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कभी सहारनपुर की राजनीति का केंद्र होता था प्रभात कैफे
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सहारनपुर। लोकसभा चुनाव को लेकर इन दिनों हर तरफ राजनीति की चर्चा है। लोग प्रत्याशियों की हार और जीत के समीकरण बनाने में लगे हैं। ऐसे में सहारनपुर के प्रभात कैफे की यादें ताजा हो गईं हैं। क्योंकि, कभी प्रभात कैफे ही पूरे जनपद की राजनीति का केंद्र होता था। यहां चाय की चुस्कियों के साथ विधायक, सांसद और सभी राजनीतिक दलों के छोटे-बड़े नेता व पदाधिकारी चर्चा करते थे।
घंटाघर के निकट स्थित प्रभात सिनेमा का कैफे 1972 से पूर्व से ही सहारनपुर की राजनीति का केंद्र रहा है। जानकार बताते हैं कि यह कैफे सभी राजनीतिक दलों से जुड़े विधायक, सांसद, पदाधिकारी और छोटे-बड़े नेताओं का अड्डा रहा। यहीं पूरे दिन राजनीति को लेकर चर्चा होती थी। इसके साथ ही किसे चुनाव लड़वाना है और कैसे चुनाव जीता जाएगा, इसको लेकर भी रूपरेखा तैयार की जाती थी।
भाजपा के प्रचार-प्रसार और निर्माण विभाग के महानगर संयोजक महेंद्र सचदेवा ने बताया कि प्रभात कैफे मिनी विधानसभा के नाम से मशहूर था। 1972 से पहले ही यह सहारनपुर की राजनीति का केंद्र रहा। यहां सभी दलों के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों का आना जाना लगा रहता था। कई बार तो नेताओं के बीच यहां डिबेट भी हो जाती थी। 1982 रमा माहेश्वरी हत्याकांड का आंदोलन भी प्रभात कैफे से संचालित किया गया था। डाक्टर राम मनोहर लोहिया का अंग्रेजी हटाओ आंदोलन भी यहीं चला था। पूर्व विधायक चमन लाल चमन, सुमेर चंद गोयल, प्रेमनाथ गर्ग, राकेश गुप्ता, महेंद्र भल्ला सहित कई बड़े नेताओं का हमेशा प्रभात कैफे में जमावड़ा लगा रहता था। चुनाव के दिनों 24 घंटे प्रभात कैफे में नेताओं का आना होता था। इसके अलावा साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों भी यह अहम अड्डा था। पूर्व विधायक चमन लाल चमन का कहना है कि प्रभात कैफे पर कभी चुनाव और तत्कालीन हालातों को लेकर तमाम संगठनों के जनप्रतिनिधियों व नेताओं के बीच चर्चा होती थी। यहां पर सभी पार्टियों के बड़े-छोटे नेता बैठते थे। एक वक्त ऐसा था, जब तक प्रभातकैफे की चाय नहीं पीते थे, तब तक दिनचर्या अधूरी लगती थी। प्रभात कैफे के संचालक राजीव जुनेजा का कहना है कि कैफे से ही पूरे जनपद की राजनीति संचालित होती थी। पांच से छह साल पूर्व प्रभात कैफे की रौनक कम हो गई। सोशल मीडिया के दौर में अब जनप्रतिनिधि प्रभात कैफे पर नहीं आते हैं। काम ठप हो जाने की वजह से कुछ दिनों से कैफे बंद पड़ा है। देवला निवासी पप्पू भाई का कहना है कि प्रभात कैफे से कई बड़े नेता तैयार हुए हैं। क्योंकि, वरिष्ठ नेताओं के साथ युवा भी चर्चा करते थे और उनमें राजनीति के प्रति अलख जगती थी। इस कैफे को मिनी विधानसभा के नाम से जाना जाता था। मगर, अब कैफे की यह पुरानी यादें इतिहास बनकर रह गई हैं।
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घंटाघर के निकट स्थित प्रभात सिनेमा का कैफे 1972 से पूर्व से ही सहारनपुर की राजनीति का केंद्र रहा है। जानकार बताते हैं कि यह कैफे सभी राजनीतिक दलों से जुड़े विधायक, सांसद, पदाधिकारी और छोटे-बड़े नेताओं का अड्डा रहा। यहीं पूरे दिन राजनीति को लेकर चर्चा होती थी। इसके साथ ही किसे चुनाव लड़वाना है और कैसे चुनाव जीता जाएगा, इसको लेकर भी रूपरेखा तैयार की जाती थी।
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भाजपा के प्रचार-प्रसार और निर्माण विभाग के महानगर संयोजक महेंद्र सचदेवा ने बताया कि प्रभात कैफे मिनी विधानसभा के नाम से मशहूर था। 1972 से पहले ही यह सहारनपुर की राजनीति का केंद्र रहा। यहां सभी दलों के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों का आना जाना लगा रहता था। कई बार तो नेताओं के बीच यहां डिबेट भी हो जाती थी। 1982 रमा माहेश्वरी हत्याकांड का आंदोलन भी प्रभात कैफे से संचालित किया गया था। डाक्टर राम मनोहर लोहिया का अंग्रेजी हटाओ आंदोलन भी यहीं चला था। पूर्व विधायक चमन लाल चमन, सुमेर चंद गोयल, प्रेमनाथ गर्ग, राकेश गुप्ता, महेंद्र भल्ला सहित कई बड़े नेताओं का हमेशा प्रभात कैफे में जमावड़ा लगा रहता था। चुनाव के दिनों 24 घंटे प्रभात कैफे में नेताओं का आना होता था। इसके अलावा साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों भी यह अहम अड्डा था। पूर्व विधायक चमन लाल चमन का कहना है कि प्रभात कैफे पर कभी चुनाव और तत्कालीन हालातों को लेकर तमाम संगठनों के जनप्रतिनिधियों व नेताओं के बीच चर्चा होती थी। यहां पर सभी पार्टियों के बड़े-छोटे नेता बैठते थे। एक वक्त ऐसा था, जब तक प्रभातकैफे की चाय नहीं पीते थे, तब तक दिनचर्या अधूरी लगती थी। प्रभात कैफे के संचालक राजीव जुनेजा का कहना है कि कैफे से ही पूरे जनपद की राजनीति संचालित होती थी। पांच से छह साल पूर्व प्रभात कैफे की रौनक कम हो गई। सोशल मीडिया के दौर में अब जनप्रतिनिधि प्रभात कैफे पर नहीं आते हैं। काम ठप हो जाने की वजह से कुछ दिनों से कैफे बंद पड़ा है। देवला निवासी पप्पू भाई का कहना है कि प्रभात कैफे से कई बड़े नेता तैयार हुए हैं। क्योंकि, वरिष्ठ नेताओं के साथ युवा भी चर्चा करते थे और उनमें राजनीति के प्रति अलख जगती थी। इस कैफे को मिनी विधानसभा के नाम से जाना जाता था। मगर, अब कैफे की यह पुरानी यादें इतिहास बनकर रह गई हैं।
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