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मासूम अली असगर की याद में मातमी जुलूस निकाला
Updated Sun, 01 Oct 2017 01:11 AM IST
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मासूम अली असगर की याद में मातमी जुलूस निकाला
लखनौती/गंगोह। क्षेत्र में मुहर्रम की नौवीं तारीख को मासूम अली असगर की याद में मजलिसों का आयोजन किया गया और मातमी जुलूस निकाला गया।
क्षेत्र के गांव हुसैनपुुर मे इमाम बारगाह हुसैनी, शकरपुर साकरोर की इमाम बारगाह फात्मातुज्जेहरा, हलवाना के इमाम बारगाह अबू तालिब और फात्मातुज्जेहरा में मजलिसों का आयोजन किया गया। इसमें मौलाना बेदार हुसैन, मौलाना सय्यद मोहसिन तकवी, मौलाना अब्बास, मौलाना जहीर अब्बास, मौलाना अलमदार, मौलाना गुलफाम हैदर आदि ने मजलिसों को खिताब करते हुए बयान किया।
उन्होंने बताया कि करबला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन अपने छह माह के भूखे प्यासे बेटे अली असगर को गोद में लेकर पानी पिलाने के लिए चले लेकिन यजीद के हुकुम से तीरंदाज हुरमला ने एक तीर चलाया जो मासूम अली असगर के गले में लगकर पार हो गया और अली असगर शहीद हो गए। ये बयान सुनकर अजादारे हुसैन रो पड़े। इसके बाद मातमी जुलूस निकाला गया नोहाख्वानी अजीम अब्बास, मुजफ्फर अली, तेहवर हुसैन, खंबर अली, जावेद रजा, अली रजा, उस्मान ने की।
इससे पूर्व लखनौती, नाई मजरा, सैयद छपरा आदि में मजलिसों और जुलूसों का आयोजन किया गया। डा. शहजाद मिर्जा, मिर्जा बरकत अली, मिर्जा शहराज, शादाब मिर्जा, रजा अली, जफर अब्बास, नासिर हुसैन, मुजफ्फर हुसैन, मिर्जा फरजंद अली, शाह हसन, मिर्जा शाजान, कारिब, शुएब, शोजिब, अजहर अब्बास, कल्लू बेग, आफताब हुसैन, रियाजुल हुसैन अरसलान मिर्जा, मिर्जा नकी फिरोज मिर्जा आदि रहे।
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गंगोह के मोहल्ला सैयदान और मखदूम जहां आदि स्थित इमाम बारगाहों में मौलाना ने करबला का वाकया तफसील से ब्यान किया। कहा कि जिसने अल्लाह के कलाम और रसूल अल्लाह के बताए रास्ते पर चलकर जिंदगी गुजारी, समझो उसने इस्लाम को कबूल किया। यदि किसी ने इसपे जरा भी शक किया तो वह ईमान से खारिज हो गया। मोहम्मद साहब के बताए रास्ते पर चलकर हजरत इमाम हुसैन ने अपने परिवार सहित सभी साथियों को कुर्बान कर दिया।
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लखनौती/गंगोह। क्षेत्र में मुहर्रम की नौवीं तारीख को मासूम अली असगर की याद में मजलिसों का आयोजन किया गया और मातमी जुलूस निकाला गया।
क्षेत्र के गांव हुसैनपुुर मे इमाम बारगाह हुसैनी, शकरपुर साकरोर की इमाम बारगाह फात्मातुज्जेहरा, हलवाना के इमाम बारगाह अबू तालिब और फात्मातुज्जेहरा में मजलिसों का आयोजन किया गया। इसमें मौलाना बेदार हुसैन, मौलाना सय्यद मोहसिन तकवी, मौलाना अब्बास, मौलाना जहीर अब्बास, मौलाना अलमदार, मौलाना गुलफाम हैदर आदि ने मजलिसों को खिताब करते हुए बयान किया।
उन्होंने बताया कि करबला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन अपने छह माह के भूखे प्यासे बेटे अली असगर को गोद में लेकर पानी पिलाने के लिए चले लेकिन यजीद के हुकुम से तीरंदाज हुरमला ने एक तीर चलाया जो मासूम अली असगर के गले में लगकर पार हो गया और अली असगर शहीद हो गए। ये बयान सुनकर अजादारे हुसैन रो पड़े। इसके बाद मातमी जुलूस निकाला गया नोहाख्वानी अजीम अब्बास, मुजफ्फर अली, तेहवर हुसैन, खंबर अली, जावेद रजा, अली रजा, उस्मान ने की।
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इससे पूर्व लखनौती, नाई मजरा, सैयद छपरा आदि में मजलिसों और जुलूसों का आयोजन किया गया। डा. शहजाद मिर्जा, मिर्जा बरकत अली, मिर्जा शहराज, शादाब मिर्जा, रजा अली, जफर अब्बास, नासिर हुसैन, मुजफ्फर हुसैन, मिर्जा फरजंद अली, शाह हसन, मिर्जा शाजान, कारिब, शुएब, शोजिब, अजहर अब्बास, कल्लू बेग, आफताब हुसैन, रियाजुल हुसैन अरसलान मिर्जा, मिर्जा नकी फिरोज मिर्जा आदि रहे।
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गंगोह के मोहल्ला सैयदान और मखदूम जहां आदि स्थित इमाम बारगाहों में मौलाना ने करबला का वाकया तफसील से ब्यान किया। कहा कि जिसने अल्लाह के कलाम और रसूल अल्लाह के बताए रास्ते पर चलकर जिंदगी गुजारी, समझो उसने इस्लाम को कबूल किया। यदि किसी ने इसपे जरा भी शक किया तो वह ईमान से खारिज हो गया। मोहम्मद साहब के बताए रास्ते पर चलकर हजरत इमाम हुसैन ने अपने परिवार सहित सभी साथियों को कुर्बान कर दिया।