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जिस पर जकात फर्ज उसको सदका-ए-फितर अदा करना भी जरुरी: गोरा
Updated Mon, 11 Jun 2018 12:26 AM IST
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जिस पर जकात फर्ज, उसको सदका-ए-फितर अदा करना भी जरूरी: गोरा
देवबंद (सहारनपुर)। जमीयत दावातुल मुसलीमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन कारी इसहाक गोरा ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब के जमाने में गेहूं आदि माप कर बेचा करते थे। उस जमाने में मापने का जो बर्तन होता था, उसी के हिसाब से सदका-ए-फितर की मिकदार निकाली जाती थी। कहा कि जिस पर जकात फर्ज है, उसको सदका-ए-फितर अदा करना भी जरूरी है।
रविवार को मोहल्ला बड़जियाउलहक में पत्रकारों से वार्ता के दौरान सदका-ए-फितर के बारे बताया कि सदका-ए-फितर के लिए आटा, गेहूं, जो, खजूर, छुआरे और किशमिश अहमियत रखते हैं। यह चीजें या इनकी रकम देने से सदका-ए-फितर अदा होता है। गेहूं और आटे से पौने दो सेर यानी 1 किलो 633 ग्राम, जो, छुआरा, खजूर और किशमिश से सवा तीन सेर यानी 3 किलो 266 ग्राम या इनकी राशि देना हर साहिब-ए-निसाब पर वाजिब है। कहा कि आटे, गेहूं से 30 रुपये, जो से 82 रुपये, छुआरे और खजूर से 490 रुपये तथा किशमिश से 718 रुपये सदका-ए-फितर अदा करें। कारी ने कहा कि बीवी अपना सदका-ए-फितर खुद निकालेगी, लेकिन पति उसकी तरफ से उसको बताकर निकाल दे तो अदा हो जाएगा। साथ ही बताया कि जिस व्यक्ति पर जकात फर्ज हो, उसको सदका-ए-फितर अदा करना भी वाजिब होता है। लेकिन जकात फर्ज होने के लिए ये शर्त है कि माले निसाब (माल दौलत) पर चांद के हिसाब से एक साल गुजर जाए। मगर सदका-ए-फितर वाजिब होने के लिए ये शर्त जरूरी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के पास माल नहीं है, और चांद रात को अचानक माल और दौलत आ गई तो सुबह होते ही उस पर सदका-ए-फितर वाजिब हो जाएगा। कारी इसहाक गोरा ने कहा कि जिन पर खर्च करना वाजिब हो उनको सदका-ए-फितर देना जायज नहीं है। यानी माता-पिता, दादा-दादी-नाना-नानी, बेटा-बेटी, नवासा-नवासी आदि को सदका-ए-फितर नहीं दिया जा सकता। कहा कि रमजान के आखिरी दिन का सूरज गुरुब होते ही सदका-ए-फितर वाजिब हो जाता है और इसे ईद की नमाज से पहले अदा करना जरूरी होता है। इसी तरह नाबालिग औलाद की तरफ से भी सदका-ए-फितर निकालना चाहिए।
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देवबंद (सहारनपुर)। जमीयत दावातुल मुसलीमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन कारी इसहाक गोरा ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब के जमाने में गेहूं आदि माप कर बेचा करते थे। उस जमाने में मापने का जो बर्तन होता था, उसी के हिसाब से सदका-ए-फितर की मिकदार निकाली जाती थी। कहा कि जिस पर जकात फर्ज है, उसको सदका-ए-फितर अदा करना भी जरूरी है।
रविवार को मोहल्ला बड़जियाउलहक में पत्रकारों से वार्ता के दौरान सदका-ए-फितर के बारे बताया कि सदका-ए-फितर के लिए आटा, गेहूं, जो, खजूर, छुआरे और किशमिश अहमियत रखते हैं। यह चीजें या इनकी रकम देने से सदका-ए-फितर अदा होता है। गेहूं और आटे से पौने दो सेर यानी 1 किलो 633 ग्राम, जो, छुआरा, खजूर और किशमिश से सवा तीन सेर यानी 3 किलो 266 ग्राम या इनकी राशि देना हर साहिब-ए-निसाब पर वाजिब है। कहा कि आटे, गेहूं से 30 रुपये, जो से 82 रुपये, छुआरे और खजूर से 490 रुपये तथा किशमिश से 718 रुपये सदका-ए-फितर अदा करें। कारी ने कहा कि बीवी अपना सदका-ए-फितर खुद निकालेगी, लेकिन पति उसकी तरफ से उसको बताकर निकाल दे तो अदा हो जाएगा। साथ ही बताया कि जिस व्यक्ति पर जकात फर्ज हो, उसको सदका-ए-फितर अदा करना भी वाजिब होता है। लेकिन जकात फर्ज होने के लिए ये शर्त है कि माले निसाब (माल दौलत) पर चांद के हिसाब से एक साल गुजर जाए। मगर सदका-ए-फितर वाजिब होने के लिए ये शर्त जरूरी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के पास माल नहीं है, और चांद रात को अचानक माल और दौलत आ गई तो सुबह होते ही उस पर सदका-ए-फितर वाजिब हो जाएगा। कारी इसहाक गोरा ने कहा कि जिन पर खर्च करना वाजिब हो उनको सदका-ए-फितर देना जायज नहीं है। यानी माता-पिता, दादा-दादी-नाना-नानी, बेटा-बेटी, नवासा-नवासी आदि को सदका-ए-फितर नहीं दिया जा सकता। कहा कि रमजान के आखिरी दिन का सूरज गुरुब होते ही सदका-ए-फितर वाजिब हो जाता है और इसे ईद की नमाज से पहले अदा करना जरूरी होता है। इसी तरह नाबालिग औलाद की तरफ से भी सदका-ए-फितर निकालना चाहिए।
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