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ग्यारह ब्लाक अतिदोहित, अब तो चेतिए
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Wed, 21 Mar 2018 11:21 PM IST
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जिले में भूजल स्तर तेजी से घट रहा है। शासन और प्रशासन के जल संरक्षण के सारे उपाय फेल हो जाते रहे हैं या फिर ठीक ढंग से लागू नहीं हो पा रहे हैं। इसी का नतीजा है कि जिले के 11 ब्लाक अतिदोहित श्रेणी में आ गए हैं, जबकि एक ब्लाक को शासन ने क्रिटिकल जोन घोषित किया है। जलनिगम के आंकड़ों के मुताबिक हर दिन जिले में 476 मिलियन लीटर पानी बर्बाद हो रहा है।
जलनिगम के आंकड़ों के मुताबिक, हर दिन एक व्यक्ति को औसतन 135 लीटर पानी की जरूरत होती है। जिले की आबादी लगभग 33 लाख के करीब है। इस हिसाब से नगर पालिका, नगर पंचायतों के अलावा गांवों में रहने वाले लोगों को हर दिन 447 मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है। इसके लिए कुआं, हैंडपंप, शहर में पाइप लाइन और सबमर्सिबल का प्रयोग किया जाता है। चिंता की बात यह है कि इससे कहीं अधिक पानी बर्बाद हो रहा है। हर लगभग 476 मिलियन लीटर से अधिक पानी बर्बाद हो रहा है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों को पीने के पानी के लिए भी परेशानी झेलनी पड़ सकती है।
सदर, पट्टी और संडवा ब्लाक में सबसे ज्यादा संकट
शासन ने सबसे पहले 2009 में सदर ब्लाक को अतिदोहित जोन घोषित किया। यहां गहरी बोरिंग पर रोक लगा दी गई। कुछ अन्य ब्लाक क्रिटिकल जोन में रखे गए। इसके बाद जल संरक्षण के उपाय शुरू हुए, लेकिन हालात और बिगड़ते गए। लघु सिंचाई विभाग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब जिले के 11 ब्लाक अतिदोहित जोन घोषित किए जा चुके हैं। सिर्फ एक ब्लाक में क्रिटिकल जोन में है। यानि ज्यों-ज्यों जल संरक्षण के उपाय होते गए, समस्या और विकराल होती गई।
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क्या होता ह अतिदोहित, क्र्रिटिकल और सेमी क्रिटिकल जोन
शासन ने घटते जलस्तर को तीन श्रेणियों में बांटा है। अतिदोहित क्षेत्र वह है जहां जितना पानी रिचार्ज (जमीन के अंदर जा रहा है) हो रहा है, उससे 100 प्रतिशत ज्यादा खर्च हो रहा है। क्रिटिकल जोन में रिचार्ज से 90 प्रतिशत पानी ज्यादा खर्च होता है। जबकि सेमी क्रिटिकल में रिचार्ज के मुकाबले खर्च का आंकड़ा 50 से 60 प्रतिशत तक होता है।
काम नहीं आ रहीं सरकारी योजनाएं
जिले में वाटर हार्वेस्टिंग की जिम्मेदारी लघु सिंचाई विभाग, जलनिगम, ग्राम्य विकास विभाग, वन विभाग, कृषि विभाग, परती भूमि विकास विभाग, सिंचाई एवं जल संसाधान विभाग, उद्यान, आवास एवं शहरी नियोजन समेत समस्त निर्माण एजेंसियों की है। इन विभागों को चेकडैम, तालाब, बंधी, खेत तालाब, स्पिंकलर सिंचाई, रूफटाफ रेनवाटर हार्वेस्टिंग के जरिए जल संचयन करना है, लेकिन जितने उपाय किए जा रहे हैं संकट उतना ही बढ़ता जा रहा है। सरकारी योजनाएं घपले की भेंट चढ़ जा रही हैं। हर साल 40 से 50 सेमी भूगर्भ जलस्तर घटता जा रहा है।
अति जलदोहन से लगातार घट रहा जलस्तर
जिले में लगातार जलस्तर खिसकने के पीछे अहम कारण अति जलदोहन है। केंद्र व प्रदेश सरकार की रोक के बावजूद डेंजर जोन वाले क्षेत्रों में लगातार सबमर्सिबल पंप की बोरिंग हो रही है। जिन इलाकों में सिंचाई के लिए लगाए गए पंपिगसेट जवाब दे चुके हैं, वहां सबमर्सिबल पंप लगा दिए गए हैं।
67 करोड़ से 4458 तालाबों का जीर्णोद्धार, पानी एक बूंद नहीं
जिले में सिर्फ मनरेगा से अब तक 67 करोड़ रुपये खर्च कर 4458 तालाबों का जीर्णोद्धार कराया जा चुका है, लेकिन इनमें गिने-चुने ही तालाब ऐसे होंगे जो पानी से लबालब होंगे। ज्यादातर तालाबों में धूल उड़ रही है। यह हाल तब है जब गर्मी दस्तक दे चुकी है। विभागीय अधिकारी दो टूक कहते हैं कि तालाबों में पानी भरवाने के लिए सरकार अलग से बजट नहीं देती है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जल संरक्षण के उपाय कितने कारगर हो रहे हैं।
