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गाढ़े वक्त में काम अा रहे बच्चाों के गुल्लक
रायबरेली/ अमर उजाला ब्यूराे
Updated Sat, 12 Nov 2016 11:39 PM IST
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बच्चों के गुल्लक तोड़े
- फोटो : अमर उजाला
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पुराने 500 व 1000 रुपये के नोट प्रचलन से बाहर होने व बैंकों से नए नोट उपलब्ध न होने के कारण आम आदमी को समस्या से जूझना पड़ रहा है। लोगों के लिए दवा, किराना, सब्जी, दूध खरीदना मुश्किल है। ऐसे में घर के लाडले बेटे-बेटी अपने बैंक गुल्लक को तोड़ मम्मी-पापा की संकट के वक्त में मदद कर रहे हैं, लेकिन पैसा आने पर मम्मी-पापा से कुछ ज्यादा वापसी चाहते हैं।
शिवगढ़ कस्बा निवासी विनय कुमार पांडेय नए नोट न मिलने से काफी परेशान हैं। तीन दिनों के अंदर की सारे छोटे नोट खर्च हो जाने के बाद उन्हें अर्थिक तंगी लगने लगी है। अंतत: उन्हें छोटे बेटे कार्तिक की गुल्लक का ख्याल आ गया। उन्होंने अपने बेटे के नाम गुल्लक में बचत डाली थी। काफी संकोच के साथ अपने लाडले बेटे कार्तिक से गुल्लक मांगी। कार्तिक गुल्लक तो ले आया लेकिन तोड़ने के नाम पर मचल उठा।
पहले तो गुल्लक तोड़ने से मना कर दिया लेकिन बाद में मां हिमांशी पांडेय के समझाने पर मान गया। कार्तिक गुल्लक तोड़ने पर तभी माना जब दोनों ने इससे भी बड़ा गुल्लक लाने व उसमें पैसे डालने का भरोसा दिया। खीरों कस्बा निवासी स्नातक छात्रा दीप्ति की भावनाएं आम बच्चों से हटकर हैं। दो पहिया व चार पहिया वाहनों के पंचर बनाकर परिवार चलाने वाले अपने पिता अवध नरेश की परेशानियां उससे देखी नहीं गयी।
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जब तक घर में 100- 50 रुपये के नोट रहे तब तक तो पिता घर का जरूरी सामान लाते रहे, लेकिन जब जेब खाली हो गई तब वह आनाकानी करने लगे। वह नोट बंदी के चलते हो रही परेशानी घर में नहीं बताना चाहते थे, लेकिन बेटी दीप्ति समझ गई। वह बेझिझक अपने पिता से कह बैठी कि आप जो छुपा रहे हैं वह मै समझ गई हूं। इतना कहने के साथ ही अंदर रखी गुल्लक को आंगन में लाकर तोड़ दिया।
उसमें 3977 रुपये निकले। बेटी की इस समझदारी पर पिता को नाज है। अब बेटी की बचत से घर का काम चल रहा है। उसके चाचा शिव प्रकाश भतीजी के इस काम से काफी खुश हैं।परशदेपुर के रहने वाले पिता महेंद्र प्रताप भी नोट बंदी की परेशानी से जूझ रहे हैं। काफी कुछ सोचने के बाद भी उनके अंदर बच्चे के नाम बनाए गए गुल्लक को तोड़ने का साहस नहीं हो रहा था। उन्होंने अपनी आर्थिक तंगी की बात अपनी पत्नी सविता से कही।
इसके साथ ही बेटे शौर्य की गुल्लक तोड़ने की हिम्मत न होने की बात भी कह दी। इस पर पत्नी ने उनकी परेशानी समझी और कोई दूसरा उपाय न सूझने पर बच्चे की गुल्लक तोड़ने का फैसला किया। सविता के मुताबिक उन्हें बेटे शौर्य को गुल्लक तोड़ने को राजी करने पर एक घंटे से ज्यादा का समय लगा। चूं-चूं करने वाले नए जूते, खिलौने और एक नई गुल्लक देने के वादे पर ही गुल्लक तोड़ने पर राजी हुआ। उसके गुल्लक में 1515 रुपये निकले, इससे कुछ दिन काम चल जाएगा तब तक नए नोट का इंतजाम हो जाएगा।
