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रायबरेली में सीबीआई की विशेष अदालत में 14 साल चली सुनवाई

Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 01 Oct 2020 12:15 AM IST
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रायबरेली। अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ध्वंस मामले में भले ही 28 साल तक चली लंबी सुनवाई के बाद लखनऊ की विशेष अदालत ने बुधवार को सभी आरोपियों को बरी कर दिया हो लेकिन जब भी इस मामले को याद किया जाएगा तो रायबरेली का नाम जरूर लिया जाएगा। वजह इस प्रकरण की यहां सीबीआई की विशेष अदालत में अपराध संख्या 198/92 के तहत सुनवाई करीब 14 साल तक हुई। यहां से न सिर्फ आठ आरोपियों को समन जारी किए गए थे, बल्कि लालकृष्ण आडवाणी को आरोपमुक्त तक किया गया था, लेकिन बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर उन पर भी केस चलाया गया। इस मुकदमे में आडवाणी के अलावा मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, उमा भारती, विहिप नेता अशोक सिंघल, आचार्य गिरिराज किशोर, विष्णुहरि डालमिया, साध्वी ऋतंभरा भी नामजद थे।
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इसमें अशोक सिंघल, आचार्य गिरिराज किशोर व विष्णु हरि डालमिया की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई थी। ढांचा ध्वंस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 9 सितंबर 1993 को पत्रावली ललितपुर से रायबरेली भेजने का आदेश दिया और अगले दिन 10 सितंबर को पत्रावली रायबरेली आ गई थी। सुनवाई गति पकड़ती तभी 24 जनवरी 1994 को पत्रावली रायबरेली से स्पेशल जज अयोध्या प्रकरण लखनऊ को स्थानांतरित कर दी गई। करीब 9 साल बाद पत्रावली 21 मार्च 2003 को फिर रायबरेली की विशेष अदालत लाई गई। इसके बाद मामले की सुनवाई में तेजी आई। पत्रावली आने के बाद सुनवाई 29 मार्च 2003 को हुई तो सभी आठ आरोपियों के खिलाफ विशेष कोर्ट में हाजिर होने का समन जारी किया गया। इसी दौरान 19 सितंबर 2003 को सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी को आरोपमुक्त कर दिया।

साथ ही बचे अन्य सात आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश देते हुए 10 अक्तूबर 2003 की तारीख तय की थी। आडवाणी के आरोपमुक्त होने और अन्य पर आरोप तय करने के आदेश से क्षुब्ध मुरली मनोहर जोशी समेत अन्य ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में पुनर्विचार याचिका दायर की। मामला हाईकोर्ट में चले जाने के कारण 10 अक्तूबर 2003 को बचे सात आरोपियों पर आरोप तय नहीं किए जा सके। उच्च न्यायालय ने 6 जुलाई 2005 को आरोपमुक्त किए गए आडवाणी समेत आठों आरोपियों पर रायबरेली कोर्ट में मुकदमा चलाने का आदेश दिया। इसके बाद 28 जुलाई 2005 को सभी आठ आरोपी विशेष अदालत में हाजिर हुए और उनके खिलाफ आरोप तय किए गए। इसके बाद से गवाही की प्रक्रिया शुरू हुई। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर पत्रावली एक बार फिर मई 2017 में लखनऊ स्थित विशेष कोर्ट में भेज दी गई, जहां आज मामले में फैसला आ गया।
सीबीआई की ओर से रायबरेली स्थित विशेष कोर्ट में 57 लोगों की गवाही पूरी कराई गई थी। इसमें एफआईआर लेखक कांस्टेबिल हनुमान प्रसाद, सीआरपीएफ के तत्कालीन कमांडेंट आरके स्वामी, अयोध्या निवासी मो. असलम, पुरोहित अवधेश कुमार उपाध्याय, एक प्रेस से जुड़े फोटोग्राफर संजय खरे, घटनाक्रम को शार्टहैंड में नोट करने वाले उपनिरीक्षक रामबहादुर मिश्र, घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग करने वाले सब इंस्पेक्टर जितेंद्र कुमार मिश्रा, एक समाचारपत्र के रिपोर्टर चंद्र किशोर मिश्र, वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अंजू गुप्ता, अयोध्या निवासी हाजी महबूब, विशेष कार्याधिकारी अशोक कुमार सिंह, पत्रकार शरतचंद्र प्रधान, पत्रकार अजय कुमार, पत्रकार रेनू मित्तल, सेवानिवृत्त आईएएस केके बक्शी, सीताराम सिंह, मिल्कियत सिंह, अयोध्या निवासी मो. अली, वली उल्लाह, सीआरपीएफ के तत्कालीन डिप्टी एसपी लाल सिंह, पत्रकार तेलूराम कम्बोज, पत्रकार शीतला सिंह, पत्रकार असफाक अहमद, प्रेस फोटोग्राफर मनोज छाबड़ा, रिटायर्ड आईजी बंशीलाल, मुंबई पुलिस के छत्रपति नारायण काले, हेड कांस्टेबिल राममिलन, एएसआई बाबूराव, हरिशंभरकर, राम एकनाथ भाल, प्रेस फोटोग्राफर नैय्यर जैदी शामिल रहे।

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