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आरडीए की लापरवाही से फंसे
Updated Sun, 14 Jan 2018 12:49 AM IST
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आदेश के बावजूद नहीं ढहाए जा सके 73 निर्माण
रायबरेली। आरडीए अवैध निर्माण, कंपाउंडिंग, सीलिंग और ध्वस्तीकरण से संबंधित 2416 मुकदमों का निपटारा कर पाने में नाकाम साबित हो रहा है।
यहां तक कि आदेश के बाद भी 73 अवैध भवनों को अब तक ध्वस्त नहीं किया जा सका है। शासन से इस संबंध में जवाब भी मांगा गया, लेकिन आरडीए के अफसरों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। मुकदमों का निपटारा न हो पाने के कारण आरडीए के राजस्व में इजाफा भी नहीं हो पा रहा है।
जिले में अवैध रूप से भवनों का निर्माण हो रहा है। तमाम भवन और कांप्लेक्स का काम पूरा भी हो चुका है और आवासीय भवनों का व्यवसायिक उपयोग भी धड़ल्ले से जारी है।
वहीं कार्रवाई के नाम पर अवैध भवनों का चालान कर बिल्डरों के खिलाफ मुकदमा शुरू किया जाता है। चालान के साथ ही कंपाउंडिंग जमा कराने का भी प्रयास किया जाता है।
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यहां तक कि भवनों को सील कर अन्य कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाती है। भवनों को सील करने के बाद भी उसमें काम शुरू हो जाता है।
हालत यह है कि तीन दर्जन से अधिक सील भवनों में विभिन्न शोरूम तक खुल गए हैं। अवैध भवनों का उपयोग तो शुरू हो गया है, लेकिन आरडीए में शुरू किए गए मुकदमों का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
एक साल पहले 73 भवनों को गिराने के आदेश दिए गए थे। आदेश के बाद अब तक एक भी निर्माण को ध्वस्त नहीं किया गया है। ये मुकदमे भी लंबित हैं।
कंपाउंडिंग से संबंधित भी चार सौ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। बिल्डर कुछ धनराशि जमा करने के बाद मुकदमों की फाइलों को लंबित करवा देते हैं।
आरडीए के अधिकारी मुकदमों को खत्म करने के लिए कठोर कदम नहीं उठा रहे हैं। मुकदमों की सही ढंग से सुनवाई न होने से इनकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।
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रायबरेली। आरडीए अवैध निर्माण, कंपाउंडिंग, सीलिंग और ध्वस्तीकरण से संबंधित 2416 मुकदमों का निपटारा कर पाने में नाकाम साबित हो रहा है।
यहां तक कि आदेश के बाद भी 73 अवैध भवनों को अब तक ध्वस्त नहीं किया जा सका है। शासन से इस संबंध में जवाब भी मांगा गया, लेकिन आरडीए के अफसरों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। मुकदमों का निपटारा न हो पाने के कारण आरडीए के राजस्व में इजाफा भी नहीं हो पा रहा है।
जिले में अवैध रूप से भवनों का निर्माण हो रहा है। तमाम भवन और कांप्लेक्स का काम पूरा भी हो चुका है और आवासीय भवनों का व्यवसायिक उपयोग भी धड़ल्ले से जारी है।
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वहीं कार्रवाई के नाम पर अवैध भवनों का चालान कर बिल्डरों के खिलाफ मुकदमा शुरू किया जाता है। चालान के साथ ही कंपाउंडिंग जमा कराने का भी प्रयास किया जाता है।
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यहां तक कि भवनों को सील कर अन्य कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाती है। भवनों को सील करने के बाद भी उसमें काम शुरू हो जाता है।
हालत यह है कि तीन दर्जन से अधिक सील भवनों में विभिन्न शोरूम तक खुल गए हैं। अवैध भवनों का उपयोग तो शुरू हो गया है, लेकिन आरडीए में शुरू किए गए मुकदमों का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
एक साल पहले 73 भवनों को गिराने के आदेश दिए गए थे। आदेश के बाद अब तक एक भी निर्माण को ध्वस्त नहीं किया गया है। ये मुकदमे भी लंबित हैं।
कंपाउंडिंग से संबंधित भी चार सौ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। बिल्डर कुछ धनराशि जमा करने के बाद मुकदमों की फाइलों को लंबित करवा देते हैं।
आरडीए के अधिकारी मुकदमों को खत्म करने के लिए कठोर कदम नहीं उठा रहे हैं। मुकदमों की सही ढंग से सुनवाई न होने से इनकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।