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शहीदों के अस्थि कलश के लिए नसीब नहीं हो सकी एक गज जमीन
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घर में रखा सेंहगों गोलीकांड में शहीदों का अस्थि कलश।
- फोटो : RAIBARAILY
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बछरावां (रायबरेली)। गुलामी की जंजीरों से जकड़े देश को आजाद कराने में बछरावां के सेंहगों गोलीकांड का नाम भी इतिहास के पन्नों में अंकित है।
बावजूद इसके देश की आजादी के 75 साल बाद भी सेंहगो गोलीकांड के शहीदों का स्मारक स्थल बनाने के लिए एक गज जमीन नसीब नहीं हो सकी है।
यह हाल तब है, जब शहीदों का अस्थि कलश परिजन एवं पूर्व प्रधान विनोद चौधरी के घर में रखा है, जो उनकी शहादत की याद दिला रहा है।
यह बात न सिर्फ शहीदों के घरवालों ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लोगों को अखरती है, लेकिन स्मारक स्थल बनाने की सुध तो सरकार को आ सकी है और न ही जिला प्रशासन के अफसरों को।
बात 21 जनवरी 1921 की है। उस समय चौधरी गौरीशंकर सेंहगो के ताल्लुकेदार थे। सेंहगो बाजार में वसूली के लिए अंग्रेज सैनिक बंदूक, बल्लम लेकर घोड़ों से पहुंचे।
गांव के सालिगराम चौधरी और राम अवतार चौधरी ने विरोध करते हुए सभी लोगों से कहा कि कोई भी वसूली नहीं देगा। इस पर ब्रिटिश सैनिक आग बबूला होकर भड़क उठे और हमला कर दिया।
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आजादी के नशे में चूर व ब्रिटिश सिपाहियों के अत्याचारों से खफा आजादी के दीवाने सालिगराम चौधरी व राम अवतार चौधरी ने दो सिपाहियों को उन्हीं की बंदूकों से मौत के घाट उतार दिया।
एक घायल सिपाही की वापस जाते समय रास्ते में मौत हो गई थी। ब्रिटिश सिपाहियों ने बछरावां थाने पहुंचकर घटना की सूचना दी, जिसके बाद जिलाधीश शेरिफ और पुलिस कप्तान मेयर शाम को सेंहगो पहुंचे और समूचा सेंहगो क्षेत्र छावनी में तब्दील हो गया।
घटना के दूसरे दिन पुलिस कप्तान ने इंस्पेक्टर जनरल पुलिस यूपी और जिलाधीश ने मुख्य सचिव को घटना के बारे में गुमराह करते हुए बताया कि गांव के दो बदमाश रामअवतार तथा सालिगराम ताल्लुकेदार तथा सरकार के विरुद्ध उत्तेजक भाषण दे रहे थे।
कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए वहां पहुंचे सशस्त्र सिपाहियों पर इन बदमाशों ने आक्रमण कर दिया, जिस पर ब्रिटिश सिपाहियों ने दोनों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया
23 जनवरी 1921 को दोनों क्रांतिकारियों को सेंहगो बाजार में सरेआम फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। गांव के बुजुर्गों के मुताबिक जब फांसी के फंदे पर लटका देने के बाद भी ये आजादी के दीवाने जीवित बच गए।
तब सिपाहियों ने आजादी के दीवानों की हाथों की नसें काट दी। दोनों आजादी के दीवाने हंसते-हंसते शहीद हो गए। इन शहीदों की वीर गाथा का बखान होते ही आज भी क्षेत्रवासियों का रोम-रोम रोमांचित हो उठता है।
आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला
पूर्व प्रधान विनोद चौधरी कहते हैं कि चर्चित सेंहगों गोलीकांड में उनके परिवार के दो लोग शहीद हुए थे। उनका अस्थि कलश आज भी सुरक्षित करके रखा हुुआ है। कई बार जिला प्रशासन के साथ ही शासन से इस बात की मांग की कि स्मारक स्थल बनवा दिया जाए। आश्वासन तो खूब मिले, लेकिन आज तक उनकी यह मांग पूरी नहीं हो सकी।
