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परिसीमन से बिगड़ सकता है बसपा और रालोद का समीकरण
Updated Wed, 21 Feb 2018 01:09 AM IST
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परिसीमन से बिगाड़ सकता है बसपा और रालोद का समीकरण
सहारनपुर। उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंन्द्र सिंह रावत के सहारनपुर को उत्तराखंड में शामिल किए जाने की पैरवी ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा के परिसीमन की चर्चाओं को बदल दिया है। कुछ महीने पहले भी सोशल मीडिया के जरिए कई जिलों के समायोजन की बात उठी थी। यदि उस दिशा में पहल होती है तो बसपा के यूपी विभाजन के मसौदे को पूरी तरह झटका लगेगा। पश्चिमी यूपी के जिलों में हाईकोर्ट बेंच की मांग भी कमजोर होगी। इसके अलावा सहारनपुर सहित अन्य जिलों के अलग होने से राजनीतिक हालात पूरी तरह से बदल जाएंगे। इस पूरी कवायद से सबसे ज्यादा झटका बसपा और रालोद को लग सकता है। हालांकि यह भी बात तय है कि सहारनपुर सहित अन्य जिलों केे दूसरे राज्यों में समायोजित करने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है। ऐसे में दोनों राज्यों की सहमति के साथ ही केन्द्र सरकार की इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राजनीतिक दृष्टिकोण से सहारनपुर, बिजनौर का उत्तराखंड और शामली, बागपत का हरियाणा में समायोजन भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है।
दारुल उलूम देवबंद के कारण मुस्लिम मतदाताओं के लिए अहम स्थान रखने वाले सहारनपुर को लेकर सियासत हमेशा गर्माती रही है। सहारनपुर की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि केन्द्र की मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर यहीं से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा कराकर सरकार के कामों के प्रचार-प्रसार की शुरुआत की गई थी। मगर, दलित और मुस्लिम मतदाताओं की बहुलता के चलते यहां के राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं। उधर, बिजनौर में मुस्लिम और जाट सियासत की धुरी रहे हैं। ऐसे में इन दोनों जिलों के उत्तराखंड में शामिल होने से वहां की सियासत पर भले ही असर नहीं पड़े, मगर यूपी की राजनीति में बसपा, रालोद, कांग्रेस और सपा को जरूर झटका लगेगा। कारण, जाट वोट रालोद का बेस वोट है तो बसपा दलितों को लेकर संजीदा है और मुस्लिम मतों को रिझाने के लिए सभी पार्टियां ऐड़ी चोटी का जोर लगाती हैं। इसके अलावा वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बसपा के यूपी को चार भागों में बांटने के मसौदे को भी झटका लगेगा। उस वक्त बसपा ने यह भी प्रस्ताव दिया था कि बसपा की सरकार में पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मुख्यमंत्री होगा। ऐसे में पश्चिम में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावना भी बनी रहती है। चार जिलों के अलग होने से पश्चिमी यूपी के अलग राज्य की संभावना कमजोर होगी। इसके अलावा एक समुदाय की आबादी को यूपी से अलग कर सियासी नफा नुकसान किया जा सकता है। यहां बता दें कि यदि सहारनपुर उत्तराखंड में शामिल होगा तो वहां के माहौल के मुताबिक जिले का परिसीमन भी किया जा सकेगा और इससे राजनीतिक परिदृश्य भी बदल जाएगा।
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हाईकोर्ट बेंच की मांग पर भी असर
लंबे समय से जोर पकड़ रही हाईकोर्ट बेंच की मांग पर परिसीमन का असर पड़ेगा। यदि सहारनपुर सहित कुछ जिले अलग होते हैं तो इन राज्यों की मांग तो लगभग पूरी हो जाएगी। इसके अलावा पश्चिमी यूपी के वजूद पर असर पड़ने से बेंच की मांग पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि प्रशासनिक महकमे के अनुसार जिलों का समायोजन इतना आसान नहीं है। इसके लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सरकारों के साथ ही केन्द्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इसके लिए ना सिर्फ राजनीतिक और व्यापारिक बल्कि पूरी प्रशासनिक पेंचीदगियों से निपटना होगा, जो बेहद जटिल प्रक्रिया से निपटनी पड़ेगी।
