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हजरत औन व हजरत मुहम्मद की शहादत को किया याद
Updated Sat, 15 Sep 2018 12:30 AM IST
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सहारनपुर। मोहर्रम की तीसरी तारीख को इमाम बारगाहों में हुई मजलिसों में करबला के शहीद हजरत मुस्लिम के बच्चे हजरत औन व हजरत मुहम्मद की शहादत का फलसफा बया किया।
इमाम बारगाह सामानियान मोहल्ला कायस्थान में ईरान से आए मौलाना फतेह मोहम्मद ने खिताब फरमाया। दूसरी मजलिस मोहल्ला अंसारियन स्थित फरहत मेहंदी काजमी के मकान पर हुई। आजमगढ़ से आए डा. आजमी ने विचार रखे। मजलिस बड़ी इमाम बारगाह जाफर नवाज में ईरान से मौलाना किफायत हुसैन साहब ने खिताब किया। चौथी मजलिस छोटी इमाम बारगाह में इकरोटिया जिला संभल से मौलाना महमूद अब्बास बाकरी साहब ने किया। मुस्लिम विद्वानों ने बताया कि यजीद, हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत (समर्थन) लेना चाहता था। वह चाहता था कि यदि रसूल अकरम का नवासा मेरी बैअत (समर्थन) कर देगा तो मैं तमाम मुस्लमानों का खलीफा बनकर मुसलमानों के सारे काम जायज कर दूंगा, जो इस्लाम में नाजायज हैं। उन बातों पर हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मोहर लग जाएगी। तमाम मुसलमानों उस पर अमल करने लगेंगे। इस तरह इस्लाम की शक्ल बदल जाएगी और उसकी हुकूमत भी कायम रहेगी। हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बैअत का समर्थन नहीं किया कि उनको नाना रसूले खुदा सअवस के दीन की हिफाजत करनी थी। इसके लिए हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी कुर्बानी 10 मोहर्रम को पेश कर रसूले खुदा सअवस के दीन को बचा लिया। नहीं तो इस्लाम में शराब, जिनाखोरी, सूदखोरी व सारे नाजायज काम जायज होते। मजलिस के अंत में अंजुमने अकबरिया, अंजुमने इमामिया ने नौहाख्हानी और सीनाजनी की।
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इमाम बारगाह सामानियान मोहल्ला कायस्थान में ईरान से आए मौलाना फतेह मोहम्मद ने खिताब फरमाया। दूसरी मजलिस मोहल्ला अंसारियन स्थित फरहत मेहंदी काजमी के मकान पर हुई। आजमगढ़ से आए डा. आजमी ने विचार रखे। मजलिस बड़ी इमाम बारगाह जाफर नवाज में ईरान से मौलाना किफायत हुसैन साहब ने खिताब किया। चौथी मजलिस छोटी इमाम बारगाह में इकरोटिया जिला संभल से मौलाना महमूद अब्बास बाकरी साहब ने किया। मुस्लिम विद्वानों ने बताया कि यजीद, हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत (समर्थन) लेना चाहता था। वह चाहता था कि यदि रसूल अकरम का नवासा मेरी बैअत (समर्थन) कर देगा तो मैं तमाम मुस्लमानों का खलीफा बनकर मुसलमानों के सारे काम जायज कर दूंगा, जो इस्लाम में नाजायज हैं। उन बातों पर हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मोहर लग जाएगी। तमाम मुसलमानों उस पर अमल करने लगेंगे। इस तरह इस्लाम की शक्ल बदल जाएगी और उसकी हुकूमत भी कायम रहेगी। हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बैअत का समर्थन नहीं किया कि उनको नाना रसूले खुदा सअवस के दीन की हिफाजत करनी थी। इसके लिए हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी कुर्बानी 10 मोहर्रम को पेश कर रसूले खुदा सअवस के दीन को बचा लिया। नहीं तो इस्लाम में शराब, जिनाखोरी, सूदखोरी व सारे नाजायज काम जायज होते। मजलिस के अंत में अंजुमने अकबरिया, अंजुमने इमामिया ने नौहाख्हानी और सीनाजनी की।
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