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फल महंगे, बजट कम तो बच्चे कैसे बने सेहतमंद
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रायबरेली। मध्याह्न भोजन योजना के तहत छात्र-छात्राओं को प्रत्येक सोमवार को ताजा व मौसमी फल दिया जाता है। इसके लिए छह साल पहले चार रुपये प्रति छात्र की दर निर्धारित की गई थी। लेकिन अब उस धनराशि से फल वितरण कर पाना नामुमकिन है।
इन छह सालों में फलों के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। कोई ऐसा फल नहीं है, जिससे चार रुपये में बच्चों को ताजा और मौसमी फल दिया जा सके।
ऐसे में कहीं-कहीं शिक्षक अपनी जेब से धन लगा देते हैं तो कई स्कूलों में बच्चों को किसी न किसी हफ्ते फल से वंचित कर दिया जाता है।
इसीलिए विद्यालयों में फल न बांटे जाने की शिकायतें अक्सर अभिभावकों की तरफ से आती रहती हैं। कहते हैं कि फल नहीं तो कहां से बच्चे होंगे सेहतमंद।
बजट छह साल पुराना है और महंगाई हर रोज बढ़ती ही जा रही है, जिससे बच्चों को मध्याह्न भोजन के साथ अतिरिक्त पोषण तत्व यानी ताजा और मौसमी फल दिए जाने पर संकट मंडरा रहा है। इससे अभिभावक और शिक्षक दोनों चिंतित हैं।
फलों के दाम : तीन साल पहले और अब
फल का नाम पहले अब
केला 25-30 रुपये प्रति दर्जन 50-60 रुपये प्रति दर्जन
सेब 80 रुपये प्रति किग्रा. 140 रुपये प्रति किग्रा.
संतरा 30-40 रुपये प्रति किग्रा. 50-60 रुपये प्रति किग्रा.
अमरूद 15-20 रुपये प्रति किग्रा. 30-40 रुपये प्रति किग्रा.
हर हफ्ते लग जाती है ज्यादा धनराशि
खीरों। कहीं कोई शिकायत न हो जाए, इसलिए सभी बच्चों को फल बांटा जाता है। भले ही इसके लिए बजट से ज्यादा धनराशि अपनी जेब से क्यों न खर्च करनी पड़े।
बच्चों को हर हफ्ते सोमवार को फल दिया जाता है। इसके लिए अध्यापक अपनी जेब से भी पैसे लगाते हैं। प्राथमिक विद्यालय अतरहर के इंचार्ज प्रधानाचार्य राघवेंद्र सिंह, मानपुर के कौशिक वर्मा, कंपोजिट विद्यालय लल्लाखेड़ा के प्रधानाध्यापक राधारमण और प्राथमिक विद्यालय चंदिका बक्श खेड़ा के इंचार्ज प्रधानाध्यापक इमरान बताते हैं कि फलों के दाम आसमान छू रहे हैं।
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इसके लिए धनराशि महज चार रुपये प्रति छात्र के हिसाब से मिलती है। इतने कम पैसे में फल दे पाना मुमकिन नहीं होता है। इसलिए अपने पास से पैसे खर्च करते हैं। यदि 100 बच्चों को फल बांटना है तो 400 रुपये मिलते हैं, जबकि खर्च 500 से 600 रुपये आता है। अभिभावक रामा निर्मल, सविता और शीला कहती हैं कि फल के लिए निर्धारित धनराशि में इजाफा किया जाना चाहिए।
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इन छह सालों में फलों के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। कोई ऐसा फल नहीं है, जिससे चार रुपये में बच्चों को ताजा और मौसमी फल दिया जा सके।
ऐसे में कहीं-कहीं शिक्षक अपनी जेब से धन लगा देते हैं तो कई स्कूलों में बच्चों को किसी न किसी हफ्ते फल से वंचित कर दिया जाता है।
इसीलिए विद्यालयों में फल न बांटे जाने की शिकायतें अक्सर अभिभावकों की तरफ से आती रहती हैं। कहते हैं कि फल नहीं तो कहां से बच्चे होंगे सेहतमंद।
बजट छह साल पुराना है और महंगाई हर रोज बढ़ती ही जा रही है, जिससे बच्चों को मध्याह्न भोजन के साथ अतिरिक्त पोषण तत्व यानी ताजा और मौसमी फल दिए जाने पर संकट मंडरा रहा है। इससे अभिभावक और शिक्षक दोनों चिंतित हैं।
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फलों के दाम : तीन साल पहले और अब
फल का नाम पहले अब
केला 25-30 रुपये प्रति दर्जन 50-60 रुपये प्रति दर्जन
सेब 80 रुपये प्रति किग्रा. 140 रुपये प्रति किग्रा.
संतरा 30-40 रुपये प्रति किग्रा. 50-60 रुपये प्रति किग्रा.
अमरूद 15-20 रुपये प्रति किग्रा. 30-40 रुपये प्रति किग्रा.
हर हफ्ते लग जाती है ज्यादा धनराशि
खीरों। कहीं कोई शिकायत न हो जाए, इसलिए सभी बच्चों को फल बांटा जाता है। भले ही इसके लिए बजट से ज्यादा धनराशि अपनी जेब से क्यों न खर्च करनी पड़े।
बच्चों को हर हफ्ते सोमवार को फल दिया जाता है। इसके लिए अध्यापक अपनी जेब से भी पैसे लगाते हैं। प्राथमिक विद्यालय अतरहर के इंचार्ज प्रधानाचार्य राघवेंद्र सिंह, मानपुर के कौशिक वर्मा, कंपोजिट विद्यालय लल्लाखेड़ा के प्रधानाध्यापक राधारमण और प्राथमिक विद्यालय चंदिका बक्श खेड़ा के इंचार्ज प्रधानाध्यापक इमरान बताते हैं कि फलों के दाम आसमान छू रहे हैं।
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इसके लिए धनराशि महज चार रुपये प्रति छात्र के हिसाब से मिलती है। इतने कम पैसे में फल दे पाना मुमकिन नहीं होता है। इसलिए अपने पास से पैसे खर्च करते हैं। यदि 100 बच्चों को फल बांटना है तो 400 रुपये मिलते हैं, जबकि खर्च 500 से 600 रुपये आता है। अभिभावक रामा निर्मल, सविता और शीला कहती हैं कि फल के लिए निर्धारित धनराशि में इजाफा किया जाना चाहिए।