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आरक्षण तय नहीं होने से उलझन में उम्मीदवार और पार्टियां
Updated Sat, 16 Sep 2017 01:31 AM IST
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सहारनपुर। निकाय चुनाव नवंबर 2017 में होना तय है। नगर निगम सहारनपुर का परिसीमन सप्ताह भर पहले ही पूरा हुआ है, मगर सीटों का आरक्षण अभी तक नहीं हो सका है। इसकी वजह से राजनीतिक दल और संभावित उम्मीदवार उलझन में हैं, जो अपनी तैयारी नहीं कर पा रहे हैं।
वर्ष 2009 में तत्कालीन बसपा सरकार ने शहर का विस्तार करते हुए 32 गांवों को शहर में जोड़कर नगर निगम बनाया था। मगर राजनीतिक अड़चनों की वजह से आज तक मेयर का चुनाव नहीं हो सका है। अन्य दलों का आरोप रहा है कि बसपा ने राजनीतिक लाभ के लिए दलित बहुल गांवों को नगर नगर निगम में शामिल किया है। पिछली सपा सरकार भी इसी कारण से चुुनाव नहीं करा सकी। यहां तक की परिसीमन तक नहीं कराया गया। दिसंबर 2016 में सपा सरकार ने शेखपुरा कदीम समेत 14 गांवों को शहर में शामिल किया था, जिसका गजट नहीं हो सका था। ऐसे में प्रदेश में आई भाजपा की सरकार ने 14 गांवों को फिर से बाहर कर दिया और परिसीमन कराया। अप्रैल में नगर निगम का परिसीमन किया गया था, जिसपर आई आपत्तियों की ठीक से सुनवाई नहीं हुई। ऐसे में शासन ने परिसीमन को खारिज करते हुए परिसीमन को संशोधित करने के आदेश दिए। पिछले दिनों डीएम की अध्यक्षता में सभी 85 आपत्तियों की सुनवाई की गई, जिसके बाद नगर निगम ने परिसीमन को संशोधित कर शासन को भेजा। इतना ही नहीं, शासन के आदेश पर ओबीसी का रैपिड सर्वे भी दुबारा कराया गया है। मगर सीटों का आरक्षण अभी तक तय नहीं किया गया है। चूंकि चुनाव नवंबर महीने में होना है, जिसकी अधिसूचना अक्तूबर माह में होने की संभावना है। ऐसे में संभावित उम्मीदवारों के साथ ही तमाम राजनीतिक दल भी असमंजस में हैं। सभी को सीटों की स्थिति साफ होने का इंतजार है।
संशय में राजनीतिक दलों के दावेदार
आरक्षण तय नहीं हो पाने के कारण राजनीतिक दलों के दावेदार भी संशय में हैं। सामान्य, महिला, पिछड़ी जाति और आरक्षित सीट होने की स्थिति में दावेदार भी बदल सकते हैं। उधर, चुनाव से पहले संभावित दावेदार अपने को मैदान में बनाए रखने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपना रहे हैं। फिलहाल आरक्षण के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।
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हाल ही में ओबीसी का रैपिड सर्वे कराया गया है, जिस पर आपत्तियां मांगी गई हैं। आपत्तियां आने और उनकी सुनवाई होने के बाद ही आरक्षण तय हो सकेगा।
- गौरव वर्मा, नगरायुक्त।
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वर्ष 2009 में तत्कालीन बसपा सरकार ने शहर का विस्तार करते हुए 32 गांवों को शहर में जोड़कर नगर निगम बनाया था। मगर राजनीतिक अड़चनों की वजह से आज तक मेयर का चुनाव नहीं हो सका है। अन्य दलों का आरोप रहा है कि बसपा ने राजनीतिक लाभ के लिए दलित बहुल गांवों को नगर नगर निगम में शामिल किया है। पिछली सपा सरकार भी इसी कारण से चुुनाव नहीं करा सकी। यहां तक की परिसीमन तक नहीं कराया गया। दिसंबर 2016 में सपा सरकार ने शेखपुरा कदीम समेत 14 गांवों को शहर में शामिल किया था, जिसका गजट नहीं हो सका था। ऐसे में प्रदेश में आई भाजपा की सरकार ने 14 गांवों को फिर से बाहर कर दिया और परिसीमन कराया। अप्रैल में नगर निगम का परिसीमन किया गया था, जिसपर आई आपत्तियों की ठीक से सुनवाई नहीं हुई। ऐसे में शासन ने परिसीमन को खारिज करते हुए परिसीमन को संशोधित करने के आदेश दिए। पिछले दिनों डीएम की अध्यक्षता में सभी 85 आपत्तियों की सुनवाई की गई, जिसके बाद नगर निगम ने परिसीमन को संशोधित कर शासन को भेजा। इतना ही नहीं, शासन के आदेश पर ओबीसी का रैपिड सर्वे भी दुबारा कराया गया है। मगर सीटों का आरक्षण अभी तक तय नहीं किया गया है। चूंकि चुनाव नवंबर महीने में होना है, जिसकी अधिसूचना अक्तूबर माह में होने की संभावना है। ऐसे में संभावित उम्मीदवारों के साथ ही तमाम राजनीतिक दल भी असमंजस में हैं। सभी को सीटों की स्थिति साफ होने का इंतजार है।
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संशय में राजनीतिक दलों के दावेदार
आरक्षण तय नहीं हो पाने के कारण राजनीतिक दलों के दावेदार भी संशय में हैं। सामान्य, महिला, पिछड़ी जाति और आरक्षित सीट होने की स्थिति में दावेदार भी बदल सकते हैं। उधर, चुनाव से पहले संभावित दावेदार अपने को मैदान में बनाए रखने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपना रहे हैं। फिलहाल आरक्षण के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।
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हाल ही में ओबीसी का रैपिड सर्वे कराया गया है, जिस पर आपत्तियां मांगी गई हैं। आपत्तियां आने और उनकी सुनवाई होने के बाद ही आरक्षण तय हो सकेगा।
- गौरव वर्मा, नगरायुक्त।