शहीदों की याद में स्मारक स्थल बनवाने के लिए एक बार इस संबंध में रिपोर्ट मांगी गई थी। उसकी रिपोर्ट भी भेजी जा चुकी है। यह शासन स्तर का मामला है। शासन ही तय करेगा कि स्मारक स्थल बनेगा या नहीं।
सालिकराम, एसडीएम, महराजगंज
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बावजूद इसके देश की आजादी के 75 साल बाद भी सेंहगो गोलीकांड के शहीदों का स्मारक स्थल बनाने के लिए एक गज जमीन नसीब नहीं हो सकी है।
यह हाल तब है, जब शहीदों का अस्थि कलश परिजन एवं पूर्व प्रधान विनोद चौधरी के घर में रखा है, जो उनकी शहादत की याद दिला रहा है।
यह बात न सिर्फ शहीदों के घरवालों ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लोगों को अखरती है, लेकिन स्मारक स्थल बनाने की सुध तो सरकार को आ सकी है और न ही जिला प्रशासन के अफसरों को।
बात 21 जनवरी 1921 की है। उस समय चौधरी गौरीशंकर सेंहगो के ताल्लुकेदार थे। सेंहगो बाजार में वसूली के लिए अंग्रेज सैनिक बंदूक, बल्लम लेकर घोड़ों से पहुंचे।
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गांव के सालिगराम चौधरी और राम अवतार चौधरी ने विरोध करते हुए सभी लोगों से कहा कि कोई भी वसूली नहीं देगा। इस पर ब्रिटिश सैनिक आग बबूला होकर भड़क उठे और हमला कर दिया।
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आजादी के नशे में चूर व ब्रिटिश सिपाहियों के अत्याचारों से खफा आजादी के दीवाने सालिगराम चौधरी व राम अवतार चौधरी ने दो सिपाहियों को उन्हीं की बंदूकों से मौत के घाट उतार दिया।
एक घायल सिपाही की वापस जाते समय रास्ते में मौत हो गई थी। ब्रिटिश सिपाहियों ने बछरावां थाने पहुंचकर घटना की सूचना दी, जिसके बाद जिलाधीश शेरिफ और पुलिस कप्तान मेयर शाम को सेंहगो पहुंचे और समूचा सेंहगो क्षेत्र छावनी में तब्दील हो गया।
घटना के दूसरे दिन पुलिस कप्तान ने इंस्पेक्टर जनरल पुलिस यूपी और जिलाधीश ने मुख्य सचिव को घटना के बारे में गुमराह करते हुए बताया कि गांव के दो बदमाश रामअवतार तथा सालिगराम ताल्लुकेदार तथा सरकार के विरुद्ध उत्तेजक भाषण दे रहे थे।
कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए वहां पहुंचे सशस्त्र सिपाहियों पर इन बदमाशों ने आक्रमण कर दिया, जिस पर ब्रिटिश सिपाहियों ने दोनों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया
23 जनवरी 1921 को दोनों क्रांतिकारियों को सेंहगो बाजार में सरेआम फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। गांव के बुजुर्गों के मुताबिक जब फांसी के फंदे पर लटका देने के बाद भी ये आजादी के दीवाने जीवित बच गए।
तब सिपाहियों ने आजादी के दीवानों की हाथों की नसें काट दी। दोनों आजादी के दीवाने हंसते-हंसते शहीद हो गए। इन शहीदों की वीर गाथा का बखान होते ही आज भी क्षेत्रवासियों का रोम-रोम रोमांचित हो उठता है।
आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला
पूर्व प्रधान विनोद चौधरी कहते हैं कि चर्चित सेंहगों गोलीकांड में उनके परिवार के दो लोग शहीद हुए थे। उनका अस्थि कलश आज भी सुरक्षित करके रखा हुुआ है। कई बार जिला प्रशासन के साथ ही शासन से इस बात की मांग की कि स्मारक स्थल बनवा दिया जाए। आश्वासन तो खूब मिले, लेकिन आज तक उनकी यह मांग पूरी नहीं हो सकी।
शहीदों की याद में स्मारक स्थल बनवाने के लिए एक बार इस संबंध में रिपोर्ट मांगी गई थी। उसकी रिपोर्ट भी भेजी जा चुकी है। यह शासन स्तर का मामला है। शासन ही तय करेगा कि स्मारक स्थल बनेगा या नहीं।
सालिकराम, एसडीएम, महराजगंज