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बच्चों ने खोये पिता, परिवार ने घर चलाने वाले...
ब्यूरो/अमर उजाला रामपुर
Updated Fri, 10 Jun 2016 12:25 AM IST
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काशीराम की पत्नी बच्चों के साथ बिलखती हुई।
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रामगंगा और कोसी नदी के खादर में बसा गौसमपुर और मझरा गांव गुरुवार को मौत के मातम में डूब गया। इन दोनों गांवों में एक साथ तीन मौतों की खबर पहुंची तो हर किसी की आंख हैरत से खुली रह गई..., हलक से पानी नीचे नहीं उतरा..., घरों के अंदर जलते हुए चूल्हों की आग बुझ गई...। हर कोई दौड़ पड़ा उन घरों की ओर जिनके बच्चों ने अपना पिता खोया और परिवार ने घर चलाने वाला...।
मझरा के दो और गौसमपुर गांव के एक व्यक्ति की एक साथ मूंढापांडे में मार्ग दुर्घटना में मौत हो गई थी। यह सभी एक ट्रैक्टर ट्राली में तरबूज लेकर मुरादाबाद में बेचने जा रहे थे। इनमें एक मजदूर था जो किसानों की मदद कर परिवार के लिए चार पैसे कमाने की आस में साथ गया था तो दो अपने खेतों में तैयार माल को बेचने जा रहे थे।
तड़के पहर यह हादसा हुआ था। गांव तक खबर पहुंचते कुछ समय हो चुका था। तब तक घरों में महिलाएं खाना बनाने में जुट गई थी। बच्चे दरवाजों पर खेल रहे थे। ग्रामीण घर के बाहर का काम निपटाने के बाद नाश्ता कर खेतों की ओर जाने की तैयारी में थे। किसी को बाजार-हाट जाना था तो किसी को कहीं और..., पर यह क्या? न चाहने वाली एक खबर ने सब कुछ अपनी जगह पर रोक दिया।
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कुछ दौड़ पड़े मूंढापांडे के लिए और जो गांव में बचे वह मृतकों के दरवाजे पहुंचकर घर पर बचे हुए परिजनों को ढांढस बंधाने में जुटे रहे। देर शाम गांव में पोस्टमार्टम के बाद शव पहुंचे तो महिलाओं और बच्चों की चीख-पुकार एवं आंसू देख पत्थर दिल भी पिघल गए।
मझरा के दो और गौसमपुर गांव के एक व्यक्ति की एक साथ मूंढापांडे में मार्ग दुर्घटना में मौत हो गई थी। यह सभी एक ट्रैक्टर ट्राली में तरबूज लेकर मुरादाबाद में बेचने जा रहे थे। इनमें एक मजदूर था जो किसानों की मदद कर परिवार के लिए चार पैसे कमाने की आस में साथ गया था तो दो अपने खेतों में तैयार माल को बेचने जा रहे थे।
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तड़के पहर यह हादसा हुआ था। गांव तक खबर पहुंचते कुछ समय हो चुका था। तब तक घरों में महिलाएं खाना बनाने में जुट गई थी। बच्चे दरवाजों पर खेल रहे थे। ग्रामीण घर के बाहर का काम निपटाने के बाद नाश्ता कर खेतों की ओर जाने की तैयारी में थे। किसी को बाजार-हाट जाना था तो किसी को कहीं और..., पर यह क्या? न चाहने वाली एक खबर ने सब कुछ अपनी जगह पर रोक दिया।
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कुछ दौड़ पड़े मूंढापांडे के लिए और जो गांव में बचे वह मृतकों के दरवाजे पहुंचकर घर पर बचे हुए परिजनों को ढांढस बंधाने में जुटे रहे। देर शाम गांव में पोस्टमार्टम के बाद शव पहुंचे तो महिलाओं और बच्चों की चीख-पुकार एवं आंसू देख पत्थर दिल भी पिघल गए।