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इस दिवाली जलाएं मिट्टी के दीये
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Mon, 29 Oct 2018 01:28 AM IST
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diwali
- फोटो : amar ujala
एक दौर वह भी था जब दीपावली मिट्टी से बने दीयों की थी। घी और तेल के दीेये जलाए जाते थे। तेजी से प्रचलन में आई मोमबत्ती और विद्युत झालरों के प्रयोग ने जहां कुम्हारों के हाथ से रोजगार छीन लिया वहीं घी तेल के दीये न जलने के कारण बरसात में पैदा होने वाले कीट-पतंगे भी नहीं मर पाते। नतीजा यह कि हम परेशान होते हैं। मिट्टी के दीये पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक नहीं होते थे। दीपावली पर इस पुरानी परंपरा को अमर उजाला फिर से जीवंत करने जा रहा है। इसके तहत शहरियों के साथ मिलकर अभियान चलाया जाएगा। दीपावाली तक हर दिन शहर में मिट्टी के दीये बांटे जाएंगे। लोगों को जागरूक किया जाएगा। तो आइए आप भी हमारी मुहिम में साथ दीजिए और दीयों की दीपावली को यादगार बनाइए। शहर से गांव तक इस बार मिट्टी के दीये जलाएं।
अमर उजाला अपने इस अभियान में जिले के सभी संगठनों से जुड़ने का आह्वान करता है। आप भी इस अभियान में जुड़कर मिट्टी के दीये संग दिवाली मनाने का आह्वान कर सकते हैं। अभियान से जुड़ने के लिए मोबाइल नंबर 8392949140, 8090100220 पर संपर्क करें।
एमडीपीजी के भूगोल विभागाध्यक्ष डा. विनोद शुक्ल ने बताया कि घी व सरसों के तेल से जलने वाले दीये से बारिश के मौसम में निकलने वाले हानिकारक कीट-पतंगे मर जाते हैं। उन्होंने बताया कि इससे बहुत कम मात्रा में कार्बन डाई आक्साइड गैस बनती है, जिसे पेड़ पौधे भी ग्रहण करते हैं, जितना ग्रहण करते हैं, उतना आक्सीजन हम सभी को देते हैं।
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आयुर्वेदाचार्य डा. विनय अवस्थी ने बताया कि पारंपरिक मिट्टी के दीपक से पर्यावरण शुद्ध रहता है। बीमारियां नहीं होती हैं। चर्म रोग आदि का खतरा नहीं रहता है। घी का दीपक चार घंटे तक पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखता है, जबकि सरसों का दीपक आधे घंटे तक। बारिश के मौसम में पैदा होने वाले कीट पंतगे नष्ट हो जाते हैं।
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अमर उजाला अपने इस अभियान में जिले के सभी संगठनों से जुड़ने का आह्वान करता है। आप भी इस अभियान में जुड़कर मिट्टी के दीये संग दिवाली मनाने का आह्वान कर सकते हैं। अभियान से जुड़ने के लिए मोबाइल नंबर 8392949140, 8090100220 पर संपर्क करें।
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एमडीपीजी के भूगोल विभागाध्यक्ष डा. विनोद शुक्ल ने बताया कि घी व सरसों के तेल से जलने वाले दीये से बारिश के मौसम में निकलने वाले हानिकारक कीट-पतंगे मर जाते हैं। उन्होंने बताया कि इससे बहुत कम मात्रा में कार्बन डाई आक्साइड गैस बनती है, जिसे पेड़ पौधे भी ग्रहण करते हैं, जितना ग्रहण करते हैं, उतना आक्सीजन हम सभी को देते हैं।
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आयुर्वेदाचार्य डा. विनय अवस्थी ने बताया कि पारंपरिक मिट्टी के दीपक से पर्यावरण शुद्ध रहता है। बीमारियां नहीं होती हैं। चर्म रोग आदि का खतरा नहीं रहता है। घी का दीपक चार घंटे तक पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखता है, जबकि सरसों का दीपक आधे घंटे तक। बारिश के मौसम में पैदा होने वाले कीट पंतगे नष्ट हो जाते हैं।