पानी के बचाव के लिए खुद करनी होगी पहल
लगातार गिर रहे जलस्तर से आने वाले दिनों में पेयजल की समस्या को देखते हुए जल बचाने के लिए हमें भी सोचना होगा। इसके लिए खुद प्लान तैयार करने की जरूरत है। उद्योगों में जल के कम उपयोग की तकनीक निकाली जानी चाहिए। इसके लिए रिसर्कुलेटिंग कूलिंग सिस्टम का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा उद्योगों से निकलने वाले जल का उपयोग बागवानी में किया जा सकता है। खेतों में सिंचाई के दौरान किसानों को नहरों के रोस्टर के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। साथ ही जलउपभोक्ता समिति के निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। समिति बनाकर भी लोगों को पानी के संचय किए जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही घर में ही वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था की जा सकती है। इसके अलावा किचन में बड़े भगोने में बर्तन धुला जाना चाहिए। इसी तरह सब्जी धुलने में भी इसी विधि का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा स्नानघर में कम पानी बहाने वाले फ्लश लगवाने चाहिए।
रूफटाप हार्वेस्टिंग की कवायद फेल
केंद्र व प्रदेश सरकार ने बरसात के पानी के साथ ही दैनिक उपयोग में होने पानी के खर्च को देखते हुए बड़े मकानों व कार्यालयों के निर्माण के पहले वाटर हार्वेस्टिंग प्लान की शर्त लगा दी। शर्त को पूरा करने के बाद ही निर्माण के लिए नक्शा पास होना चाहिए, लेकिन जिले में ऐसा नहीं हो रहा है। सरकार ने आदेश दे रखा है कि 2 सौ स्क्वायर सेमी में मकान या संस्था बनाने वाले को तभी निर्माण कार्य की अनुमति मिलेगी, जब वह रूफटाप हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हो। ताकि बरसात के पानी को संरक्षित किया जा सके। लेकिन कहीं इसका पालन नहीं हो रहा है। जिलाधिकारी कार्यालय में ही रूफटाप वाटर हार्वेस्टिंग की दशा बदहाल है।
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जलनिगम के आंकड़ों के मुताबिक, हर दिन एक व्यक्ति को औसतन 135 लीटर पानी की जरूरत होती है। जिले की आबादी लगभग 33 लाख के करीब है। इस हिसाब से नगर पालिका, नगर पंचायतों के अलावा गांवों में रहने वाले लोगों को हर दिन 447 मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है। इसके लिए कुआं, हैंडपंप, शहर में पाइप लाइन और सबमर्सिबल का प्रयोग किया जाता है। चिंता की बात यह है कि इससे कहीं अधिक पानी बर्बाद हो रहा है। हर लगभग 476 मिलियन लीटर से अधिक पानी बर्बाद हो रहा है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों को पीने के पानी के लिए भी परेशानी झेलनी पड़ सकती है।
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सदर, पट्टी और संडवा ब्लाक में सबसे ज्यादा संकट
शासन ने सबसे पहले 2009 में सदर ब्लाक को अतिदोहित जोन घोषित किया। यहां गहरी बोरिंग पर रोक लगा दी गई। कुछ अन्य ब्लाक क्रिटिकल जोन में रखे गए। इसके बाद जल संरक्षण के उपाय शुरू हुए, लेकिन हालात और बिगड़ते गए। लघु सिंचाई विभाग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब जिले के 11 ब्लाक अतिदोहित जोन घोषित किए जा चुके हैं। सिर्फ एक ब्लाक में क्रिटिकल जोन में है। यानि ज्यों-ज्यों जल संरक्षण के उपाय होते गए, समस्या और विकराल होती गई।
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क्या होता ह अतिदोहित, क्र्रिटिकल और सेमी क्रिटिकल जोन