महराजगंज कस्बा निवासी शिक्षक राजीव सिंह भी नोट बंदी से काफी परेशान हैं। छोटे नोटों के रुप में घर में मौजूद जब सारी जमा पूंजी खर्च हो गई तो उनके सामने घरेलू जरूरी खर्चे चलाने में दिक्कत हो रही है। उन्होंने बताया कि जब उनके सामने कोई दूसरा उपाय नहीं रहा तो उन्होंने अपनी छोटी बेटी स्नेहा का गुल्लक तोड़ने की सोची। पेशे से शिक्षक राजीव के मुताबिक ये पैसे उन्होंने रोज की बचत से बेटी के नाम जमा करना शुरू किया था।
वह बेटी के हाथ से ही गुल्लक में पैसे डलवाते थे। अंतत: बेटी को बड़े-बड़े नोट व खिलौने का लालच देकर गुल्लक तोड़ने पर राजी किया। उन्होंने बताया कि रोज अपने हाथ से पैसा डालने के कारण स्नेहा को गुल्लक से काफी लगाव हो गया था। उसका रुआंसा चेहरा देख बड़े भाई ने हंसाने की कोशिश की और समेट कर पिता को दिए। डलमऊ कस्बा निवासी मनोज कुमार के परिवार में खर्च के लिये नयी नोटों की व्यवस्था न होने के कारण सभी परेशान चल रहे हैं।
रुपयों की कमी के समय अपनी पाँच वर्षीय पुत्री वैष्णवी की गुल्लक का सहारा लेना पड़ा। गुल्लक तोड़ने से निकले रुपये से रोजमर्रा की खरीदारी की। मनोज की मां शांति देवी ने बताया कि बैंक से रुपये न मिलने पर नातिन का गुल्लक तोड़ कर कुछ जरूरी सामान का जुगाड़ किया गया। वहीं वैष्णवी की मां ममता ने बताया कि दो दिनों से पैसे निकलवाने लिए बैंक के चक्कर लगाना पड़ रहा है, फि र भी बैंक से पैसा नहीं मिल सका, जिससे पुत्री को चाकलेट का लालच देकर उसके गुल्लक को तोड़ा गया और जमा किए गये रुपये निकाले हैं।
जिला स्काउट संस्था के सचिव एलके शुक्ल ने बताया कि संचयिका योजना में बेसिक स्कूलों के बैंक या डाक घर में खाते खोलवाए जाते हैं। लेकिन इधर कई सालों से संचयिका योजना अमल में नहीं हैं। एक दशक पहले जब वे आदर्श प्राथमिक विद्यालय चकअहमदपुर के प्रधानाध्यापक थे, तब कई बच्चों के खाते खेलवाए थे। स्काउटिंग में बच्चों को बचत करने की शिक्षा दी जाती है। कुछ बच्चे अपने स्तर से बचत करते हैं।
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शिवगढ़ कस्बा निवासी विनय कुमार पांडेय नए नोट न मिलने से काफी परेशान हैं। तीन दिनों के अंदर की सारे छोटे नोट खर्च हो जाने के बाद उन्हें अर्थिक तंगी लगने लगी है। अंतत: उन्हें छोटे बेटे कार्तिक की गुल्लक का ख्याल आ गया। उन्होंने अपने बेटे के नाम गुल्लक में बचत डाली थी। काफी संकोच के साथ अपने लाडले बेटे कार्तिक से गुल्लक मांगी। कार्तिक गुल्लक तो ले आया लेकिन तोड़ने के नाम पर मचल उठा।
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पहले तो गुल्लक तोड़ने से मना कर दिया लेकिन बाद में मां हिमांशी पांडेय के समझाने पर मान गया। कार्तिक गुल्लक तोड़ने पर तभी माना जब दोनों ने इससे भी बड़ा गुल्लक लाने व उसमें पैसे डालने का भरोसा दिया। खीरों कस्बा निवासी स्नातक छात्रा दीप्ति की भावनाएं आम बच्चों से हटकर हैं। दो पहिया व चार पहिया वाहनों के पंचर बनाकर परिवार चलाने वाले अपने पिता अवध नरेश की परेशानियां उससे देखी नहीं गयी।
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जब तक घर में 100- 50 रुपये के नोट रहे तब तक तो पिता घर का जरूरी सामान लाते रहे, लेकिन जब जेब खाली हो गई तब वह आनाकानी करने लगे। वह नोट बंदी के चलते हो रही परेशानी घर में नहीं बताना चाहते थे, लेकिन बेटी दीप्ति समझ गई। वह बेझिझक अपने पिता से कह बैठी कि आप जो छुपा रहे हैं वह मै समझ गई हूं। इतना कहने के साथ ही अंदर रखी गुल्लक को आंगन में लाकर तोड़ दिया।
