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ढाई साल बाद आया फैसला, पिता-पुत्र को आजीवन कारावास
Updated Thu, 07 Dec 2017 01:18 AM IST
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ढाई साल बाद आया फैसला, पिता-पुत्र को आजीवन कारावास
रायबरेली। कोर्ट ने हत्या के आरोप में दोष सिद्ध पाते हुए पिता-पुत्र को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही 10-10 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। यह फैसला बुधवार को जिला एवं सत्र न्यायालय स्थित कोर्ट संख्या चार के अपर सत्र न्यायाधीश रामकृपाल ने सुुनाया।
अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी करने वाले एडीजीसी (क्रिमिनल) गिरिजेश कुमार सिंह के मुताबिक मामले की रिपोर्ट मृतक के पुत्र डॉ. रिजवान खान ने थाना मोहनगंज में 8 मई 2015 को दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार वादी के पिता मो. नसीम खान रोज की तरह आठ मई 2015 को दोपहर बाद खाना खाकर बाग की रखवाली करने गए थे। आम तोड़ने के विवाद को लेकर मोहनगंज निवासी इबरार व उसके बेटे गुलजार ने धारदार हथियार से पिता की हत्या कर दी। कुछ लोगों ने उन्हें भागते हुए देखा। पुलिस ने विवेचना के बाद इबरार व गुलजार के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर दोनों को सजा सुनाई। कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान में भागते हुए देखना, कुल्हाड़ी का बरामद होना आदि ऐेसे परिस्थिति जन्य साक्ष्य घटना को साबित करते हैं।
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रायबरेली। कोर्ट ने हत्या के आरोप में दोष सिद्ध पाते हुए पिता-पुत्र को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही 10-10 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। यह फैसला बुधवार को जिला एवं सत्र न्यायालय स्थित कोर्ट संख्या चार के अपर सत्र न्यायाधीश रामकृपाल ने सुुनाया।
अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी करने वाले एडीजीसी (क्रिमिनल) गिरिजेश कुमार सिंह के मुताबिक मामले की रिपोर्ट मृतक के पुत्र डॉ. रिजवान खान ने थाना मोहनगंज में 8 मई 2015 को दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार वादी के पिता मो. नसीम खान रोज की तरह आठ मई 2015 को दोपहर बाद खाना खाकर बाग की रखवाली करने गए थे। आम तोड़ने के विवाद को लेकर मोहनगंज निवासी इबरार व उसके बेटे गुलजार ने धारदार हथियार से पिता की हत्या कर दी। कुछ लोगों ने उन्हें भागते हुए देखा। पुलिस ने विवेचना के बाद इबरार व गुलजार के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर दोनों को सजा सुनाई। कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान में भागते हुए देखना, कुल्हाड़ी का बरामद होना आदि ऐेसे परिस्थिति जन्य साक्ष्य घटना को साबित करते हैं।
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