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अर्जुनपुर में कट गए मनरेगा से लगे पांच लाख के पेड़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Thu, 07 Jan 2016 11:16 PM IST
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लालगंज विकास खंड के अर्जुनपुर ग्राम पंचायत में मनरेगा के तहत लगाए गए पांच लाख के कीमती पेड़ों को बेच दिया गया। बिके पेड़ों के लाखों रुपये गायब हो गए हैं। इस बारे में अधिकारी भी कुछ नहीं बता पा रहे हैं। पेड़ों की कटान के दौरान अधिकारियों ने इसे सरकारी पैसा बताते हुए ग्राम सभा के खाते में जमाकर विकास कार्य में लगाने की बात कही थी। लाखों रुपये के हेर-फे र का खुलासा नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान की बैठक हुआ है।
अर्जुनपुर ग्राम पंचायत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत आठ साल पहले 14 हजार पेड़ लगवाए गए थे। पेड़ बड़े हो गए तो 9 माह पहले अचानक उनकी कटान होने लगी। ठेकेदार मनरेगा के तहत लगाए गए पेड़ों को कटवाने लगा तो ग्रामीणों ने इसकी शिकायत अधिकारियों से की। इसके बाद अधिकारियों ने बेचे गए वृक्षों से मिलने वाली धनराशि को ग्राम सभा के खाते में जमा कर विकास कार्यों के लगाए जाने की बात कही थी। बताया जाता है कि नियमों को ताक पर रखकर यहां लगभग पांच लाख के पेड़ काटकर बेच दिए गए। जबकि नियमानुसार विकास खंड से वन विभाग को सूचना होनी चाहिए। इसके बाद वनविभाग पेड़ की लागत तय करता है।
तब जाकर पेड़ों की कटान होती है और मिलने वाला पैसा ग्राम सभा के खाते में जमा कर विकास कार्य किया जाता है। इधर, पंचायत चुनाव के बाद नवनिर्वाचित आशा देवी ने बैठक में मामले की हकीकत खंगाली तो यहां बेचे गए वृक्षों से वसूले गए पांच लाख रुपये के बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा है। ग्राम पंचायत विकास अधिकारी से पूछा गया तो उसकी घिग्घी बंध गई। सूत्रों की माने तो अधिकारियों की मिलीभगत से रुपये का हेरफेर कर लिया गया। इस बाबत जिला विकास अधिकारी रमाकांत तिवारी का कहना है कि मनरेगा से कराए गए कार्यों को धन सरकारी राजस्व होता है। नियमों को ताक पर रखकर पेड़ काटा जाना भी गलत है। अर्जुनपुर में बेचे गए पेड़ों के पैसे का हेरफेर सीधे-सीधे सरकारी धन का गबन है। मामला गंभीर है। जांच में जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
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अर्जुनपुर ग्राम पंचायत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत आठ साल पहले 14 हजार पेड़ लगवाए गए थे। पेड़ बड़े हो गए तो 9 माह पहले अचानक उनकी कटान होने लगी। ठेकेदार मनरेगा के तहत लगाए गए पेड़ों को कटवाने लगा तो ग्रामीणों ने इसकी शिकायत अधिकारियों से की। इसके बाद अधिकारियों ने बेचे गए वृक्षों से मिलने वाली धनराशि को ग्राम सभा के खाते में जमा कर विकास कार्यों के लगाए जाने की बात कही थी। बताया जाता है कि नियमों को ताक पर रखकर यहां लगभग पांच लाख के पेड़ काटकर बेच दिए गए। जबकि नियमानुसार विकास खंड से वन विभाग को सूचना होनी चाहिए। इसके बाद वनविभाग पेड़ की लागत तय करता है।
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तब जाकर पेड़ों की कटान होती है और मिलने वाला पैसा ग्राम सभा के खाते में जमा कर विकास कार्य किया जाता है। इधर, पंचायत चुनाव के बाद नवनिर्वाचित आशा देवी ने बैठक में मामले की हकीकत खंगाली तो यहां बेचे गए वृक्षों से वसूले गए पांच लाख रुपये के बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा है। ग्राम पंचायत विकास अधिकारी से पूछा गया तो उसकी घिग्घी बंध गई। सूत्रों की माने तो अधिकारियों की मिलीभगत से रुपये का हेरफेर कर लिया गया। इस बाबत जिला विकास अधिकारी रमाकांत तिवारी का कहना है कि मनरेगा से कराए गए कार्यों को धन सरकारी राजस्व होता है। नियमों को ताक पर रखकर पेड़ काटा जाना भी गलत है। अर्जुनपुर में बेचे गए पेड़ों के पैसे का हेरफेर सीधे-सीधे सरकारी धन का गबन है। मामला गंभीर है। जांच में जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
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