उसमें 3977 रुपये निकले। बेटी की इस समझदारी पर पिता को नाज है। अब बेटी की बचत से घर का काम चल रहा है। उसके चाचा शिव प्रकाश भतीजी के इस काम से काफी खुश हैं।परशदेपुर के रहने वाले पिता महेंद्र प्रताप भी नोट बंदी की परेशानी से जूझ रहे हैं। काफी कुछ सोचने के बाद भी उनके अंदर बच्चे के नाम बनाए गए गुल्लक को तोड़ने का साहस नहीं हो रहा था। उन्होंने अपनी आर्थिक तंगी की बात अपनी पत्नी सविता से कही।
इसके साथ ही बेटे शौर्य की गुल्लक तोड़ने की हिम्मत न होने की बात भी कह दी। इस पर पत्नी ने उनकी परेशानी समझी और कोई दूसरा उपाय न सूझने पर बच्चे की गुल्लक तोड़ने का फैसला किया। सविता के मुताबिक उन्हें बेटे शौर्य को गुल्लक तोड़ने को राजी करने पर एक घंटे से ज्यादा का समय लगा। चूं-चूं करने वाले नए जूते, खिलौने और एक नई गुल्लक देने के वादे पर ही गुल्लक तोड़ने पर राजी हुआ। उसके गुल्लक में 1515 रुपये निकले, इससे कुछ दिन काम चल जाएगा तब तक नए नोट का इंतजाम हो जाएगा।
महराजगंज कस्बा निवासी शिक्षक राजीव सिंह भी नोट बंदी से काफी परेशान हैं। छोटे नोटों के रुप में घर में मौजूद जब सारी जमा पूंजी खर्च हो गई तो उनके सामने घरेलू जरूरी खर्चे चलाने में दिक्कत हो रही है। उन्होंने बताया कि जब उनके सामने कोई दूसरा उपाय नहीं रहा तो उन्होंने अपनी छोटी बेटी स्नेहा का गुल्लक तोड़ने की सोची। पेशे से शिक्षक राजीव के मुताबिक ये पैसे उन्होंने रोज की बचत से बेटी के नाम जमा करना शुरू किया था।
वह बेटी के हाथ से ही गुल्लक में पैसे डलवाते थे। अंतत: बेटी को बड़े-बड़े नोट व खिलौने का लालच देकर गुल्लक तोड़ने पर राजी किया। उन्होंने बताया कि रोज अपने हाथ से पैसा डालने के कारण स्नेहा को गुल्लक से काफी लगाव हो गया था। उसका रुआंसा चेहरा देख बड़े भाई ने हंसाने की कोशिश की और समेट कर पिता को दिए। डलमऊ कस्बा निवासी मनोज कुमार के परिवार में खर्च के लिये नयी नोटों की व्यवस्था न होने के कारण सभी परेशान चल रहे हैं।
रुपयों की कमी के समय अपनी पाँच वर्षीय पुत्री वैष्णवी की गुल्लक का सहारा लेना पड़ा। गुल्लक तोड़ने से निकले रुपये से रोजमर्रा की खरीदारी की। मनोज की मां शांति देवी ने बताया कि बैंक से रुपये न मिलने पर नातिन का गुल्लक तोड़ कर कुछ जरूरी सामान का जुगाड़ किया गया। वहीं वैष्णवी की मां ममता ने बताया कि दो दिनों से पैसे निकलवाने लिए बैंक के चक्कर लगाना पड़ रहा है, फि र भी बैंक से पैसा नहीं मिल सका, जिससे पुत्री को चाकलेट का लालच देकर उसके गुल्लक को तोड़ा गया और जमा किए गये रुपये निकाले हैं।
जिला स्काउट संस्था के सचिव एलके शुक्ल ने बताया कि संचयिका योजना में बेसिक स्कूलों के बैंक या डाक घर में खाते खोलवाए जाते हैं। लेकिन इधर कई सालों से संचयिका योजना अमल में नहीं हैं। एक दशक पहले जब वे आदर्श प्राथमिक विद्यालय चकअहमदपुर के प्रधानाध्यापक थे, तब कई बच्चों के खाते खेलवाए थे। स्काउटिंग में बच्चों को बचत करने की शिक्षा दी जाती है। कुछ बच्चे अपने स्तर से बचत करते हैं।