शासन ने घटते जलस्तर को तीन श्रेणियों में बांटा है। अतिदोहित क्षेत्र वह है जहां जितना पानी रिचार्ज (जमीन के अंदर जा रहा है) हो रहा है, उससे 100 प्रतिशत ज्यादा खर्च हो रहा है। क्रिटिकल जोन में रिचार्ज से 90 प्रतिशत पानी ज्यादा खर्च होता है। जबकि सेमी क्रिटिकल में रिचार्ज के मुकाबले खर्च का आंकड़ा 50 से 60 प्रतिशत तक होता है।
काम नहीं आ रहीं सरकारी योजनाएं
जिले में वाटर हार्वेस्टिंग की जिम्मेदारी लघु सिंचाई विभाग, जलनिगम, ग्राम्य विकास विभाग, वन विभाग, कृषि विभाग, परती भूमि विकास विभाग, सिंचाई एवं जल संसाधान विभाग, उद्यान, आवास एवं शहरी नियोजन समेत समस्त निर्माण एजेंसियों की है। इन विभागों को चेकडैम, तालाब, बंधी, खेत तालाब, स्पिंकलर सिंचाई, रूफटाफ रेनवाटर हार्वेस्टिंग के जरिए जल संचयन करना है, लेकिन जितने उपाय किए जा रहे हैं संकट उतना ही बढ़ता जा रहा है। सरकारी योजनाएं घपले की भेंट चढ़ जा रही हैं। हर साल 40 से 50 सेमी भूगर्भ जलस्तर घटता जा रहा है।
अति जलदोहन से लगातार घट रहा जलस्तर
जिले में लगातार जलस्तर खिसकने के पीछे अहम कारण अति जलदोहन है। केंद्र व प्रदेश सरकार की रोक के बावजूद डेंजर जोन वाले क्षेत्रों में लगातार सबमर्सिबल पंप की बोरिंग हो रही है। जिन इलाकों में सिंचाई के लिए लगाए गए पंपिगसेट जवाब दे चुके हैं, वहां सबमर्सिबल पंप लगा दिए गए हैं।
67 करोड़ से 4458 तालाबों का जीर्णोद्धार, पानी एक बूंद नहीं
जिले में सिर्फ मनरेगा से अब तक 67 करोड़ रुपये खर्च कर 4458 तालाबों का जीर्णोद्धार कराया जा चुका है, लेकिन इनमें गिने-चुने ही तालाब ऐसे होंगे जो पानी से लबालब होंगे। ज्यादातर तालाबों में धूल उड़ रही है। यह हाल तब है जब गर्मी दस्तक दे चुकी है। विभागीय अधिकारी दो टूक कहते हैं कि तालाबों में पानी भरवाने के लिए सरकार अलग से बजट नहीं देती है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जल संरक्षण के उपाय कितने कारगर हो रहे हैं।
पानी के बचाव के लिए खुद करनी होगी पहल
लगातार गिर रहे जलस्तर से आने वाले दिनों में पेयजल की समस्या को देखते हुए जल बचाने के लिए हमें भी सोचना होगा। इसके लिए खुद प्लान तैयार करने की जरूरत है। उद्योगों में जल के कम उपयोग की तकनीक निकाली जानी चाहिए। इसके लिए रिसर्कुलेटिंग कूलिंग सिस्टम का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा उद्योगों से निकलने वाले जल का उपयोग बागवानी में किया जा सकता है। खेतों में सिंचाई के दौरान किसानों को नहरों के रोस्टर के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। साथ ही जलउपभोक्ता समिति के निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। समिति बनाकर भी लोगों को पानी के संचय किए जाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही घर में ही वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था की जा सकती है। इसके अलावा किचन में बड़े भगोने में बर्तन धुला जाना चाहिए। इसी तरह सब्जी धुलने में भी इसी विधि का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा स्नानघर में कम पानी बहाने वाले फ्लश लगवाने चाहिए।
रूफटाप हार्वेस्टिंग की कवायद फेल
केंद्र व प्रदेश सरकार ने बरसात के पानी के साथ ही दैनिक उपयोग में होने पानी के खर्च को देखते हुए बड़े मकानों व कार्यालयों के निर्माण के पहले वाटर हार्वेस्टिंग प्लान की शर्त लगा दी। शर्त को पूरा करने के बाद ही निर्माण के लिए नक्शा पास होना चाहिए, लेकिन जिले में ऐसा नहीं हो रहा है। सरकार ने आदेश दे रखा है कि 2 सौ स्क्वायर सेमी में मकान या संस्था बनाने वाले को तभी निर्माण कार्य की अनुमति मिलेगी, जब वह रूफटाप हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हो। ताकि बरसात के पानी को संरक्षित किया जा सके। लेकिन कहीं इसका पालन नहीं हो रहा है। जिलाधिकारी कार्यालय में ही रूफटाप वाटर हार्वेस्टिंग की दशा बदहाल है।