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सहारनपुर। उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंन्द्र सिंह रावत के सहारनपुर को उत्तराखंड में शामिल किए जाने की पैरवी ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा के परिसीमन की चर्चाओं को बदल दिया है। कुछ महीने पहले भी सोशल मीडिया के जरिए कई जिलों के समायोजन की बात उठी थी। यदि उस दिशा में पहल होती है तो बसपा के यूपी विभाजन के मसौदे को पूरी तरह झटका लगेगा। पश्चिमी यूपी के जिलों में हाईकोर्ट बेंच की मांग भी कमजोर होगी। इसके अलावा सहारनपुर सहित अन्य जिलों के अलग होने से राजनीतिक हालात पूरी तरह से बदल जाएंगे। इस पूरी कवायद से सबसे ज्यादा झटका बसपा और रालोद को लग सकता है। हालांकि यह भी बात तय है कि सहारनपुर सहित अन्य जिलों केे दूसरे राज्यों में समायोजित करने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है। ऐसे में दोनों राज्यों की सहमति के साथ ही केन्द्र सरकार की इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राजनीतिक दृष्टिकोण से सहारनपुर, बिजनौर का उत्तराखंड और शामली, बागपत का हरियाणा में समायोजन भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है।
दारुल उलूम देवबंद के कारण मुस्लिम मतदाताओं के लिए अहम स्थान रखने वाले सहारनपुर को लेकर सियासत हमेशा गर्माती रही है। सहारनपुर की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि केन्द्र की मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर यहीं से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा कराकर सरकार के कामों के प्रचार-प्रसार की शुरुआत की गई थी। मगर, दलित और मुस्लिम मतदाताओं की बहुलता के चलते यहां के राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं। उधर, बिजनौर में मुस्लिम और जाट सियासत की धुरी रहे हैं। ऐसे में इन दोनों जिलों के उत्तराखंड में शामिल होने से वहां की सियासत पर भले ही असर नहीं पड़े, मगर यूपी की राजनीति में बसपा, रालोद, कांग्रेस और सपा को जरूर झटका लगेगा। कारण, जाट वोट रालोद का बेस वोट है तो बसपा दलितों को लेकर संजीदा है और मुस्लिम मतों को रिझाने के लिए सभी पार्टियां ऐड़ी चोटी का जोर लगाती हैं। इसके अलावा वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बसपा के यूपी को चार भागों में बांटने के मसौदे को भी झटका लगेगा। उस वक्त बसपा ने यह भी प्रस्ताव दिया था कि बसपा की सरकार में पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मुख्यमंत्री होगा। ऐसे में पश्चिम में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावना भी बनी रहती है। चार जिलों के अलग होने से पश्चिमी यूपी के अलग राज्य की संभावना कमजोर होगी। इसके अलावा एक समुदाय की आबादी को यूपी से अलग कर सियासी नफा नुकसान किया जा सकता है। यहां बता दें कि यदि सहारनपुर उत्तराखंड में शामिल होगा तो वहां के माहौल के मुताबिक जिले का परिसीमन भी किया जा सकेगा और इससे राजनीतिक परिदृश्य भी बदल जाएगा।
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हाईकोर्ट बेंच की मांग पर भी असर
लंबे समय से जोर पकड़ रही हाईकोर्ट बेंच की मांग पर परिसीमन का असर पड़ेगा। यदि सहारनपुर सहित कुछ जिले अलग होते हैं तो इन राज्यों की मांग तो लगभग पूरी हो जाएगी। इसके अलावा पश्चिमी यूपी के वजूद पर असर पड़ने से बेंच की मांग पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि प्रशासनिक महकमे के अनुसार जिलों का समायोजन इतना आसान नहीं है। इसके लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सरकारों के साथ ही केन्द्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इसके लिए ना सिर्फ राजनीतिक और व्यापारिक बल्कि पूरी प्रशासनिक पेंचीदगियों से निपटना होगा, जो बेहद जटिल प्रक्रिया से निपटनी पड़ेगी।
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