का एलान भी किया था।
चंद्रशेखर ने दावा किया कि न तो वह सियासी है और न ही उसका संगठन ही राजनैतिक है। वह भीम आर्मी भारत एकता मिशन को सामाजिक संगठन बताता रहा है। लेकिन हकीकत उससे बिल्कुल अलग रही है। चंद्रशेखर हमेशा से ही राजनीति से जुड़ा रहा है और पूरी तरह से सक्रिय भी रहा है। वह हमेशा से ही खुद को बसपा से जोड़कर चला। यही नहीं भीम आर्मी को भी बसपा का ही संगठन बताया। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चंद्रशेखर ने ही प्रेस वार्ता कर भीम आर्मी के बसपा को समर्थन दिए जाने का न सिर्फ ऐलान किया था, बल्कि पूरा संगठन पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की रैली में पहुंचा। यही नहीं शब्बीरपुर में मायावती के दौरे के समय भी भीम आर्मी के पदाधिकारी बसपा, मायावती और भीम आर्मी के नारे लगाते रहे।
भीम आर्मी की बैठकों में सियासी दखल पूरी तरह से रहा। संत रविदास छात्रावास में होने वाली भीम आर्मी की बैठकों में बसपा के पूर्व विधायक रविंद्र कुमार मोल्हू एवं बसपा के पदाधिकारी भी शामिल होते रहे। अब जब बसपा ने भीम आर्मी से पल्ला झाड़ लिया तो भीम आर्मी कांग्रेस के साथ मिल गई।
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बृहस्पतिवार को ही कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद ने चंद्रशेखर और भीम आर्मी के कांग्रेस के साथ मिलकर चलने की बात कही और चंद्रशेखर उर्फ रावण को नेता बताया। इससे चंद्रशेखर के सियासत से दूरी के दावे बेशक रहे हों, लेकिन वास्तविकता यही रही कि चंद्रशेखर और भीम आर्मी पूरी तरह से सियासी संगठनों से जुड़ी रही है।
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सहारनपुर। भीम आर्मी का संस्थापक चंद्रशेखर दावा करता रहा कि वह सियासी व्यक्ति नहीं है और सियायत से दूर है। भीम आर्मी गैर राजनीतिक संगठन है। लेकिन हमेशा ही चंद्रशेखर राजनीति मेें पूरी तरह से सक्रिय रहा। न सिर्फ सियासी लोगों के संपर्क में रहा, बल्कि संगठन की बैठक में सियासी दलों के प्रतिनिधियों को भी बुलाता रहा। लोकसभा से पूर्व भीम आर्मी ने बसपा को समर्थन का एलान भी किया था।
चंद्रशेखर ने दावा किया कि न तो वह सियासी है और न ही उसका संगठन ही राजनैतिक है। वह भीम आर्मी भारत एकता मिशन को सामाजिक संगठन बताता रहा है। लेकिन हकीकत उससे बिल्कुल अलग रही है। चंद्रशेखर हमेशा से ही राजनीति से जुड़ा रहा है और पूरी तरह से सक्रिय भी रहा है। वह हमेशा से ही खुद को बसपा से जोड़कर चला। यही नहीं भीम आर्मी को भी बसपा का ही संगठन बताया। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चंद्रशेखर ने ही प्रेस वार्ता कर भीम आर्मी के बसपा को समर्थन दिए जाने का न सिर्फ ऐलान किया था, बल्कि पूरा संगठन पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की रैली में पहुंचा। यही नहीं शब्बीरपुर में मायावती के दौरे के समय भी भीम आर्मी के पदाधिकारी बसपा, मायावती और भीम आर्मी के नारे लगाते रहे।
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भीम आर्मी की बैठकों में सियासी दखल पूरी तरह से रहा। संत रविदास छात्रावास में होने वाली भीम आर्मी की बैठकों में बसपा के पूर्व विधायक रविंद्र कुमार मोल्हू एवं बसपा के पदाधिकारी भी शामिल होते रहे। अब जब बसपा ने भीम आर्मी से पल्ला झाड़ लिया तो भीम आर्मी कांग्रेस के साथ मिल गई।
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बृहस्पतिवार को ही कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद ने चंद्रशेखर और भीम आर्मी के कांग्रेस के साथ मिलकर चलने की बात कही और चंद्रशेखर उर्फ रावण को नेता बताया। इससे चंद्रशेखर के सियासत से दूरी के दावे बेशक रहे हों, लेकिन वास्तविकता यही रही कि चंद्रशेखर और भीम आर्मी पूरी तरह से सियासी संगठनों से जुड़ी रही है।