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त्याग और बलिदान का पर्व है ईद-उल-अजहा : इसहाक गोरा
Updated Mon, 20 Aug 2018 12:24 AM IST
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त्याग और बलिदान का पर्व है ईद-उल-अजहा : इसहाक गोरा
देवबंद (सहारनपुर)। ऑल इंडिया दावातुल मुसलमीन के संरक्षक आलिम-ए-दीन कारी इसहाक गोरा ने ईद-उल-अजहा पर्व को लेकर कहा कि मजहब-ए-इस्लाम में पाकी आधा इमान है। मुसलमानों को जिस्मानी पाकी के साथ साथ अपने मोहल्लों, शहरों और कस्बों को पाक साफ रखना चाहिए। इससे अपने साथ दूसरे समुदाय के लोगों को तकलीफ न पहुंचे। साथ ही शरीयत में किसी को भी तकलीफ पहुंचाने को नाजायज करार दिया गया है।
रविवार को कारी इसहाक गोरा ने कहा कि ईद-उल-अजहा (बकरीद) का त्योहार खुदा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने यानी त्याग और बलिदान का संदेश देता है। इस दिन कुरबानी की जाती है लेकिन इसके पीछे मकसद यह है कि हर इंसान अपने जान माल को अपने खुदा की अमानत समझे और उसकी रक्षा के लिए किसी भी त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहे। उन्होंने कहा कि नबी हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे इस्माइल की कुरबानी देने के लिए तत्पर हो जाने की याद में इस त्योहार को मनाया जाता है। अल्लाह परीक्षा लेना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उनसे बेटे नबी इस्माइल की कुरबानी देने का आदेश दिया। हजरत इब्राहीम को लगा कि कुरबानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। उनके इस खुलूस को अल्लाह ने बेहद पंसद किया और नबी इस्माइल की जगह दुंबा को जिब्हा करने का आदेश दिया। तभी से ही यकीन और खुलूस की इस परीक्षा के सम्मान में दुनियाभर के मुसलमान ईद-उल-अजहा मनाते हैं। कारी इसहाक गोरा ने कहा कि शरीयत के अनुसार कुरबानी के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा गरीबों को दूसरा हिस्सा पड़ोसियों, रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों को दिया जाता है और एक हिस्सा खुद के लिए होता है। उन्होंने सभी लोगों से कुरबानी करने के बाद जानवरों का मांस इधर उधर न फेंकने, जरुरतमंदों की मद्द करने तथा साफ-सफाई का ध्यान रखने का आह्वान किया।
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देवबंद (सहारनपुर)। ऑल इंडिया दावातुल मुसलमीन के संरक्षक आलिम-ए-दीन कारी इसहाक गोरा ने ईद-उल-अजहा पर्व को लेकर कहा कि मजहब-ए-इस्लाम में पाकी आधा इमान है। मुसलमानों को जिस्मानी पाकी के साथ साथ अपने मोहल्लों, शहरों और कस्बों को पाक साफ रखना चाहिए। इससे अपने साथ दूसरे समुदाय के लोगों को तकलीफ न पहुंचे। साथ ही शरीयत में किसी को भी तकलीफ पहुंचाने को नाजायज करार दिया गया है।
रविवार को कारी इसहाक गोरा ने कहा कि ईद-उल-अजहा (बकरीद) का त्योहार खुदा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने यानी त्याग और बलिदान का संदेश देता है। इस दिन कुरबानी की जाती है लेकिन इसके पीछे मकसद यह है कि हर इंसान अपने जान माल को अपने खुदा की अमानत समझे और उसकी रक्षा के लिए किसी भी त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहे। उन्होंने कहा कि नबी हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे इस्माइल की कुरबानी देने के लिए तत्पर हो जाने की याद में इस त्योहार को मनाया जाता है। अल्लाह परीक्षा लेना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उनसे बेटे नबी इस्माइल की कुरबानी देने का आदेश दिया। हजरत इब्राहीम को लगा कि कुरबानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। उनके इस खुलूस को अल्लाह ने बेहद पंसद किया और नबी इस्माइल की जगह दुंबा को जिब्हा करने का आदेश दिया। तभी से ही यकीन और खुलूस की इस परीक्षा के सम्मान में दुनियाभर के मुसलमान ईद-उल-अजहा मनाते हैं। कारी इसहाक गोरा ने कहा कि शरीयत के अनुसार कुरबानी के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा गरीबों को दूसरा हिस्सा पड़ोसियों, रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों को दिया जाता है और एक हिस्सा खुद के लिए होता है। उन्होंने सभी लोगों से कुरबानी करने के बाद जानवरों का मांस इधर उधर न फेंकने, जरुरतमंदों की मद्द करने तथा साफ-सफाई का ध्यान रखने का आह्वान किया।
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