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रामपुर के दो नवाबों के उस्ताद थे मिर्जा गालिब
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रामपुर। रामपुर अहले नजर की है नजर में वो शहर, कि जहां हश्त बहश्त आके हुए हैं बाहम। रामपुर एक बड़ा बाग है अज रोये मिसाल, दिलकश व ताजा व शादाब व वसी व ख़ुर्रम। जिस तरह बाग़ में सावन की घटाएं बरसे, हैं उसी तौर पे यां दजला फिशां दस्ते करम। ये पंक्तियां किसी और ने नहीं बल्कि दुनिया भर में ख्याति प्राप्त शायर मिर्जा असद उल्ला खां गालिब (मिर्जा गालिब) ने रामपुर के लिए लिखीं हैं। मिर्जा गालिब का रामपुर से गहरा नाता रहा है, वो यहां के दो नवाबों के उस्ताद रहे थे। उन्हें रामपुर रियासत से प्रतिमाह सौ रुपये वेतन भी मिलता था, साथ ही उन्होंने रामपुर में काफी समय भी गुजारा था।
1857 की क्रांति के बाद देश में हालात बदल रहे थे। दिल्ली में बहादुर शाह जफर का राज नहीं रह गया था। ब्रिटिश हुकमरानों ने बहादुर शाह जफर को रंगून की जेल में बंद कर दिया था। इन स्थितियों में मिर्जा गालिब 1860 में रामपुर आ गए थे। रामपुर के नवाब ने उनका तहेदिल से स्वागत किया और उन्होंने रामपुर के शासक नवाब यूसुफ अली खां के शिक्षक के दायित्व निभाए। इसके बदले उन्हें प्रतिमाह सौ रुपये बतौर वजीफा दिया जाता था। इसके बाद नवाब कल्बे अली के भी शिक्षक रहे। रामपुर रियासत की ओर से राजद्वारा में उनको रहने के लिए एक मकान भी दिया गया था। मिर्जा गालिब यहां बहुत दिन नहीं रहे। वह वापस दिल्ली चले गए. लेकिन इसके बाद भी नवाब परिवार से उनका ताल्लुक बना रहा। वह दिल्ली से रामपुर के नवाब को लगातार पत्र भेजते रहे। उनके कई पत्र अब भी रजा लाइब्रेरी में संरक्षित हैं। इतिहास के जानकार बताते हैं कि नवाब ने 1865 में अपने राज्याभिषेक के मौके पर मिर्जा गालिब को रामपुर बुलाया था, लेकिन सेहत खराब होने की वजह से वह नहीं आए थे। उन्होंने इस अवसर के लिए कसीदा लिखकर जरूर भेजा था।
मिर्जा गालिब ने अपनी शायरी में कई जगहों पर रामपुर की कोसी नदी के मीठे पानी और शानदार भोजन और भव्यता की प्रशंसा की है। अपने अंतिम दिनों में भी वह रामपुर के नवाबों के संपर्क में थे। उन्होंने नवाब कल्बे अली खां को खत भेजकर अपने पोते हुसैन अली की निकाह को लिए गए कर्ज की अदायगी करने का अनुरोध किया था। उन्होंने अपने खत में लिखा था ‘‘हाल मेरा तबाह होते-होते अब ये नौबत पहुंची है... आठ सौ रुपये हो तो मेरी आबरू बचती है ... बस मेरा यही काम है याद दिला दूं। आगे हजरत मालिक हैं। रामपुर के इतिहास के जानकारों का कहना है कि इसके कुछ दिनों के बाद मिर्जा गालिब का इंतकाल हो गया। इसके बाद भी रामपुर के नवाब ने आठ सौ रुपये की राशि उनकी पत्नी को दी। उनकी पत्नी को रियासत की ओर से पेंशन भी दी गई, जो उनके इंतकाल के बाद पेंशन हुसैन अली खान (मिर्जा के पोते) को भी मिली।
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1857 की क्रांति के बाद देश में हालात बदल रहे थे। दिल्ली में बहादुर शाह जफर का राज नहीं रह गया था। ब्रिटिश हुकमरानों ने बहादुर शाह जफर को रंगून की जेल में बंद कर दिया था। इन स्थितियों में मिर्जा गालिब 1860 में रामपुर आ गए थे। रामपुर के नवाब ने उनका तहेदिल से स्वागत किया और उन्होंने रामपुर के शासक नवाब यूसुफ अली खां के शिक्षक के दायित्व निभाए। इसके बदले उन्हें प्रतिमाह सौ रुपये बतौर वजीफा दिया जाता था। इसके बाद नवाब कल्बे अली के भी शिक्षक रहे। रामपुर रियासत की ओर से राजद्वारा में उनको रहने के लिए एक मकान भी दिया गया था। मिर्जा गालिब यहां बहुत दिन नहीं रहे। वह वापस दिल्ली चले गए. लेकिन इसके बाद भी नवाब परिवार से उनका ताल्लुक बना रहा। वह दिल्ली से रामपुर के नवाब को लगातार पत्र भेजते रहे। उनके कई पत्र अब भी रजा लाइब्रेरी में संरक्षित हैं। इतिहास के जानकार बताते हैं कि नवाब ने 1865 में अपने राज्याभिषेक के मौके पर मिर्जा गालिब को रामपुर बुलाया था, लेकिन सेहत खराब होने की वजह से वह नहीं आए थे। उन्होंने इस अवसर के लिए कसीदा लिखकर जरूर भेजा था।
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मिर्जा गालिब ने अपनी शायरी में कई जगहों पर रामपुर की कोसी नदी के मीठे पानी और शानदार भोजन और भव्यता की प्रशंसा की है। अपने अंतिम दिनों में भी वह रामपुर के नवाबों के संपर्क में थे। उन्होंने नवाब कल्बे अली खां को खत भेजकर अपने पोते हुसैन अली की निकाह को लिए गए कर्ज की अदायगी करने का अनुरोध किया था। उन्होंने अपने खत में लिखा था ‘‘हाल मेरा तबाह होते-होते अब ये नौबत पहुंची है... आठ सौ रुपये हो तो मेरी आबरू बचती है ... बस मेरा यही काम है याद दिला दूं। आगे हजरत मालिक हैं। रामपुर के इतिहास के जानकारों का कहना है कि इसके कुछ दिनों के बाद मिर्जा गालिब का इंतकाल हो गया। इसके बाद भी रामपुर के नवाब ने आठ सौ रुपये की राशि उनकी पत्नी को दी। उनकी पत्नी को रियासत की ओर से पेंशन भी दी गई, जो उनके इंतकाल के बाद पेंशन हुसैन अली खान (मिर्जा के पोते) को भी मिली।
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